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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 356 में से

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पृष्ठ 110

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

74 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
शब्दाज्ञता प्रसुप्तिश्च गन्धाज्ञत्वं दृशः क्षयः।
मुनियों द्वारा कहे हुये वायु के अस्सी रोग (वातव्याधि)
कहे जाते हैं-1. आक्षेपक, 2. हनुस्तम्भ, 3. ऊरुस्तम्भ, 4.
शिरोग्रह, 5. बाह्यायाम, 6. अन्तरायाम, 7. पार्श्वशूल, 8.
कटिग्रह (हूक, चूक), 9. दण्डपतानक, 10. खल्ली, 11.
जिह्वास्तम्भ, 12. अर्दित (मुख का लकवा), 13. पक्षाघात
(अर्द्धाङ्ग), 14. क्रोष्टुशीर्षक (घुटने की सूजन), 15.
मन्यास्तम्भ, 16. पंगुता, 17. कलायखंजता, 18. तूनी, 19.
प्रतितूनी, 20. खँजता (लँगड़ा होना), 21. पादहर्ष, 22.
गृध्रसी (टाँग का अकड़ना), 23. विश्वाची (बाँह का
अकड़ना), 24. अपबाहुक, 25. अपतानक (हिस्टीरिया),
26. व्रणायाम, 27. वातकण्टक (पैर की मोच), 28.
अपतन्त्रक (हिस्टीरिया), 29. अंगभेद, 30. अंगशोष, 31.
मिन्मिनत्त्व (मिन्मिनापन), 32. गद्गद (हकलापन), 33.
प्रत्यष्ठीला, 34. अष्ठीला, 35. वामनत्व (बौनापन), 36.
कुब्जता (कुबड़ापन), 37. अंगपीड़ा, 38. अंगशूल, 39.
अंगसंकोच, 40. अंगस्तम्भ, 41. अंगरूक्षता, 42. अंगभंग,
43. अंगविभ्रंश, 44. विड्ग्रह (कब्जियत), 45. बद्धविट्कता,
46. मूकता (गूँगापन), 47. अतिजृम्भा, 48. अत्युद्गार,
49. अन्त्रकूजन, 50. वातप्रवृत्ति, 51. स्फुरण (फड़कन),
52. सिरापूरण, 53. कम्प, 54. कार्श्य, 55. श्यावता, 56.
प्रलाप, 57. क्षिप्रमूत्रता, 58. निद्रानाश, 59. स्वेदनाश, 60.
दुर्बलता, 61. बलक्षय, 62. शुक्रातिप्रवृत्ति, 63. शुक्राल्यता,
64. शुक्रनाश, 65. चञ्चलचित्तता, 66. कठिनता, 67.
मुखविरसता, 68. कषायवक्त्रता, 69. आध्मान (अफारा),
70. प्रत्याध्मान, 71. शीतता, 72. रोमहर्ष, 73. भीरुता (भय),
74. तोद, 75. कण्डू, 76. रसाज्ञता (रसज्ञान का अभाव),
77. शब्दाज्ञता (बधिरता), 78. प्रसुप्ति (अंग विशेष का सो
जाना), 79. गन्धाज्ञत्त्व (घ्राणनाश), और 80. दृष्टिनाश
(अन्धापन)।
वक्तव्य-ये अस्सी रोग वायु के प्रकोप के बिना हो ही
नहीं सकते, अतः इन्हें 'वातरोग' या 'वातव्याधि' कहते हैं।
पित्तज रोग-गणना
अथ पित्तभवा रोगाश्चत्वारिंशदिहोदिताः ।। 115 ।।
धूमोद्गारो विदाहः स्यादुष्णाङ्गत्वं मतिभ्रमः ।
कान्तिहानिः कण्ठशोषो मुखशोषोऽल्पशुक्रता ।। 116 ।।
तिक्तास्यताम्लवक्त्रत्वं स्वेदस्रावोऽङ्गपाकता ।
क्लमो हरितवर्णत्वमतृप्तिः पीतकायता ।। 117 ।।
रक्तस्रावोऽङ्गदरणं लोहगन्ध्यास्यता तथा ।
दौर्गन्ध्यं पीतमूत्रत्वमरतिः पीतविट्कता ।। 118 ।।
पीतावलोकनं पीतनेत्रता पीतदन्तता ।
शीतेच्छा पीतनखता तेजोद्वेषोऽल्पनिद्रता ।। 119 ।।
कोपश्च गात्रसादश्च भिन्नविट्कत्वमन्धता ।
उष्णोच्छ्वासत्वमुष्णत्वं मूत्रस्य च मलस्य च ।। 120 ।।
तमसो दर्शनं पीतमण्डलानां च दर्शनम् ।
निःसरत्वं च पित्तस्य चत्वारिंशद्रुजः स्मृताः ।। 121 ।।
आयुर्वेद में पित्त रोग चालीस कहे गये हैं-1. धूमोद्गार
(धुआँ जैसा डकार आना), 2. विदाह (जलन होना), 3.
उष्णांगत्व (अंगों का गर्म होना), 4. मतिभ्रम (बुद्धिभ्रम
होना या चक्कर आना), 5 कान्तिहानि (शरीर की छवि का
कम होना), 6. कण्ठशोष (गले का सूखना), 7. मुखशोष
(मुँह का सूखना), 8. अल्पशुक्रता (शुक्र की कमी), 9.
तिक्तास्यता (मुख का कड़वापन), 10. अम्लवक्त्रत्व (मुख
का खट्टा होना), 11. स्वेदस्राव (पसीना आना), 12.
अंगपाकता (अंगों में पाक होना), 13 क्लम (सुस्ती), 14.
हरितवर्णत्व (वर्ण का हरा होना), 15. अतृप्ति (तृप्ति न
होना), 16. पीतकायता (शरीर का पीला होना), 17. रक्तस्राव
(खून का पतला होना), 18. अंगदरण (अंगों का फटना),
19. लोहगन्ध्यास्यता (मुख से बुताये हुये लोहे की-सी गन्ध
का आना), 20. दौर्गन्ध्य (दुर्गन्धित्ता), 21. पीतमूत्रत्व (मूत्र
का पीला होना), 22. अरति (बेचैनी), 23. पीतविट्कता
(पुरीष का पीला होना), 24. पीतावलोकन (सभी वस्तुएँ
पीली दिखलाई देना), 25. पीतनेत्रता (आँखें पीली होना),
26. पीतदन्तता (दाँतों का पीला होना), 27. शीतेच्छा (शीत
की अभिलाषा), 28. पीतनखता (नाखूनों का पीला होना),
29. तेजोद्वेष (प्रकाश का अच्छा न लगना), 30. अल्पनिद्रता
(नींद कम आना), 31. कोप (क्रोध), 32. गात्रसाद (शरीर
की शिथिलता), 33. भिन्नविट्कत्व (दस्त होना), 34. अन्धता
(अन्धा होना), 35. उष्णोच्छ्वासत्व (साँस का गर्म होना),
36. उष्णमूत्रता (मूत्र का गर्म होना), 37. उष्णमलत्ता (पुरीष
का गर्म होना), 38. तमोदर्शन (आँखों के आगे अँधेरा आना),