सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
- १८ § १२० ] प्रथमोऽध्यायः ५३
केवललोभस्य सूक्ष्मसांपरायोपशमकस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्य-
न्तरम् । क्षपकस्य तस्य सामान्यवत् । अकषायेषु उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । शेषाणां त्रयाणां सामान्यवत् ।
§ १२०. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभङ्गज्ञानिषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया
एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । सासादनसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति ५
नास्त्यन्तरम् । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानिषु असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण पूर्वकोटी देशोना । संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया
नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण षट्षष्टिसागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
प्रमत्ताप्रमत्तयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । १०
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण षट्षष्टिसागरोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णां क्षपकाणां
सामान्यवत् । किं तु अवधिज्ञानिषु नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कृष्टेण वर्षपृथक्त्वम् ।
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । मनःपर्ययज्ञानिषु प्रमत्ताप्रमत्तसंयतयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण पूर्वकोटी देशोना । चतुर्णां क्षपकाणामवधिज्ञानिवत् । १५
द्वयोः केवलज्ञानिनोः सामान्यवत् ।
कषायमें सूक्ष्मसाम्परायिक उपशमकका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक
जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सूक्ष्मलोभवाले क्षपकका अन्तर ओघके समान है । कषायरहित
जीवोंमें उपशान्तकषायका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा
अन्तर नहीं है । शेष तीन गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है । २०
§ १२०. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी और विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टि-
का नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सासादन सम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी
और अवधिज्ञानी जीवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी
अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक १पूर्वकोटी है । संयतासंयतका २५
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट
अन्तर साधिक छ्यासठ २सागर है । प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस३ सागर
है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छ्यासठ४ सागर है । चारों क्षपकोंका ३०
अन्तर ओघके समान है । किन्तु अवधिज्ञानियोंमें नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय
और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व५ है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । मनःपर्ययज्ञानियोंमें
प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा
१. चार अन्तर्मुहूर्त कम पूर्व कोटि । २. आठ वर्ष और ग्यारह अन्तर्मुहूर्त कम तीन पूर्वकोटि अधिक छ्यासठ
सागर । किन्तु अवधिज्ञानीके ग्यारह अन्तर्मुहूर्तके स्थानमें १२ अन्तर्मुहूर्त कम करना चाहिए । ३. प्रमत्तके ३५
साढ़े तीन अन्तर्मुहूर्त कम पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागर उत्कृष्ट अन्तर है । और अप्रमत्तके दो अन्तर्मुहूर्त कम
पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागर उत्कृष्ट अन्तर है । ४. तीन या चार पूर्व कोटि अधिक छ्यासठ सागर । किन्तु
इसमें-से चारों उपशमकोंके क्रमसे २६, २४, २२ और २० अन्तर्मुहूर्त तथा आठ वर्ष कम कर देना चाहिए ।
५. अवधिज्ञानी प्रायः बहुत ही कम होते हैं, इसलिए इतना अन्तर बन जाता है ।
५४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § १२१ -
§ १२१. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतेषु प्रमत्ताप्रमत्तयोर्नानाजीवा-
पेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । द्वयोरुपशमकयोर्नानाजीवापेक्षया
सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । द्वयोः क्षपकयोः
सामान्यवत् । परिहारशुद्धिसंयतेषु प्रमत्ताप्रमत्तयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति
जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयतेषूपशमकस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । तस्यैव क्षपकस्य सामान्यवत् । यथाख्याते अकषायवत् । संयतासंयतस्त
नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । असंयतेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्त-
रम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणत्रयंस्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । शेषाणां-
त्रयाणां सामान्यवत् ।
§ १२२. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनिषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टि-
सम्यग्मिथ्यादृष्टयोर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येय-
भागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे देशोने । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त२ है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम
एक३ पूर्वकोटी है । चारों क्षपकोंका अन्तर अवधिज्ञानियोंके समान है। दोनों केवलज्ञानियोंका
अन्तर ओघके समान है ।
§ १२१. संयम मार्गणाके अनुवादसे सामायिक शुद्धिसंयत और छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतोंमें
प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त४ है। दोनों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम
एक५ पूर्वकोटी है। दोनों क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है। परिहारशुद्धि संयतोंमें प्रमत्तसंयत
और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और
उत्कृष्ट ६ अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयतोंमें उपशमकका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। तथा उसी सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकका
अन्तर ओघके समान है। यथाख्यातमें अन्तर कषायरहित जीवोंके समान है। संयतासंयतका
नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। असंयतोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवको अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ
कम तेतीस सागर७ है। शेष तीन गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है।
§ १२२. दर्शनमार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवालोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान
है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा
१. —यमे उप-आ०, दि० १, दि० २, ता० । २. उपशमश्रेणि और प्रमत्त-अप्रमत्तका काल अन्तर्मुहूर्त होनेसे
मनःपर्ययज्ञानी प्रमत्त और अप्रमत्तका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त बन जाता है । ३. आठ वर्ष और
१२ अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि । ४. प्रमत्तको अप्रमत्तसे और अप्रमत्तको प्रमत्तसे अन्तरित कराके यह
अन्तर ले आना चाहिए। ५. आठ वर्ष और ग्यारह अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अपूर्वकरणका उत्कृष्ट
अन्तर है । अनिवृत्तिकरणका समयाधिक नौ अन्तर्मुहूर्त और आठ वर्ष कम एक पूर्वकोटि उत्कृष्ट अन्तर है।
६. प्रमत्त और अप्रमत्तकी परस्पर अन्तरित करानेसे यह अन्तर आ जाता है। ७. यह अन्तर सातवें नरकमें
प्राप्त होता है।
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- ११८ § १२४ ] प्रथमोऽध्यायः ५५
नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे
देशोने । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्योक्तम् १ । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे देशोने । चतुर्णां क्षपकाणां सामान्योक्तम् । अचक्षुदर्शनिषु मिथ्या-
दृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तमन्तरम् । अवधिदर्शनिनोऽवधिज्ञानिवत् । केवलदर्शनिनः
केवलज्ञानिवत् ।
§ १२३. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्येषु मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवा-
पेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरो-
पमाणि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं
प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरोपमाणि
देशोनानि ।
§ १२४. तेजःपद्मलेश्ययोर्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एक-
जीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमे अष्टादश च सागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन
उत्कृष्ट अन्तर कुछ २ कम दो हजार सागर है । असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक
गुणस्थानका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त
और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो हजार सागर ३ है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ
कम दो हजार ४ सागर है । चारों क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है । अचक्षुदर्शनवालोंमें मिथ्या-
दृष्टिसे लेकर क्षीणकषायतक प्रत्येक गुणस्थानका सामान्योक्त अन्तर है । अवधिदर्शनवालोंका
अवधिज्ञानियोंके समान अन्तर है । तथा केवल दर्शनवालोंका केवलज्ञानियोंके समान अन्तर है ।
§ १२३. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे कृष्ण, नील और कापोत लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि
और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर क्रमशः कुछ कम तेतीस सागर, कुछ कम सत्रह सागर और
कुछ कम सात सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर दोनों गुणस्थानोंमें क्रमशः पल्यका
असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कृष्ट अन्तर तीनों लेश्याओंमें क्रमशः कुछ कम तेतीस
सागर, कुछ कम सत्रह सागर और कुछ कम सात सागर है ।
§ १२४. पीत और पद्म लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर दोनों
लेश्याओंमें क्रमशः साधिक दो सागर और साधिक अठारह सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और
सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
१. सामान्यवत् । एव-मु० । २. चक्षुदर्शनवालोंमें सासादनके नौ अन्तर्मुहूर्त और आवलिका असंख्यातवां भाग
कम सम्यग्मिथ्यादृष्टिके बारह अन्तर्मुहूर्त कम दो हजार सागर उत्कृष्ट अन्तर है । ३. चक्षुदर्शनवालोंमें अविरत-
सम्यग्दृष्टिके १० अन्तर्मुहूर्त कम संयतासंयतके ४८ दिन और १२ अन्तर्मुहूर्त कम, प्रमत्तसंयतके ८ वर्ष १०
अन्तर्मुहूर्त कम और अप्रमत्त संयतके भी ८ वर्ष और १० अन्तर्मुहूर्त कम दो हजार सागर उत्कृष्ट अन्तर है ।
४. चक्षुदर्शनवालोंमें चारों उपशामकोंका क्रमसे २९, २७, २५ और २३ अन्तर्मुहूर्त तथा आठ वर्ष कम दो
हजार सागर उत्कृष्ट अन्तर है ।
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पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमे अष्टादश च सागरोपमाणि साति-
रेकाणि । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १२५. शुक्ललेश्येषु मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्य-
ग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येय-
भागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । संयतासंयतप्रमत्तसंयतयोस्तेजो-
लेश्यावत् । अप्रमत्तसंयतस्य नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं
चान्तर्मुहूर्तः¹ । त्रयाणामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं
चान्तर्मुहूर्तः । उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् ।
चतुर्णां क्षपकानां सयोगकेवलिनामलेश्यानां च सामान्यवत् ।
§ १२६. भव्यानुवादेन भव्येषु मिथ्यादृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् । अभव्यानां
नानाजीवापेक्षया एवजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १२७. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिष्वसंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम्।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां
नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्साग-
रोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं
अन्तर दोनों गुणस्थानोंमें क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कृष्ट अन्तर
दोनों लेश्याओंमें क्रमशः साधिक दो सागर और साधिक अठारह सागर है। संयतासंयत, प्रमत्त-
संयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
§ १२५. शुक्ल लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम
एकतीस सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और
अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर है। संयतासंयत और प्रमत्तसंयतका
अन्तरकथन पीतलेश्याके समान है । तथा अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कुट अन्तर ²अन्तर्मुहूर्त है । तीन उपशमकोंका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जोवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर ³अन्तर्मुहूर्त है ।
उपशान्तकषायका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है तथा एक जीवकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । चारों क्षपक, सयोगकेवली और लेश्यारहित जीवोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ १२६. भव्यमार्गणाके अनुवादसे भव्योंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक
गुणस्थानका अन्तर ओघके समान है । अभव्योंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है ।
§ १२७. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना
जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर
कुछ⁴ कम एक पूर्वकोटी है । संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा
१. —हूर्तः । अयदो त्ति छ लेस्साओ सुहतिय लेस्सा हु देसविरदतिये । तत्तो दु सुक्कलेस्सा अजोगिठाणं
अलेस्सं तु ।। त्रयाणा—मु० । २. उपशमश्रेणिसे अन्तरित कराके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त प्राप्त
करना चाहिए । ३. अप्रमत्तसंयतसे अन्तरित कराके यह अन्तर प्राप्त करना चाहिए । ४. आठ वर्ष और दो
अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि ।
- ११८ § १२९ ] प्रथमोऽध्यायः ५७
प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि । शेषाणां सामान्यवत् ।
§ १२८. क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिष्वसंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं
प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया नास्त्य-
न्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण षट्षष्टिसागरोपमाणि देशोनानि । प्रमत्ता-
प्रमत्तसंयतयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिं- ५
शत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
§ १२९. औपशमिकसम्यग्दृष्टिष्वसंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः। उत्कर्षेण
सप्त रात्रिंदिनानि । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया
जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण चतुर्दश रात्रिंदिनानि । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः ।
प्रमत्ताप्रमत्तसंयतयोर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण पञ्चदश रात्रिंदिनानि । एक- १०
जीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । त्रयाणामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः ।
उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । उपशान्तकषायस्य नानाजीवा-
अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर २साधिक तैंतीस
सागर है। चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी
अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर ३साधिक तैंतीस सागर है। तथा शेष गुण- १५
स्थानोंका अन्तर ओघके समान है।
§ १२८. क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ४ कम एक पूर्व-
कोटी है । संयतासंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर
अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम छ्यासठ५ सागर है। प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका २०
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट
अन्तर साधिक६ तैंतीस सागर है।
§ १२९. औपशमिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयत सम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर सात दिन रात है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट
अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । संयतासंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट २५
अन्तर चौदह दिन रात्रि है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। प्रमत्त-
संयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर
पन्द्रह दिन रात है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। तीन उप-
शमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है। एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। उपशान्तकषायका नाना जीवोंको अपेक्षा ३०
१. -दिनानि । एक—मु० । २. संयतासंयतके आठ वर्ष और चौदह अन्तर्मुहूर्त कम दो पूर्वकोटि अधिक
तैंतीस सागर । प्रमत्तसंयत के एक अन्तर्मुहूर्त और एक पूर्वकोटि अधिक तैंतीस सागर । अथवा साढ़े तीन
अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अधिक तैंतीस सागर । अप्रमत्त संयतके साढ़े पाँच अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि
अधिक तैंतीस सागर । ३. चारों उपशमकोंके आठ वर्ष और क्रमसे २७, २५, २३ और २१ अन्तर्मुहूर्त
कम दो पूर्व कोटी अधिक तैंतीस सागर । ४. चार अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्व कोटि । ५. तीन अन्तर्मुहूर्त कम ३५
छ्यासठ सागर । ६. प्रमत्तके सात अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अधिक तैंतीस सागर और अप्रमत्तके आठ
अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अधिक तैंतीस सागर ।
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५८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § १३० -
पेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्योर्नाना-
जीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् ।
मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १३०. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्या-
दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तञ्च ।
उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्य-
न्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । चतुर्णामुपशमकानां
नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथ-
क्त्वम् । चतुर्णां क्षपकानां सामान्यवत् । असंज्ञिनां नानाजीवापेक्षयैकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
तदुभयव्यपदेशरहितानां सामान्यवत् ।
§ १३१. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्-
मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्त-
र्मुहूर्तञ्च । उत्कर्षेणाङ्गुलासंख्येय भागोऽसंख्येयासंख्येया¹ उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः । असंयतसम्यग्दृष्ट्य-
प्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणाङ्गुला-
ऽसंख्येयभागोऽसंख्येया² उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर³ नहीं है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्य-
ग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यका
असंख्यातवाँ भाग है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है।
§ १३०. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान है।
सासादन सम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट
अन्तर सौ सागर पृथक्त्व है। असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानका
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट
अन्तर सौ सागर पृथक्त्व है। चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर सौ सागर पृथक्त्व है। चारों
क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है। असंज्ञियोंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं
है। संज्ञी और असंज्ञी व्यवहारसे रहित जीवोंका अन्तर ओघके समान है।
§ १३१. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान है।
सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तरं ओघके समान है। एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट
अन्तर अंगुलका असंख्यातवाँ भाग है जिसका प्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी
है। असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर अंगुलका असंख्यातवाँ
भाग है जिसका प्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी है। चारों उपशमकोंका
१. -भागा असंख्येया उत्स- मु० । २. क्योंकि उपशमश्रेणिसे उतर कर उपशम सम्यक्त्व छूट जाता है।
यदि अन्तर्मुहूर्त बाद पुनः उपशमश्रेणिपर चढ़ता है तो वेदकसम्यक्त्व पूर्वक दूसरी बार उपशम करना पड़ता
है। यही कारण है कि उपशम सम्यक्त्वमें एक जीवकी अपेक्षा उपशान्तकषायका अन्तर नहीं प्राप्त होता।
- ११८ § १३३ ] प्रथमोऽध्यायः ५९
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणाङ्गुलासंख्येयभागोऽसंख्येयासंख्येया १ उत्सर्पिण्यवस-
र्पिण्यः । चतुर्णां क्षपकाणां सयोगकेवलिनां च सामान्यवत् ।
§ १३२. अनाहारकेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
सासादनसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं
प्रति नास्त्यन्तरम् । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण मासपृथक्त्वम् । ५
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । सयोगकेवलिनः नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण
वर्षपृथक्त्वम् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । अयोगकेवलिनः नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः ।
उत्कर्षेण षण्मासाः । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । अन्तरमवगतम् ।
§ १३३. भावो विभाव्यते । स द्विविधः सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावत् मिथ्या-
दृष्टिरित्योदयिको भावः । सासादनसम्यग्दृष्टिरिति पारिणामिको भावः । सम्यङ्मथ्यादृष्टिरिति १०
क्षायोपशमिको भावः । असंयतसम्यग्दृष्टिरिति औपशमिको वा क्षायिको वा क्षायोपशमिको वा
भावः । असंयतः पुनरौदयिकेन भावेन । संयतासंयतः प्रमत्तसंयतोऽप्रमत्तसंयत इति क्षायोपशमिको
भावः । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । चतुर्षु क्षपकेषु सयोगायोगकेवलिनोश्च क्षायिको
भावः ।
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और १५
उत्कृष्ट अन्तर अंगुलका असंख्यातवां भाग है जिसका प्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और
अवसर्पिणी है । चारों क्षपक और सयोगकेवलियोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ १३२. अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
सासादनसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यका
असंख्यातवां भाग है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी २०
अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर मासपृथक्त्व है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । सयोगकेवलीका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर
वर्षपृथक्त्व है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । अयोगकेवलीका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । इस
प्रकार अन्तरका विचार किया । २५
§ १३३. अब भावका विचार करते हैं । वह दो प्रकारका है—सामान्य और विशेष ।
सामान्यकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि यह औदयिकभाव है । सासादनसम्यग्दृष्टि यह पारिणामिक२ भाव है ।
सम्यग्मिथ्यादृष्टि यह क्षायोपशमिक३ भाव है । असंयतसम्यग्दृष्टि यह औपशमिक, क्षायिक या
क्षायोपशमिक भाव है । किन्तु इसमें असंयतपना औदयिक भावकी अपेक्षा है । संयतासंयत, प्रमत्त-
संयत और अप्रमत्तसंयत यह क्षायोपशमिक भाव है । चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव है । ३०
चारों क्षपक, सयोगकेवली और अयोगकेवलीके क्षायिक भाव है ।
१. भावः । उक्तं च-मिच्छे खलु ओदइओ विदिाए पुण पारिणामिओ भावो । मिस्से खओवसमिओ अविरद-
सम्मम्मि तिण्णेव ॥ १ ॥ असं—मु० । २. सासादनसम्यक्त्व यह दर्शनमोहनीय कर्मके उदय, उपशम, क्षय
और क्षयोपशमसे नहीं होता इस लिए निष्कारण होनेसे पारिणामिक भाव है । ३. सम्यग्मिथ्यात्वकर्मका उदय
होने पर श्रद्धानाश्रद्धानात्मक मिला हुआ जीव परिणाम होता है । उसमें श्रद्धानांश सम्यक्त्व अंश है । ३५
सम्यग्मिथ्यात्व कर्मका उदय उसका अभाव करनेमें असमर्थ है इस लिए सम्यग्मिथ्यात्व यह क्षायोपशमिक
भाव है ।
६० सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § १३४ -
§ १३४. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ प्रथमायां पृथिव्यां नारकाणां मिथ्यादृष्ट्याद्यसंयत-
सम्यग्दृष्ट्यन्तानां सामान्यवत् । द्वितीयादिष्वा सप्तम्या मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्या-
दृष्टीनां सामान्यवत् । असंयतसम्यग्दृष्टेरौपशमिको वा क्षायोपशमिको वा भावः । असंयतः पुनरौद-
यिकेन भावेन । तिर्यग्गतौ तिरश्चां मिथ्यादृष्ट्यादिसंयतासंयतान्तानां सामान्यवत् । मनुष्यगतौ
५ मनुष्याणां मिथ्यादृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् । देवगतौ देवानां मिथ्यादृष्ट्याद्यसंयत-
सम्यग्दृष्ट्यन्तानां सामान्यवत् ।
§ १३५. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियविकलेन्द्रियाणामौदयिको भावः । पञ्चेन्द्रियेषु मिथ्यादृष्ट्य-
योगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् ।
§ १३६. कायानुवादेन स्थावरकायिकानामौदयिको भावः । त्रसकायिकानां सामान्यमेव ।
१० § १३७. योगानुवादेन कायवाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादिसयोगकेवल्यन्तानां च सामा-
न्यमेव ।
§ १३८. वेदानुवादेन स्त्रीपुन्नपुंसकवेदानामवेदानां च सामान्यवत् ।
§ १३९. कषायानुवादेन क्रोधमानमायालोभकषायाणामकषायाणां च सामान्यवत् ।
§ १४०. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिश्रुताज्ञानिविभङ्गज्ञानिनां मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवल-
१५ ज्ञानिनां च सामान्यवत् ।
§ १४१. संयमानुवादेन सर्वेषां संयतानां संयतासंयतानामसंयतानां च सामान्यवत् ।
§ १३४. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरक गतिमें पहली पृथिवी में नार-
कियोंके मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक ओघके समान भाव है। दूसरी से लेकर सातवीं
पृथिवी तक मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकियोंके ओघके समान भाव
२० है। असंयतसम्यग्दृष्टिके औपशमिक या क्षायोपशमिक भाव है। किन्तु इसमें असंयतपना औदयिक
भावकी अपेक्षा है। तिर्यंचगतिमें तिर्यंचोंके मिथ्यादृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक ओघके समान भाव
है। मनुष्यगतिमें मनुष्योंके मिथ्यादृष्टि से लेकर अयोगकेवली तक ओघके समान भाव है। देव-
गतिमें देवोंके मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयत सम्यग्दृष्टि तक ओघके समान भाव है।
§ १३५. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंके औदयिक भाव है। पंचेन्द्रियोंमें मिथ्या-
२५ दृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक गुणस्थानका ओघके समान भाव है।
§ १३६. कायमार्गणाके अनुवादसे स्थावरकायिकोंके औदयिक भाव है। त्रसकायिकोंके
ओघके समान भाव है।
§ १३७. योगमार्गणाके अनुवादसे काययोगी, वचनयोगी और मनोयोगी जीवोंके मिथ्या-
दृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक और अयोगकेवलीके ओघके समान भाव है।
३० § १३८. वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी, नपुंसकवेदी और वेदरहित जीवोंके
ओघके समान भाव है।
§ १३२. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोध कषायवाले, मान कषायवाले, माया कषायवाले,
लोभ कषायवाले और कषाय रहित जीवोंके ओघके समान भाव है।
§ १४०. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, विभंगज्ञानी, मतिज्ञानी, श्रुत-
३५ ज्ञानी, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी जोवोंके ओघके समान भाव हैं।
§ १४१. संयम मार्गणाके अनुवादसे सब संयतोंके, संयतासंयतोंके और असंयतोंके ओघके
समान भाव हैं।
- ११८ § १४६ ] प्रथमोऽध्यायः ६१
§ १४२. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दशनाचक्षुर्दशनावधिदर्शनकेवलदर्शिनां सामान्यवत् ।
§ १४३. लेश्यानुवादेन षड्लेश्यानामलेश्यानां च सामान्यवत् ।
§ १४४. भव्यानुवादेन भव्यानां मिथ्यादृष्टचाद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् । अभव्यानां
पारिणामिको भावः ।
§ १४५. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेः क्षायिको भावः । क्षायिकं ५
सम्यक्त्वम् । असंयतत्वमौदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपशमिको भावः ।
क्षायिकं सम्यक्त्वम् । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । क्षायिकं सम्यक्त्वम् । शेषाणां सामान्य-
वत् । क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेः क्षायोपशमिको भावः । क्षायोपशमिकं सम्य-
क्त्वम् । असंयतः पुनरौदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपशमिको भावः ।
क्षायोपशामिकं सम्यक्त्वम् । औपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेरौपशमिको भावः । औप- १०
शमिकं सम्यक्त्वम् । असंयतः पुनरौदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपश-
मिको भावः । औपशमिकं सम्यक्त्वम् । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । औपशमिकं
सम्यक्त्वम् । सासादनसम्यग्दृष्टेः पारिणामिको भावः । सम्यङ्मथ्यादृष्टेः क्षायोपशमिको भावः ।
मिथ्यादृष्टेरौदयिको भावः ।
§ १४६. संज्ञानुवादेन संज्ञिनां सामान्यवत् । असंज्ञिनामौदयिको भावः । तदुभयव्यपदेश- १५
रहितानां सामान्यवत् ।
§ १४२. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवाले, अचक्षुदर्शनवाले, अवधिदर्शनवाले और
केवलदर्शनवाले जीवोंके ओघके समान भाव हैं।
§ १४३. लेश्यामार्गणाके अनुवादसे छहों लेश्यावाले और लेश्या रहित जीवोंके ओघके
समान भाव हैं। २०
§ १४४. भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्योंके मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक ओघके
समान भाव हैं। अभव्योंके पारिणामिक १ भाव हैं।
§ १४५. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिके क्षायिक
भाव है। क्षायिक सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औदयिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और
अप्रमत्तसंयतके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायिक सम्यक्त्व है। चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव २५
है। क्षायिक सम्यक्त्व है। शेष गुणस्थानोंका ओघके समान भाव है। क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें
असंयतसम्यग्दृष्टिके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायोपशमिक सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औद-
यिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायोपशमिक
सम्यक्त्व है। औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिके औपशमिक भाव है। औपशमिक
सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औदयिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतके ३०
क्षायोपशमिक भाव हैं। औपशमिक सम्यक्त्व है। चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव है।
औपशमिक सम्यक्त्व है। सासादनसम्यग्दृष्टिके पारिणामिक भाव है। सम्यग्मिथ्यादृष्टिके क्षायोप-
शमिक भाव है। मिथ्यादृष्टिके औदयिक भाव है।
§ १४६. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंके ओघके समान भाव हैं। असंज्ञियोंके औदयिक
भाव हैं। तथा संज्ञी और असंज्ञी व्यवहारसे रहित जीवोंके ओघके समान भाव हैं। ३५
१. यों तो ये भाव दर्शनमोहनीय और चारित्र मोहनीयके उदयादिकी अपेक्षा बतलाये गये हैं। किन्तु अभव्योंके
'अभव्यत्व भाव क्या है' इसकी अपेक्षा भावका निर्देश किया है। यद्यपि इससे क्रम भंग हो जाता है तथापि
विशेष जानकारीके लिए ऐसा किया है।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
६२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ ६ १४७ -
§ १४७. आहारानुवादेन आहारकाणामनाहारकाणां च सामान्यवत् । भावः परिसमाप्तः ।
§ १४८. अल्पबहुत्वमुपवर्ण्यते । तद् द्विविधं सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावत् सर्वतः
स्तोकाः त्रय उपशमकाः स्वगुणस्थानकालेषु प्रवेशेन तुल्यसंख्याः । उपशान्तकषायास्तावन्त एव ।
त्रयः क्षपकाः संख्येयगुणाः । क्षीणकषायवीतरागच्छद्मस्थास्तावन्त एव । सयोगकेवलिनोऽयोगकेवलि-
नश्च प्रवेशेन तुल्यसंख्याः । सयोगकेवलिनः स्वकालेन समुदिताः संख्येयगुणाः । अप्रमत्तसंयताः
संख्येयगुणाः । प्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । संयतासंयता असंख्येयगुणाः । सासादनसम्यग्दृष्टयोऽ-
संख्येयगुणाः । सम्यग्मिथ्यादृष्टयः संख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । मिथ्यादृष्ट-
योऽनन्तगुणाः ।
§ १४९. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु नारकेषु सर्वतः स्तोकाः सासा-
दनसम्यग्दृष्टयः । सम्यग्मिथ्यादृष्टयः संख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । मिथ्या-
दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां सर्वतः स्तोकाः संयतासंयताः । इतरेषां सामान्यवत् ।
मनुष्यगतौ मनुष्याणामुपशमकादिप्रमत्तसंयतान्तानां सामान्यवत् । ततः संख्येयगुणाः संयतासंयताः ।
सासादनसम्यग्दृष्टयः संख्येयगुणाः । सम्यग्मिथ्यादृष्टयः संख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयः संख्येय-
गुणाः मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । देवगतौ देवानां नारकवत् ।
§ १५०. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियविकलेन्द्रियेषु गुणस्थानभेदो नास्तीत्यल्पबहुत्वाभावः ।
पञ्चेन्द्रियाणां सामान्यवत् । अयं तु विशेषः मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः ।
§ १४७. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारक और अनाहारक जीवोंके ओघके समान
भाव हैं । इस प्रकार भाव समाप्त हुआ ।
§ १४८. अब अल्पबहुत्वका कथन करते हैं। वह दो प्रकारका है— सामान्य और विशेष ।
सामान्यकी अपेक्षा तीनों उपशमक सबसे थोड़े हैं जो अपने-अपने गुणस्थानके कालोंमें प्रवेशकी
अपेक्षा समान संख्यावाले हैं । उपशान्तकषाय जीव उतने ही हैं। इनसे तीन गुणस्थानके क्षपक
संख्यात गुणे हैं। क्षीणकषायवीतराग छद्मस्थ उतने ही हैं। सयोगकेवली और अयोगकेवली प्रवेश-
की अपेक्षा समान संख्यावाले हैं । इनसे अपने कालमें समुदित हुए सयोगकेवली संख्यातगुणे हैं।
इनसे अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। इनसे प्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। इनसे संयतासंयत असंख्यात-
गुणे हैं। इनसे सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं ।
इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं ।
§ १४९. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब पृथिवियोंमें नारकियों-
में सासादनसम्यग्दृष्टि सबसे थोड़े हैं । इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं । इनसे असंयतसम्य-
ग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणे हैं । तिर्यंचगतिमें तिर्यंचोंमें संयतासंयत
सबसे थोड़े हैं। शेष गुणस्थानवाले तिर्यंचोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है । मनुष्यगतिमें मनुष्यों-
के उपशमकोंसे लेकर प्रमत्तसंयत तकका अल्पबहुत्व ओघके समान है। प्रमत्तसंयतोंसे संयतासंयत
संख्यातगुणे हैं । इनसे सासादनसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं। इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं ।
इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणे हैं। देवगतिमें देवोंका
अल्पबहुत्व नारकियोंके समान है ।
§ १५०. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रियोंमें गुणस्थान भेद न होनेसे
१. -संयता संख्ये-मु० । २. -दृष्टयः असंख्ये-मु० । ३. भावः । इन्द्रियं प्रत्युच्यते । पञ्चेन्द्रियाद्येकेन्द्रियान्ता
उत्तरोत्तरं बहवः । पञ्चवे- मु० । ४. कमसे कम एक और अधिकसे अधिक चौवन । ५. कमसे कम
एक और अधिकसे अधिक एक सौ आठ ।
– ११८ § १५४ ] प्रथमोऽध्यायः ६३
§ १५१. कायानुवादेन स्थावरकायेषु गुणस्थानभेदाभावादल्पबहुत्वाभावः। त्रसकायिकानां
पञ्चेन्द्रियवत् ।
§ १५२. योगानुवादेन वाङ्मनसयोगिनां पञ्चेन्द्रियवत् । काययोगिनां सामान्यवत् ।
वेदानुवादेन स्त्रीपुंवेदानां पञ्चेन्द्रियवत् । नपुंसकवेदानामवेदानां च सामान्यवत् ।
§ १५३. कषायानुवादेन क्रोधमानमायाकषायाणां पुंवेदवत् । अयं तु विशेषः मिथ्यादृष्टयोऽ- ५
नन्तगुणाः । लोभकषायाणां द्वयोरुपशमकयोस्तुल्या संख्या । क्षपकाः संख्येयगुणाः । सूक्ष्मसांपराय-
शुद्ध्युपशमकसंयता विशेषाधिकाः । सूक्ष्मसांपरायक्षपकाः संख्येयगुणाः । शेषाणां सामान्यवत् ।
§ १५४. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिश्रुताज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाः सासादनसम्यग्दृष्टयः ।
मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः२। विभङ्गज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाः सासादनसम्यग्दृष्टयः । मिथ्यादृष्टयोऽ-
संख्येयगुणाः । मतिश्रुतावधिज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाश्चत्वार उपशमकाश्चत्वारः क्षपकाः संख्येयगुणाः । १०
अप्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । प्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । संयतासंयताः ३असंख्येयगुणाः । असंयत-
सम्यग्दृष्टयः४ असंख्येयगुणाः । मनःपर्ययज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाश्चत्वार उपशमकाः । चत्वारः
क्षपकाः संख्येयगुणाः । अप्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । प्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । केवलज्ञानिषु
अयोगकेवलिभ्यः सयोगकेवलिनः संख्येयगुणाः ।
अल्पबहुत्व नहीं है। पंचेन्द्रियोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। किन्तु इतनी विशेषता है कि १५
असंयत सम्यग्दृष्टि पंचेन्द्रियोंसे मिथ्यादृष्टि पंचेन्द्रिय असंख्यातगुणे हैं।
§ १५१. काय मार्गणाके अनुवादसे स्थावरकायिकोंमें गुणस्थान भेद न होनेसे अल्पबहुत्व
नहीं है। त्रसकायिकोंका अल्पबहुत्व पंचेन्द्रियोंके समान है।
§ १५२. योग मार्गणाके अनुवादसे वचनयोगी और मनोयोगी जीवोंका अल्पबहुत्व
पंचेन्द्रियोंके समान है। काययोगियोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। वेद मार्गणाके अनुवादसे २०
स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवोंका अल्पबहुत्व पंचेन्द्रियोंके समान है। नपुंसकवेदी और वेदरहित
जीवोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है।
§ १५३. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोधकषायवाले, मानकषायवाले और मायाकषायवाले
जीवोंका अल्पबहुत्व पुरुषवेदियोंके समान है। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनमें असंयत सम्यग्दृ-
ष्टियोंसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं। लोभ कषायवालोंमें दोनों उपशमकोंकी संख्या समान है। इनसे २५
क्षपक संख्यातगुणे हैं। इनसे सूक्ष्मसाम्पराय उपशमक विशेष अधिक हैं। इनसे सूक्ष्मसाम्पराय
क्षपक संख्यातगुणे हैं। आगे शेष गुणस्थानवालोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है।
§ १५४. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानियोंमें सासादनसम्यग्दृष्टि सब-
से थोड़े हैं। मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं। विभंगज्ञानियोंमें सासादनसम्यग्दृष्टि सबसे थोड़े हैं। मिथ्या-
दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। मतिज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानियोंमें चारों उपशमक सबसे थोड़े हैं। ३०
इनसे चारों क्षपक संख्यातगुणे हैं। इनसे अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। इनसे प्रमत्तसंयत संख्यात-
गुणे हैं। इनसे संयतासंयत असंख्यातगुणे हैं। इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। मनःपर्यय-
ज्ञानियोंमें चारों उपशमक सबसे थोड़े हैं। इनसे चारों क्षपक संख्यातगुणे हैं। इनसे अप्रमत्तसंयत
संख्यातगुणे हैं। इनसे प्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। केवलज्ञानियोंमें अयोगकेवलियोंसे सयोगकेवली
संख्यातगुणे हैं। ३५
१. -भावः । कायं प्रत्युच्यते । सर्वतस्तेजःकायिका अल्पाः । ततो बहवः पृथिवीकायिकाः । ततोऽप्यप्कायिकाः ।
ततो वातकायिकाः । सर्वतोऽनन्तगुणा वनस्पतयः । त्रस–मु० । २. दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । मति–मु० ।
३. —यताः संख्ये-मु० । ४. –ष्टयः संख्ये-मु० ।
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६४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § १५५ -
§ १५५. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयतेषु द्वयोरुपशमकयोस्तुल्या संख्या।
ततः संख्येयगुणौ क्षपकौ। अप्रमत्ताः संख्येयगुणाः। प्रमत्ताः संख्येयगुणाः। परिहारशुद्धिसंयतेषु
अप्रमत्तेभ्यः प्रमत्ताः संख्येयगुणाः। सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयतेषु उपशमकेभ्यः क्षपकाः संख्येयगुणाः।
यथाख्यातविहारशुद्धिसंयतेषु उपशान्तकषायेभ्यः क्षीणकषायाः संख्येयगुणाः। अयोगकेवलिनस्ता-
वन्त एव। सयोगकेवलिनः संख्येयगुणाः। संयतासंयतानां नास्त्यल्पबहुत्वम्। असंयतेषु सर्वतः
स्तोकाः सासादनसम्यग्दृष्टयः। सम्यङ्मिथ्यादृष्टयः¹ संख्येयगुणाः। असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः।
मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः।
§ १५६. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनानां मनोयोगिवत्। अचक्षुर्दर्शनानां काययोगिवत्। अवधि-
दर्शनानामवधिज्ञानिवत्। केवलदर्शनानां केवलज्ञानिवत्।
§ १५७. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्यानां असंयतवत्। तेजःपद्मलेश्यानां सर्वतः
स्तोका अप्रमत्ताः। प्रमत्ताः संख्येयगुणाः। एवमितरेषां पञ्चेन्द्रियवत्। शुक्ललेश्यानां सर्वतः स्तोका
उपशमकाः। क्षपकाः संख्येयगुणाः। सयोगकेवलिनः संख्येयगुणाः। अप्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः।
प्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः। संयतासंयता² असंख्येयगुणाः। सासादनसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः।
सम्यग्मिथ्यादृष्टयः संख्येयगुणाः। मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः। असंयतसम्यग्दृष्टयः ४संख्येयगुणाः।
§ १५८. भव्यानुवादेन भव्यानां सामान्यवत्। अभव्यानां नास्त्यल्पबहुत्वम्।
§ १५५. संयम मार्गणा के अनुवादसे सामायिक और छेदोपस्थापना शुद्धिसंयतोंमें दोनों
उपशमक समान संख्यावाले हैं। इनसे दोनों क्षपक संख्यातगुणे हैं। इनसे अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणे
हैं। इनसे प्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। परिहारविशुद्धि संयतोंमें अप्रमत्तसंयतोंसे प्रमत्तसंयत
संख्यातगुणे हैं। सूक्ष्मसाम्परायिक शुद्धिसंयतोंमें उपशमकोंसे क्षपक संख्यातगुणे हैं। यथाख्यात
विहार शुद्धिसंयतोंसे उपशान्तकषायवालोंसे क्षीणकषाय जीव संख्यातगुणे हैं। अयोगकेवली उतने
ही हैं। सयोगकेवली संख्यातगुणे हैं। संयतासंयतोंका अल्पबहुत्व नहीं है। असंयतोंमें सासादन-
सम्यग्दृष्टि सबसे थोड़े हैं। इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं। इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यात-
गुणे हैं। इनसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं।
§ १५६. दर्शनमार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवालोंका अल्पबहुत्व मनोयोगियोंके समान है।
अचक्षुदर्शनवालोंका अल्पबहुत्व काययोगियोंके समान है। अवधिदर्शनवालोंका अल्पबहुत्व अवधि-
ज्ञानियोंके समान है और केवलदर्शनवालोंका अल्पबहुत्व केवलज्ञानियोंके समान है।
§ १५७. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे कृष्ण, नील और कापोत लेश्यावालोंका अल्पबहुत्व
असंयतोंके समान है। पीत और पद्म लेश्यावालोंमें अप्रमत्तसंयत सबसे थोड़े हैं। इनसे प्रमत्तसंयत
संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार शेष गुणस्थानवालोंका अल्पबहुत्व पंचेन्द्रियोंके समान है। शुक्ल
लेश्यावालोंमें उपशमक सबसे थोड़े हैं। इनसे क्षपक संख्यातगुणे हैं। इनसे सयोगकेवली संख्यात-
गुणे हैं। इनसे अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। {इनसे प्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। इनसे संयतासंयत
असंख्यातगुणे हैं। इनसे सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे
हैं। इनसे मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणे हैं। इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं।
§ १५८. भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्योंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। अभव्योंका
अल्पबहुत्व नहीं है।
१. -दृष्टयोऽसंख्ये-मु० । २. संयताः संख्ये-मु० । ३. दृष्टयः संख्ये-मु० । ४. -दृष्टयोऽसंख्ये-मु० ।
- ११८ § १६३ ] प्रथमोऽध्यायः ६५
§ १५९. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिषु सर्वतः स्तोकाश्चत्वार उपशमकाः । इतरेषां
प्रमत्तान्तानां सामान्यवत् । ततः संयतासंयताः संख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः ।
क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिषु सर्वतः स्तोका अप्रमत्ताः । प्रमत्ताः संख्येयगुणाः । संयतासंयताः १ संख्येय-
गुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । औपशमिकसम्यग्दृष्टीनां सर्वतः स्तोकाश्चत्वार उप-
शामकाः । अप्रमत्ताः संख्येयगुणाः । प्रमत्ताः संख्येयगुणाः । संयतासंयताः २ असंख्येयगुणाः । असंयत- ५
सम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । शेषाणां नास्त्यल्पबहुत्वम् ३ ।
१६०. संज्ञानुवादेन संज्ञिनां चक्षुर्दर्शनिवत् । असंज्ञिनां नास्त्यल्पबहुत्वम् । तदुभयव्यपदेश-
रहितानां केवलज्ञानिवत् ।
§ १६१. आहारानुवादेन आहारकाणां काययोगिवत् । अनाहारकाणां सर्वतः स्तोकाः
सयोगकेवलिनः । अयोगकेवलिनः संख्येयगुणाः । सासादनसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । असंयतसम्य- १०
ग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः ।
§ १६२. एवं मिथ्यादृष्ट्यादीनां गत्यादिषु मार्गणा कृता सामान्येन । तत्र सूक्ष्मभेद आग-
माविरोधेनानुसर्तव्यः ।
§ १६३. एवं सम्यग्दर्शनस्यादावुद्दिष्टस्य लक्षणोत्पत्तिस्वामिविषयन्यासाधिगमोपाया
निर्दिष्टाः । तत्संबन्धेन च जीवादीनां संज्ञापरिमाणादि निर्दिष्टम् । तदनन्तरं सम्यग्ज्ञानं विचारार्ह- १५
मित्याह—
§ १५९. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंमें चारों उपशमक सबसे थोड़े
हैं । प्रमत्तसंयतों तक शेषका अल्पबहुत्व ओघके समान है । प्रमत्तसंयतोंसे संयतासंयत संख्यातगुणे
हैं । इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें अप्रमत्तसंयत सबसे
थोड़े हैं । इनसे प्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं । इनसे संयतासंयत असंख्यातगुणे हैं । इनसे असंयत- २०
सम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । औपशमिकसम्यग्दृष्टियोंमें चारों उपशमक सबसे थोड़े हैं । इनसे
अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं । इनसे प्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं । इनसे संयतासंयत असंख्यातगुणे
हैं । इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । शेष सासादन सम्यग्दृष्टि आदिका अल्पबहुत्व
नहीं है ।
§ १६०. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंका अल्पबहुत्व चक्षुदर्शनवालोंके समान है । २५
असंज्ञियोंका अल्पबहुत्व नहीं है । संज्ञी और असंज्ञी व्यवहारसे रहित जीवोंका अल्पबहुत्व केवल-
ज्ञानियोंके समान है ।
§ १६१. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंका अल्पबहुत्व काययोगियोंके समान है ।
अनाहारकोंमें सयोगकेवली सबसे थोड़े हैं । इनसे अयोगकेवली संख्यातगुणे हैं । इनसे सासादन-
सम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे ३०
हैं । अल्पबहुत्वका कथन समाप्त हुआ ।
§ १६२. इस प्रकार गत्यादि मार्गणाओंमें मिथ्यादृष्टि आदिका सामान्यसे विचार किया ।
इसमें उत्तरोत्तर सूक्ष्म भेद आगमानुसार जान लेना चाहिए ।
§ १६३. इस प्रकार सर्व प्रथम कहे गये सम्यग्दर्शनके लक्षण, उत्पत्ति, स्वामी, विषय,
न्यास और अधिगमका उपाय कहा । और उसके सम्बन्धसे जीवादिकोंकी संज्ञा और परिमाण ३५
आदि भी कहा । अब इसके बाद सम्यग्ज्ञान विचार योग्य है इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. –यताः संख्येय-मु० । २. यताः संख्ये-मु० । ३. बहुत्वम् । विपक्षे एकैकगुणस्थानग्रहणात् । संज्ञा-मु० ।
९
६६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।९ § १६४ –
मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि ज्ञानम् ॥६॥
१६४. ज्ञानशब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं अवधिज्ञानं मनःपर्ययज्ञानं
केवलज्ञानमिति । इन्द्रियैर्मनसा च यथास्वमर्थो¹ मन्यते अनया मनुते मननमात्रं वा मतिः । तदावरण-
²कर्मक्षयोपशमे सति निरूप्यमाणं श्रूयते अनेन³ तत् शृणोति श्रवणमात्रं वा श्रुतम् । अनयोः प्रत्या-
सन्ननिर्देशः कृतः कार्यकारणभावात् । तथा च वक्ष्यते “श्रुतं मतिपूर्वम्” इति । अवाग्धानादवच्छिन्न-
विषयाद्वा अवधिः । परकीयमनोगतोऽर्थो मन इत्युच्यते । साहचर्यात्तस्य पर्ययणं परिगमनं मनः-
पर्ययः । मतिज्ञानप्रसङ्ग इति चेत्; न; अपेक्षामात्रत्वात् । क्षयोपशमशक्तिमात्रविजृम्भितं हि तत्केवलं
स्वपरमनोभिर्व्यपदिश्यते । यथा अभ्रे चन्द्रमसं पश्येति । बाह्येनाभ्यन्तरेण च तपसा यदर्थ-
मर्थिनो मार्गं केवन्ते सेवन्ते तत्केवलम् । असहायमिति वा । तदन्ते प्राप्यते इति अन्ते क्रियते । तस्य
प्रत्यासन्नत्वात्तत्समीपे मनःपर्ययग्रहणम् । कुतः प्रत्यासत्तिः । संयमैकाधिकरणत्वात् । तस्य अवधि-
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पाँच ज्ञान हैं ॥ ९ ॥
§ १६४. सूत्रमें ज्ञान शब्द मति आदि प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा —
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान । मतिका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—
‘इन्द्रियैर्मनसा च यथा स्वमर्थो मन्यते अनया मनुते मननमात्रं वा मतिः’ = इन्द्रिय और मनके द्वारा
यथायोग्य पदार्थ जिसके द्वारा मनन किये जाते हैं, जो मनन करता है या मननमात्र मति कह-
लाता है । श्रुतका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—‘तदावरणकर्मक्षयोपशमे सति निरूप्यमाणं श्रूयते अनेन
शृणोति श्रवणमात्रं वा श्रुतम्' = श्रुतज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होने पर निरूप्यमाण पदार्थ
जिसके द्वारा सुना जाता है, जो सुनता है या सुननामात्र श्रुत कहलाता है । मति और श्रुत इन
दोनों ज्ञानोंका समीपमें निर्देश किया है क्योंकि इनमें कार्य-कारणभाव पाया जाता है । जैसा कि
आगे कहेंगे 'श्रुतं मतिपूर्वम् ।' अवधिका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ = अधिकतर नीचेके विषयको जानने-
वाला होनेसे या परिमित विषयवाला होनेसे अवधि कहलाता है । मनःपर्ययका व्युत्पत्तिलभ्य
अर्थ = दूसरेके मनोगत अर्थको मन कहते हैं । सम्बन्धसे उसका पर्ययण अर्थात् परिगमन करने-
वाला ज्ञान मनःपर्यय कहलाता है । शंका—मनःपर्यय ज्ञानका इस प्रकार लक्षण करने पर उसे
मतिज्ञानका प्रसंग प्राप्त होता है ? समाधान —नहीं, क्योंकि मनःपर्ययज्ञानमें मनकी अपेक्षामात्र
है । यद्यपि वह केवल क्षयोपशम शक्तिसे अपना काम करता है तो भी केवल स्व और परके मनकी
अपेक्षा उसका व्यवहार किया जाता है । यथा, ‘आकाशमें चन्द्रमाको देखो’ यहाँ आकाशकी
अपेक्षामात्र होनेसे ऐसा व्यवहार किया गया है । केवलका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ = अर्थीजन जिसके लिए
बाह्य और आभ्यन्तर तपके द्वारा मार्गका केवन अर्थात् सेवन करते हैं वह केवलज्ञान कहलाता
है । अथवा केवल शब्द असहायवाची है, इसलिए असहाय ज्ञानको केवलज्ञान कहते हैं । केवल-
ज्ञानकी प्राप्ति अन्तमें होती है इसलिए सूत्रमें उसका पाठ सबके अन्तमें रखा है । उसके समीपका
होनेसे उसके समीपमें मनःपर्ययका ग्रहण किया है । शंका—मनःपर्यय केवलज्ञानके समीपका
क्यों है ? समाधान —क्योंकि इन दोनोंका संयम ही एक आधार है अतएव मनःपर्यय केवलज्ञानके
समीपका है । अवधिज्ञान मनःपर्ययज्ञानसे दूर है इसलिए उसका मनःपर्ययज्ञानके पहले पाठ
रखा है । शंका—मनःपर्ययज्ञानसे अवधिज्ञानको दूरका क्यों कहा ? समाधान —क्योंकि अवधिज्ञान
१. स्वमर्थान्मन्यते मु० । २. -वरणक्षयो -मु० । ३. अनेनेति तत् मु० । ४. 'अवाग्धानादवधिः । अथवा
अधोगौरवधर्मत्वात्पुद्गलः अवाङ् नाम तं दधाति परिच्छिनत्तीति अवधिः । अवधीरेव ज्ञानं अवधिज्ञानम् ।
अथवा अवधिर्मर्यादा अवधिना सह वर्त्तमानज्ञानमवधिज्ञानम् ।' —धव० प्र० अ० पृ० ८६५ आरा ।
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- १।१० § १६७ ] प्रथमोऽध्यायः ६७
विप्रकृष्टः । कुतः विप्रकृष्टान्त॑'रत्वात् । प्रत्यक्षात्परोक्षं पूर्वमुक्तं सुगमत्वात् । श्रुतपरिचितानुभूता^२
हि मतिश्रुतपद्धतिः सर्वेण प्राणिगणेन प्रायः प्राप्यते यतः । एवमेतत्पञ्चविधं ज्ञानम् । तद्भेदादयश्च
पुरस्ताद्वक्ष्यन्ते ।
§ १६५. “प्रमाणनयैरधिगमः” इत्युक्तम् । प्रमाणं च केषांचित् ज्ञानमभिमतम् । केषांचित्
संनिकर्षः । केषांचिदिन्द्रियमिति । अतोऽधिकृतानामेव मत्यादीनां प्रमाणत्वख्यापनार्थमाह— ५
तत्प्रमाणे ॥१०॥
§ १६६. तद्ग्रहणं किमर्थम् । प्रमाणान्तरपरिकल्पनान्निवृत्त्यर्थम् । संनि^३कर्षः प्रमाणमिन्द्रियं
प्रमाणमिति केचित्कल्पयन्ति तन्निवृत्त्यर्थं तदित्युच्यते । तदेव मत्यादि प्रमाणं नान्यादिति ।
१६७. अथ संनिकर्षे प्रमाणे सति इन्द्रिये वा को दोषः । यदि संनिकर्षः प्रमाणम्, सूक्ष्म-
व्यवहितविप्रकृष्टानामर्थानामग्रहणप्रसङ्गः । न हि ते इन्द्रियैः संनिकृष्यन्ते । अतः सर्वज्ञत्वाभावः १०
मनःपर्ययज्ञानसे अत्यन्त दूर है। प्रत्यक्षसे परोक्षका पहले कथन किया, क्योंकि वह सुगम है।
चूंकि मति-श्रुतपद्धति, श्रुतपरिचित और अनुभूत होनेसे प्रायः सब प्राणियोंके द्वारा प्राप्त करने
योग्य है अतः वह सुगम है। इस प्रकार यह पाँच प्रकारका ज्ञान है। इसके भेद आदि
आगे कहेंगे।
विशेषार्थ—क्रमानुसार इस सूत्रमें सम्यग्ज्ञानके पाँच भेद बतलाये गये हैं। यद्यपि सूत्रमें १५
'ज्ञानम्' ऐसा निर्देश किया है पर सम्यक्त्वका प्रकरण होनेसे ये पाँचों सम्यग्ज्ञानके भेद हैं, ऐसा
यहाँ जानना चाहिए। यद्यपि आत्मा केवलज्ञान स्वभाव है। मूल ज्ञानमें कोई भेद नहीं है पर
आवरणके भेदसे वह पाँच भागोंमें विभक्त हो जाता है। इस सूत्रकी व्याख्या करते हुए सर्वार्थ-
सिद्धिमें मुख्यतया तीन विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है—१. मति आदि शब्दोंका व्युत्पत्ति-
लभ्य अर्थ। २. मति और श्रुतको समीपमें रखनेके कारणका निर्देश। ३. मतिके बाद श्रुत इत्यादि २०
रूपसे पाँच ज्ञानोंके निर्देश करनेका कारण।
§ १६५. प्रमाण और नयसे ज्ञान होता है यह पहले कह आये हैं। किन्हींने ज्ञानको प्रमाण
माना है, किन्हींने सन्निकर्षको और किन्हींने इन्द्रियको। अतः अधिकार प्राप्त मत्यादिक ही प्रमाण
हैं इस बातको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वह पाँचों प्रकार का ज्ञान दो प्रमाणरूप है ॥१०॥ २५
§ १६६. शंका—सूत्रमें 'तत्' पद किसलिए दिया है ? समाधान—जो दूसरे लोग संन्निकर्ष
आदिको प्रमाण मानते हैं उनकी इस कल्पनाके निराकरण करनेके लिए सूत्रमें 'तत्' पद दिया है।
सन्निकर्ष प्रमाण है, इन्द्रिय प्रमाण है ऐसा कितने ही लोग मानते हैं इसलिए इनका निराकरण
करनेके लिए सूत्रमें 'तत्' पद दिया है जिससे यह अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि वे मत्यादि ही प्रमाण
हैं अन्य नहीं। ३०
§ १६७. शंका—सन्निकर्ष या इन्द्रियको प्रमाण माननेमें क्या दोष है । समाधान—यदि
सन्निकर्षको प्रमाण माना जाता है तो सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थोंके अग्रहणका प्रसंग
प्राप्त होता है; क्योंकि इनका इन्द्रियोंसे सम्बन्ध नहीं होता। इसलिए सर्वज्ञताका अभाव हो जाता
१. विप्रकृष्टतर-मु० । २. 'सुदपरिचिदाणुभूदा''''।'—स० प्रा० मा० ४। ३. 'उपलब्धिसधनानि प्रमाणानि ।'
—१।१।३ न्या० मा० । ४. 'यदुपलब्धिनिमित्तं तत्प्रमाणं ।' न्या० दा० पृ० ५ । ५. नातोऽन्यदिति आ०, ३५
दि० १ ।
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स्यात् । इन्द्रियमपि यदि प्रमाणं स एव दोषः; अल्पविषयत्वात् चक्षुरादीनां ज्ञेयस्य चापरिमाण-
त्वात् ।
§ १६८. सर्वेन्द्रियसन्निकर्षाभावश्च; चक्षुर्मनसोः प्राप्यकारित्वाभावात् । अप्राप्यकारित्वं च
उत्तरत्र वक्ष्यते ।
§ १६९. यदि ज्ञानं प्रमाणं फलाभावः । अधिगमो हि फलमिष्टं न भावान्तरम् । स चेत्प्रमाणं,
न तस्यान्यत्फलं भवितुमर्हति । फलवता च प्रमाणेन भवितव्यम् । संनिकर्षे इन्द्रिये वा प्रमाणे सति
अधिगमः फलमर्थान्तरभूतं युज्यते इति । तदयुक्तम् । यदि संनिकर्षः प्रमाणं अर्थाधिगमः फलं,
तस्य द्विष्ठत्वात्तत्फलेनाधिगमेनापि द्विष्ठेन भवितव्यमिति अर्थादीनामप्यधिगमः प्राप्नोति ।
आत्मनश्चेतनत्वात्तत्रैव समवाय इति चेत् । न; ज्ञस्वभावाभावे सर्वेषामचेतनत्वात् । ज्ञस्वभावाभ्यु-
पगमे वा आत्मनः स्वमतविरोधः स्यात् ।
§ १७०. ननु चोक्तं ज्ञाने प्रमाणे सति फलाभाव इति । नैष दोषः; अर्थाधिगमे प्रीतिदर्श-
नात् । ज्ञस्वभावस्यात्मनः कर्ममलीमसस्य करणालम्बनादर्थनिश्चये प्रीतिरूपजायते । सा फलमित्यु-
च्यते । उपेक्षा¹ अज्ञाननाशो वा फलम् । रागद्वेषयोरप्रणिधानमुपेक्षा । अन्धकारकल्पाज्ञा²ननाशो वा
फलमित्युच्यते ।
है । यदि इन्द्रियको प्रमाण माना जाता है तो वही दोष आता है, क्योंकि चक्षु आदिका विषय
अल्प है और ज्ञेय अपरिमित हैं ।
§ १६८. दूसरे सब इन्द्रियोंका सन्निकर्ष भी नहीं बनता, क्योंकि चक्षु और मन प्राप्यकारी
नहीं हैं, इसलिए भी सन्निकर्षको प्रमाण नहीं मान सकते । चक्षु और मनके अप्राप्यकारित्वका
कथन आगे करेंगे ।
§ १६९. शंका—यदि ज्ञानको प्रमाण मानते हैं तो फलका अभाव होता है । प्रकृतमें ज्ञान-
को ही फल मानना इष्ट है अन्य पदार्थ को फल मानना इष्ट नहीं । पर यदि उसे प्रमाण मान लिया
जाता है तो उसका कोई दूसरा फल नहीं प्राप्त हो सकता । किन्तु प्रमाणको फलवाला होना
चाहिए । पर सन्निकर्ष या इन्द्रियको प्रमाण मानने पर उससे भिन्न ज्ञानरूप फल बन जाता है ?
समाधान—यह कहना युक्त नहीं, क्योंकि यदि सन्निकर्षको प्रमाण और अर्थके ज्ञानको फल मानते
हैं तो सन्निकर्ष दो में रहनेवाला होनेसे उसके फलस्वरूप ज्ञानको भी दोमें रहनेवाला होना चाहिए
इसलिए घट-पटादि पदार्थोंके भी ज्ञानकी प्राप्ति होती है । शंका—आत्मा चेतन है, अतः उसीमें
ज्ञानका समवाय है ? समाधान—नहीं, क्योंकि आत्माको ज्ञस्वभाव नहीं मानने पर सभी पदार्थ
अचेतन प्राप्त होते हैं । यदि आत्माको ज्ञस्वभाव माना जाता है, तो स्वमतका विरोध होता है ।
§ १७०. पहले पूर्वपक्षीने जो यह कहा है कि ज्ञानको प्रमाण मानने पर फलका अभाव
होता है सो यह कोई दोष नहीं; क्योंकि पदार्थके ज्ञान होने पर प्रीति देखी जाती है । यद्यपि
आत्मा ज्ञस्वभाव है तो भी वह कर्मोसे मलीन है अतः इन्द्रियों के आलम्बनसे पदार्थके निश्चय
करने पर उसके जो प्रीति उत्पन्न होती है वही प्रमाणका फल कहा जाता है । अथवा उपेक्षा या
अज्ञानका नाश प्रमाणका फल है । राग-द्वेषरूप परिणामोंका नहीं होना उपेक्षा है और अन्धकारके
समान अज्ञानका दूर हो जाना अज्ञाननाश है । सो ये भी प्रमाण के फल हैं ।
१. 'अज्ञाननिवृत्तिर्हानोपादानोपेक्षाश्च फलम् ।-प० मु० ५;९ । 'यदा संनिकर्षस्तदा ज्ञानं प्रमितिः । यदा
ज्ञानं तदा हानोपादानोपेक्षाबुद्धयः फलम् ।'-१।१।३ न्या० भा० । २. -ल्पाज्ञानाभावः अज्ञाननाशो मु० ।
- १।१० § १७२ ] प्रथमोऽध्यायः ६९
§ १७१. प्रमिणोति प्रमीयतेऽनेन प्रमितिमात्रं वा प्रमाणम्। किमनेन प्रमीयते। जीवादिरर्थः।
यदि जीवादेरधिगमे प्रमाणं प्रमाणाधिगमे च अन्यत्प्रमाणं परिकल्पयितव्यम् । तथा सत्यनवस्था ।
नानवस्था प्रदीपवत् । यथा घटादीनां प्रकाशने प्रदीपो हेतुः² स्वस्वरूपप्रकाशनेऽपि स एव, न
प्रकाशान्तरं³ मृग्यं तथा प्रमाणमपीति अवश्यं चैतदभ्युपगन्तव्यम् । प्रमेयवत्प्रमाणस्य प्रमाणान्तर-
परिकल्पनायां स्वाधिगमाभावात् स्मृत्यभावः । तदभावाद् व्यवहारलोपः स्यात् ।
§ १७२. वक्ष्यमाणभेदापेक्षया द्विवचननिर्देशः । वक्ष्यते हि "आद्ये परोक्षम्, प्रत्यक्षमन्यद्"
इति स च द्विवचननिर्देशः प्रमाणान्तरसंख्यानिवृत्त्यर्थः ।
§ १७१ प्रमाण शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—प्रमिणोति, प्रमीयतेऽनेन प्रमितिमात्रं वा
प्रमाणम् = जो अच्छी तरह मान करता है, जिसके द्वारा अच्छी तरह मान किया जाता है या
प्रमितिमात्र प्रमाण है । शंका—प्रमाणके द्वारा क्या जाना जाता है? समाधान—जीवादि पदार्थ
जाने जाते हैं। शंका—यदि जीवादि पदार्थोंके ज्ञानमें प्रमाण कारण है तो प्रमाणके ज्ञानमें अन्य
प्रमाणको कारण मानना चाहिए । और ऐसा माननेपर अनवस्था दोष प्राप्त होता है ? समाधान—
जीवादि पदार्थोंके ज्ञानमें प्रमाणको कारण मानने पर अनवस्था दोष नहीं आता, जैसे दीपक ।
जिस प्रकार घटादि पदार्थोंके प्रकाश करनेमें दीपक हेतु है और अपने स्वरूप के प्रकाश करने में
भी वही हेतु है इसके लिए प्रकाशान्तर नहीं ढूंढ़ना पड़ता । उसी प्रकार प्रमाण भी है यह बात
अवश्य मान लेनी चाहिए । अब यदि प्रमेयके समान प्रमाणके लिए अन्य प्रमाण माना जाता है
तो स्वका ज्ञान नहीं होनेसे स्मृतिका अभाव हो जाता है और स्मृतिका अभाव हो जानेसे व्यवहार
का लोप हो जाता है ।
§ १७२. सूत्र में आगे कहे जानेवाले भेदोंकी अपेक्षा द्विवचनका निर्देश किया है। आगे
कहेंगे 'आद्ये परोक्षम्, प्रत्यक्षमन्यत् ।' यह द्विवचनका निर्देश प्रमाणकी अन्य संख्या के निराकरण
करनेके लिए किया है ।
विशेषार्थ—पिछले सूत्रमें पाँच सम्यग्ज्ञानोंकी चर्चा करके इस सूत्रमें उनकी प्रमाणता
बतलायी गयी है। यों तो सम्यग्ज्ञान कहनेसे उनकी प्रमाणता सुतरां सिद्ध है किन्तु दर्शनान्तरोंमें
ज्ञानको मुख्यतया प्रमाण न मान कर सन्निकर्ष व इन्द्रिय आदिको प्रमाण माना गया है इसलिए
यहाँपर सन्निकर्ष आदि प्रमाण नहीं हैं किन्तु ज्ञान ही प्रमाण है यह बतलाया गया है। सर्वार्थसिद्धि
टीकामें मुख्यतया दो मतोंका उल्लेख करके उनकी आलोचना की गयी है। ये दोनों मत नैयायिक
सम्मत हैं । नैयायिकोंने प्रत्यक्ष ज्ञानकी उत्पत्तिमें सन्निकर्ष और इन्द्रिय दोनोंको प्रमाण माना है।
सन्निकर्ष प्रमाण है इस मतका उल्लेख न्यायभाष्यमें और इन्द्रिय प्रमाण है इस मतका उल्लेख
उद्योतकरके न्यायवार्तिकमें पाया जाता है। परन्तु सर्वार्थसिद्धिकारने जब इस दूसरे मतका उल्लेख
किया है, तो यह भी प्रथम मतके समान प्राचीन प्रतीत होता है। बहुत सम्भव है कि इस द्वारा
सर्वार्थसिद्धिकारने सांख्यके 'इन्द्रियवृत्ति प्रमाण है' इस मतका उल्लेख किया हो तो कोई आश्चर्य
नहीं । नैयायिक लोग प्रत्यक्षज्ञानकी उत्पत्ति में सन्निकर्षको असाधारण कारण मानकर उसे प्रमाण
मानते हैं । किन्तु आगे चलकर करणके 'असाधारण कारणको करण कहते हैं' इस लक्षणके
स्थानमें 'व्यापारवाले कारणको करण कहते हैं' यह लक्षण भी प्रचलित हो गया जिससे सन्निकर्षके
साथ उनके यहाँ इन्द्रियाँ भी प्रमाण मानी जाने लगीं। वे जब सन्निकर्षको प्रमाण मानते हैं तब
ज्ञान उसका फल मान लिया जाता है और जब इन्द्रियों को प्रमाण मानते हैं तब भी सन्निकर्षको
इन्द्रियोंका व्यापार मानकर ज्ञान उनका फल मान लिया जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि वे
१. -धिगमे अन्य-मु० । २. हेतुः तत्स्व-मु० । ३. न्तरमस्य मृग्यम् मु० ।
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७० सर्वार्थसिद्धौ [ १।११ § १७३ –
§ १७३. 'उक्तस्य पञ्चविधस्य ज्ञानस्य प्रमाणद्वयान्तःपातित्वे प्रतिपादिते प्रत्यक्षानु-
मानादिप्रमाणद्वयकल्पनान्निवृत्त्यर्थमाह—
आद्ये परोक्षम् ॥११॥
§ १७४. आदिशब्दः प्राथम्यवचनः । आदौ भवमाद्यम् । कथं द्वयोः प्रथमत्वं मुख्योपचार-
कल्पनया । मतिज्ञानं तावन्मुख्यकल्पनया प्रथमम् । श्रुतमपि तस्य प्रत्यासत्त्या प्रथममित्युपचर्यते ।
ज्ञानको प्रमाण ही नहीं मानते। उनके यहाँ ज्ञानको भी प्रमाण माना गया है। जब वे ज्ञानको प्रमाण
मानते हैं तब हानबुद्धि, उपादानबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि उसका फल माना जाता है। किन्तु
नैयायिकोंकी सन्निकर्ष और इन्द्रियको प्रमाण माननेकी बात समीचीन नहीं है यही निर्णय इस
सूत्रकी टीकामें किया गया है। सन्निकर्षको प्रमाण माननेमें जो दोष प्राप्त होते हैं वे इस प्रकार
हैं—१. सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए सर्वज्ञताका अभाव
होता है २. चक्षु और मनसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि ये अप्राप्यकारी हैं । ३. प्रत्येक
इन्द्रियका अलग-अलग विषय मानना उचित नहीं, क्योंकि चक्षुका रूपके साथ सन्निकर्ष पाया
जानेसे जैसे वह रूपज्ञानका जनक है उसी प्रकार उसका रसके साथ भी सन्निकर्ष पाया जाता है
अतः उससे रसका भी ज्ञान होना चाहिए । ४. सन्निकर्ष एकका न होकर इन्द्रिय और अर्थ इन दो
या दोसे अधिकका होता है अतः सन्निकर्षका फल जो ज्ञान है वह भी दोनोंमें होना चाहिए ।
इन्द्रियको प्रमाण माननेमें ये दोष आते हैं—१. सर्वज्ञताका अभाव होता है, क्योंकि इन्द्रियाँ
सब पदार्थोंको एक साथ जाननेमें असमर्थ हैं। २. इन्द्रियोंसे सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थों-
का ज्ञान सम्भव न होनेसे भी सर्वज्ञताका अभाव होता है । ३. अनुमान आदि ज्ञानोंकी उत्पत्ति
नहीं हो सकेगी, क्योंकि इन ज्ञानोंकी उत्पत्ति इन्द्रियोंसे नहीं होती । सन्निकर्ष और इन्द्रियको
प्रमाण माननेपर इसी प्रकार और भी दोष आते हैं। सन्निकर्ष और इन्द्रियको प्रमाण माननेवाले
लोग ज्ञानको प्रमाण मानने पर एक बड़ी भारी आपत्ति यह देते हैं कि यदि ज्ञानको प्रमाण माना
जाता है तो प्रमाण निष्फल हो जाता है। किन्तु उनकी यह आपत्ति भी समीचीन नहीं है, क्योंकि
ज्ञानको प्रमाण माननेपर प्रीति, अज्ञाननाश, त्यागबुद्धि, ग्रहणबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि आदि अनेक
फल बन जाते हैं। उन्होंने भी जब ज्ञानको प्रमाण माना है तब ये ही फल माने हैं। न्यायभाष्यमें
लिखा है कि 'जब ज्ञान प्रमाण होता है तब हानबुद्धि, उपादानबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि उसके फल
प्राप्त होते हैं। इसलिए ज्ञानको ही सर्वत्र प्रमाण मानना चाहिए यही निष्कर्ष निकलता है। इससे
पूर्वोक्त सभी दोषोंका निराकरण हो जाता है। इसके अतिरिक्त इस सूत्रकी टीकामें इन बातोंपर
और प्रकाश डाला गया है—१. प्रमाणकी निरुक्ति । २. जीवादि पदार्थोंके जाननेके लिए जैसे
प्रमाण माना गया है वैसे प्रमाणके जाननेके लिए अन्य प्रमाण अपेक्षित नहीं, इसका खुलासा ।
३. सूत्रमें 'प्रमाणे' इस प्रकार द्विवचन रखनेका कारण । ये विषय सुगम हैं।
§ १७३. पहले कहे गये पाँच प्रकारके ज्ञान दो प्रमाणोंमें आ जाते हैं इस प्रकार सुनिश्चित
हो जाने पर भी वे दो प्रमाण प्रत्यक्ष और अनुमान आदिक भी हो सकते हैं अतः इस कल्पनाको
दूर करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
प्रथम दो ज्ञान परोक्ष प्रमाण हैं ॥११॥
§ १७४. आदि शब्द प्राथम्यवाची है। जो आदिमें हो वह आद्य कहलाता है। शंका—
दो प्रथम कैसे हो सकते हैं ? समाधान—पहला मुख्यकल्पनासे प्रथम है और दूसरा उपचार
१. त्यर्थः । —उपमानाद्यर्थापत्त्यादीनामत्रैवान्तर्भावादुक्त–मु० ।
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- १।११ § १७५ ] प्रथमोऽध्यायः ७१
द्विवचननिर्देशसामर्थ्याद् गौणस्यापि ग्रहणम् । आद्यं च आद्यं च आद्ये मतिश्रुते इत्यर्थः । तदुभयमपि
परोक्षं प्रमाणमित्यभिसंबध्यते । कुतोऽस्य परोक्षत्वम् १ । परायत्तत्वात् "मतिज्ञानं इन्द्रियानिन्द्रिय-
निमित्तम्" इति वक्ष्यते “श्रुतमनिन्द्रियस्य" इति च । अतः पराणीन्द्रियाणि मनश्च प्रकाशोपदेशादि
च बाह्यनिमित्तं प्रतीत्य तदावरणकर्मक्षयोपशमापेक्षस्यात्मनो मतिश्रुतं उत्पद्यमानं परोक्षमित्या-
ख्यायते । अत उपमानागमादीनामत्रैवान्तर्भावः । ५
§ १७५. अभिहितलक्षणात्परोक्षादितरस्य सर्वस्य प्रत्यक्षत्वप्रतिपादनार्थमाह -
कल्पनासे प्रथम है । मतिज्ञान तो मुख्यकल्पनासे प्रथम है और श्रुतज्ञान भी उसके समीपका होनेसे
प्रथम है ऐसा उपचार किया जाता है। सूत्रमें 'आद्ये' इस प्रकार द्विवचनका निर्देश किया है अतः
उसकी सामर्थ्यसे गौणका भी ग्रहण हो जाता है। 'आद्ये' पदका समास 'आद्यं च आद्यं च आद्ये' है।
इससे मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दोनों लिये गये हैं। ये दोनों ज्ञान मिलकर परोक्ष प्रमाण हैं ऐसा १०
यहाँ सम्बन्ध करना चाहिए । शंका - ये दोनों ज्ञान परोक्ष क्यों हैं ? समाधान - क्योंकि ये दोनों
ज्ञान पराधीन हैं। 'मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रियके निमित्तसे होता है' यह आगे कहेंगे और
'अनिन्द्रियका विषय श्रुत है' यह भी आगे कहेंगे । अतः 'पर'से यहाँ इन्द्रिय और मन तथा प्रकाश
और उपदेश आदि बाह्य निमित्त लेने चाहिए। तात्पर्य यह है कि मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञाना-
वरण कर्मके क्षयोपशमकी अपेक्षा रखनेवाले आत्माके इन्द्रिय और मन तथा प्रकाश और उपदेशा- १५
दिक बाह्य निमित्तोंकी अपेक्षा मतिज्ञान और श्रुतज्ञान उत्पन्न होते हैं अतः ये परोक्ष कहलाते हैं।
उपमान और आगमादिक भी ऐसे ही हैं अतः इनका भी इन्हींमें अन्तर्भाव हो जाता है।
विशेषार्थ- पिछले सूत्रमें दो प्रकारके प्रमाणोंका उल्लेख कर आये हैं। वे दो प्रमाण
कौन हैं और उनमें पाँच ज्ञानोंका कैसे विभाग होता है यह बतलाना शेष है, अतः ग्यारहवें
और बारहवें सूत्रों द्वारा यही बतलाया गया है। उसमें भी ग्यारहवें सूत्र द्वारा प्रमाणके पहले २०
भेदकी परोक्ष संज्ञा बतलाकर उसमें मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका अन्तर्भाव किया गया है। दूसरे
लोग जो इन्द्रियोंका अविषय है उसे परोक्ष कहते हैं। किन्तु जैन परम्परामें परोक्षता और प्रत्यक्षता
यह ज्ञानका धर्म मानकर उस प्रकारसे उनकी व्याख्या की गयी है। जैन परम्पराके अनुसार
परकी सहायतासे जो अक्ष अर्थात् आत्माके ज्ञान होता है वह परोक्ष ज्ञान कहलाता है परोक्ष
शब्दका यह अर्थ लिया गया है। मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दोनों ज्ञान ऐसे हैं जो यथासम्भव २५
इन्द्रिय, मन तथा प्रकाश और उपदेश आदिके बिना नहीं हो सकते, अतः ये दोनों परोक्ष माने
गये हैं। दार्शनिक ग्रन्थोंमें इन्द्रिय ज्ञानका सांव्यवहारिक प्रत्यक्षरूपसे उल्लेख देखनेको मिलता है।
सो यह कथन औपचारिक जानना चाहिए। दूसरे लोगोंने अक्षका अर्थ इन्द्रिय करके इन्द्रियज्ञान
को प्रत्यक्ष कहा है। वहाँ इसो अपेक्षासे इन्द्रिय ज्ञानको सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष लिखा गया है ऐसा
यहाँ जानना चाहिए। वस्तुतः आत्माके सिवा अन्य निमित्तसे जितना भी ज्ञान होता है वह सब ३०
परोक्ष ही है। उपमान, आगम आदि और जितने ज्ञान हैं वे भी अन्यकी अपेक्षाके बिना नहीं होते
अतः उनका इन्हीं ज्ञानोंमें अन्तर्भाव हो जानेसे मुख्यतः परोक्ष ज्ञान दो ही ठहरते हैं एक मतिज्ञान
और दूसरा श्रुतज्ञान । यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि ये ज्ञान केवल बाह्य निमित्तसे नहीं
होते हैं। मुख्यतया इनकी उत्पत्तिमें मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम आव-
श्यक है। आत्माकी ऐसी योग्यता हुए बिना ये ज्ञान नहीं होते । ऐसी योग्यताके होने पर बाह्य- ३५
निमित्त सापेक्ष इनकी प्रवृत्ति होती है यह उक्त कथनका सार है।
§ १७५. परोक्षका लक्षण कहा । इससे बाकीके सब ज्ञान प्रत्यक्ष हैं इस बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं -
१. -क्षत्वम् ? परापेक्षत्वात् । मति- आ०, दि० १, दि० २।
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?
Let's zoom in as much as possible:
म
त
स्त
स्या
पि
Wait, that is: म + त + स्त + स्या + पि!
That spells: तस्तस्यापि!
Why would it spell तस्तस्यापि? Could it be a typo in the original book: "ततस्तस्यापि" printed as "तस्तस्यापि"? Or is it "ततस्तस्यापि" with a double-ta ligature (त्त)?
Wait, let's look at 'त्त' in "प्रवृत्त" or "निवृत्ति":
Look at line 4: "निवृत्तिः" -> 'त्ति' has two horizontal strokes for double t.
Does this have that?
Look at the glyph after म:
It has: त, then there is another stroke?
Wait, could it be "ततस्तस्यापि"?
Yes, look at the two vertical parts:
त followed by त, then स joined to त (स्त).
Wait, let's look at the text of Sarvarthasiddhi online for 1.12:
"अक्ष्णोति व्याप्नोति जानातीत्यक्ष आत्मा । तमेव प्राप्तक्षयोपशमं प्रक्षीणवरणं वा प्रतिनियतं प्रत्यक्षम् । अवधिदर्शनं केवलदर्शनमपि अक्षमेव प्रतिनियतमिति तस्यापि ग्रहणं प्राप्नोति ।"
Wait! Online text says: "प्रतिनियतमिति तस्यापि ग्रहणं प्राप्नोति ।"!!