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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 558 में से

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पृष्ठ 168

पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमे अष्टादश च सागरोपमाणि साति-
रेकाणि । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १२५. शुक्ललेश्येषु मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्य-
ग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येय-
भागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । संयतासंयतप्रमत्तसंयतयोस्तेजो-
लेश्यावत् । अप्रमत्तसंयतस्य नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं
चान्तर्मुहूर्तः¹ । त्रयाणामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं
चान्तर्मुहूर्तः । उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् ।
चतुर्णां क्षपकानां सयोगकेवलिनामलेश्यानां च सामान्यवत् ।
§ १२६. भव्यानुवादेन भव्येषु मिथ्यादृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् । अभव्यानां
नानाजीवापेक्षया एवजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १२७. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिष्वसंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम्।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां
नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्साग-
रोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं


अन्तर दोनों गुणस्थानोंमें क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कृष्ट अन्तर
दोनों लेश्याओंमें क्रमशः साधिक दो सागर और साधिक अठारह सागर है। संयतासंयत, प्रमत्त-
संयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
§ १२५. शुक्ल लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम
एकतीस सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और
अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर है। संयतासंयत और प्रमत्तसंयतका
अन्तरकथन पीतलेश्याके समान है । तथा अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कुट अन्तर ²अन्तर्मुहूर्त है । तीन उपशमकोंका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जोवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर ³अन्तर्मुहूर्त है ।
उपशान्तकषायका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है तथा एक जीवकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । चारों क्षपक, सयोगकेवली और लेश्यारहित जीवोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ १२६. भव्यमार्गणाके अनुवादसे भव्योंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक
गुणस्थानका अन्तर ओघके समान है । अभव्योंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है ।
§ १२७. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना
जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर
कुछ⁴ कम एक पूर्वकोटी है । संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा


१. —हूर्तः । अयदो त्ति छ लेस्साओ सुहतिय लेस्सा हु देसविरदतिये । तत्तो दु सुक्कलेस्सा अजोगिठाणं
अलेस्सं तु ।। त्रयाणा—मु० । २. उपशमश्रेणिसे अन्तरित कराके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त प्राप्त
करना चाहिए । ३. अप्रमत्तसंयतसे अन्तरित कराके यह अन्तर प्राप्त करना चाहिए । ४. आठ वर्ष और दो
अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि ।