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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 558 में से

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पृष्ठ 167
  • ११८ § १२४ ] प्रथमोऽध्यायः ५५
    नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे
    देशोने । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्योक्तम् १ । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
    उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे देशोने । चतुर्णां क्षपकाणां सामान्योक्तम् । अचक्षुदर्शनिषु मिथ्या-
    दृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तमन्तरम् । अवधिदर्शनिनोऽवधिज्ञानिवत् । केवलदर्शनिनः
    केवलज्ञानिवत् ।
    § १२३. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्येषु मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवा-
    पेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरो-
    पमाणि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं
    प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरोपमाणि
    देशोनानि ।
    § १२४. तेजःपद्मलेश्ययोर्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एक-
    जीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमे अष्टादश च सागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
    सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन
    उत्कृष्ट अन्तर कुछ २ कम दो हजार सागर है । असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक
    गुणस्थानका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त
    और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो हजार सागर ३ है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा
    अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ
    कम दो हजार ४ सागर है । चारों क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है । अचक्षुदर्शनवालोंमें मिथ्या-
    दृष्टिसे लेकर क्षीणकषायतक प्रत्येक गुणस्थानका सामान्योक्त अन्तर है । अवधिदर्शनवालोंका
    अवधिज्ञानियोंके समान अन्तर है । तथा केवल दर्शनवालोंका केवलज्ञानियोंके समान अन्तर है ।
    § १२३. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे कृष्ण, नील और कापोत लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि
    और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
    अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर क्रमशः कुछ कम तेतीस सागर, कुछ कम सत्रह सागर और
    कुछ कम सात सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
    अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर दोनों गुणस्थानोंमें क्रमशः पल्यका
    असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कृष्ट अन्तर तीनों लेश्याओंमें क्रमशः कुछ कम तेतीस
    सागर, कुछ कम सत्रह सागर और कुछ कम सात सागर है ।
    § १२४. पीत और पद्म लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी
    अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर दोनों
    लेश्याओंमें क्रमशः साधिक दो सागर और साधिक अठारह सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और
    सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
    १. सामान्यवत् । एव-मु० । २. चक्षुदर्शनवालोंमें सासादनके नौ अन्तर्मुहूर्त और आवलिका असंख्यातवां भाग
    कम सम्यग्मिथ्यादृष्टिके बारह अन्तर्मुहूर्त कम दो हजार सागर उत्कृष्ट अन्तर है । ३. चक्षुदर्शनवालोंमें अविरत-
    सम्यग्दृष्टिके १० अन्तर्मुहूर्त कम संयतासंयतके ४८ दिन और १२ अन्तर्मुहूर्त कम, प्रमत्तसंयतके ८ वर्ष १०
    अन्तर्मुहूर्त कम और अप्रमत्त संयतके भी ८ वर्ष और १० अन्तर्मुहूर्त कम दो हजार सागर उत्कृष्ट अन्तर है ।
    ४. चक्षुदर्शनवालोंमें चारों उपशामकोंका क्रमसे २९, २७, २५ और २३ अन्तर्मुहूर्त तथा आठ वर्ष कम दो
    हजार सागर उत्कृष्ट अन्तर है ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri