सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।९ § १६४ –
मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि ज्ञानम् ॥६॥
१६४. ज्ञानशब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं अवधिज्ञानं मनःपर्ययज्ञानं
केवलज्ञानमिति । इन्द्रियैर्मनसा च यथास्वमर्थो¹ मन्यते अनया मनुते मननमात्रं वा मतिः । तदावरण-
²कर्मक्षयोपशमे सति निरूप्यमाणं श्रूयते अनेन³ तत् शृणोति श्रवणमात्रं वा श्रुतम् । अनयोः प्रत्या-
सन्ननिर्देशः कृतः कार्यकारणभावात् । तथा च वक्ष्यते “श्रुतं मतिपूर्वम्” इति । अवाग्धानादवच्छिन्न-
विषयाद्वा अवधिः । परकीयमनोगतोऽर्थो मन इत्युच्यते । साहचर्यात्तस्य पर्ययणं परिगमनं मनः-
पर्ययः । मतिज्ञानप्रसङ्ग इति चेत्; न; अपेक्षामात्रत्वात् । क्षयोपशमशक्तिमात्रविजृम्भितं हि तत्केवलं
स्वपरमनोभिर्व्यपदिश्यते । यथा अभ्रे चन्द्रमसं पश्येति । बाह्येनाभ्यन्तरेण च तपसा यदर्थ-
मर्थिनो मार्गं केवन्ते सेवन्ते तत्केवलम् । असहायमिति वा । तदन्ते प्राप्यते इति अन्ते क्रियते । तस्य
प्रत्यासन्नत्वात्तत्समीपे मनःपर्ययग्रहणम् । कुतः प्रत्यासत्तिः । संयमैकाधिकरणत्वात् । तस्य अवधि-
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पाँच ज्ञान हैं ॥ ९ ॥
§ १६४. सूत्रमें ज्ञान शब्द मति आदि प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा —
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान । मतिका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—
‘इन्द्रियैर्मनसा च यथा स्वमर्थो मन्यते अनया मनुते मननमात्रं वा मतिः’ = इन्द्रिय और मनके द्वारा
यथायोग्य पदार्थ जिसके द्वारा मनन किये जाते हैं, जो मनन करता है या मननमात्र मति कह-
लाता है । श्रुतका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—‘तदावरणकर्मक्षयोपशमे सति निरूप्यमाणं श्रूयते अनेन
शृणोति श्रवणमात्रं वा श्रुतम्' = श्रुतज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होने पर निरूप्यमाण पदार्थ
जिसके द्वारा सुना जाता है, जो सुनता है या सुननामात्र श्रुत कहलाता है । मति और श्रुत इन
दोनों ज्ञानोंका समीपमें निर्देश किया है क्योंकि इनमें कार्य-कारणभाव पाया जाता है । जैसा कि
आगे कहेंगे 'श्रुतं मतिपूर्वम् ।' अवधिका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ = अधिकतर नीचेके विषयको जानने-
वाला होनेसे या परिमित विषयवाला होनेसे अवधि कहलाता है । मनःपर्ययका व्युत्पत्तिलभ्य
अर्थ = दूसरेके मनोगत अर्थको मन कहते हैं । सम्बन्धसे उसका पर्ययण अर्थात् परिगमन करने-
वाला ज्ञान मनःपर्यय कहलाता है । शंका—मनःपर्यय ज्ञानका इस प्रकार लक्षण करने पर उसे
मतिज्ञानका प्रसंग प्राप्त होता है ? समाधान —नहीं, क्योंकि मनःपर्ययज्ञानमें मनकी अपेक्षामात्र
है । यद्यपि वह केवल क्षयोपशम शक्तिसे अपना काम करता है तो भी केवल स्व और परके मनकी
अपेक्षा उसका व्यवहार किया जाता है । यथा, ‘आकाशमें चन्द्रमाको देखो’ यहाँ आकाशकी
अपेक्षामात्र होनेसे ऐसा व्यवहार किया गया है । केवलका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ = अर्थीजन जिसके लिए
बाह्य और आभ्यन्तर तपके द्वारा मार्गका केवन अर्थात् सेवन करते हैं वह केवलज्ञान कहलाता
है । अथवा केवल शब्द असहायवाची है, इसलिए असहाय ज्ञानको केवलज्ञान कहते हैं । केवल-
ज्ञानकी प्राप्ति अन्तमें होती है इसलिए सूत्रमें उसका पाठ सबके अन्तमें रखा है । उसके समीपका
होनेसे उसके समीपमें मनःपर्ययका ग्रहण किया है । शंका—मनःपर्यय केवलज्ञानके समीपका
क्यों है ? समाधान —क्योंकि इन दोनोंका संयम ही एक आधार है अतएव मनःपर्यय केवलज्ञानके
समीपका है । अवधिज्ञान मनःपर्ययज्ञानसे दूर है इसलिए उसका मनःपर्ययज्ञानके पहले पाठ
रखा है । शंका—मनःपर्ययज्ञानसे अवधिज्ञानको दूरका क्यों कहा ? समाधान —क्योंकि अवधिज्ञान
१. स्वमर्थान्मन्यते मु० । २. -वरणक्षयो -मु० । ३. अनेनेति तत् मु० । ४. 'अवाग्धानादवधिः । अथवा
अधोगौरवधर्मत्वात्पुद्गलः अवाङ् नाम तं दधाति परिच्छिनत्तीति अवधिः । अवधीरेव ज्ञानं अवधिज्ञानम् ।
अथवा अवधिर्मर्यादा अवधिना सह वर्त्तमानज्ञानमवधिज्ञानम् ।' —धव० प्र० अ० पृ० ८६५ आरा ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri