सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- १।१० § १६७ ] प्रथमोऽध्यायः ६७
विप्रकृष्टः । कुतः विप्रकृष्टान्त॑'रत्वात् । प्रत्यक्षात्परोक्षं पूर्वमुक्तं सुगमत्वात् । श्रुतपरिचितानुभूता^२
हि मतिश्रुतपद्धतिः सर्वेण प्राणिगणेन प्रायः प्राप्यते यतः । एवमेतत्पञ्चविधं ज्ञानम् । तद्भेदादयश्च
पुरस्ताद्वक्ष्यन्ते ।
§ १६५. “प्रमाणनयैरधिगमः” इत्युक्तम् । प्रमाणं च केषांचित् ज्ञानमभिमतम् । केषांचित्
संनिकर्षः । केषांचिदिन्द्रियमिति । अतोऽधिकृतानामेव मत्यादीनां प्रमाणत्वख्यापनार्थमाह— ५
तत्प्रमाणे ॥१०॥
§ १६६. तद्ग्रहणं किमर्थम् । प्रमाणान्तरपरिकल्पनान्निवृत्त्यर्थम् । संनि^३कर्षः प्रमाणमिन्द्रियं
प्रमाणमिति केचित्कल्पयन्ति तन्निवृत्त्यर्थं तदित्युच्यते । तदेव मत्यादि प्रमाणं नान्यादिति ।
१६७. अथ संनिकर्षे प्रमाणे सति इन्द्रिये वा को दोषः । यदि संनिकर्षः प्रमाणम्, सूक्ष्म-
व्यवहितविप्रकृष्टानामर्थानामग्रहणप्रसङ्गः । न हि ते इन्द्रियैः संनिकृष्यन्ते । अतः सर्वज्ञत्वाभावः १०
मनःपर्ययज्ञानसे अत्यन्त दूर है। प्रत्यक्षसे परोक्षका पहले कथन किया, क्योंकि वह सुगम है।
चूंकि मति-श्रुतपद्धति, श्रुतपरिचित और अनुभूत होनेसे प्रायः सब प्राणियोंके द्वारा प्राप्त करने
योग्य है अतः वह सुगम है। इस प्रकार यह पाँच प्रकारका ज्ञान है। इसके भेद आदि
आगे कहेंगे।
विशेषार्थ—क्रमानुसार इस सूत्रमें सम्यग्ज्ञानके पाँच भेद बतलाये गये हैं। यद्यपि सूत्रमें १५
'ज्ञानम्' ऐसा निर्देश किया है पर सम्यक्त्वका प्रकरण होनेसे ये पाँचों सम्यग्ज्ञानके भेद हैं, ऐसा
यहाँ जानना चाहिए। यद्यपि आत्मा केवलज्ञान स्वभाव है। मूल ज्ञानमें कोई भेद नहीं है पर
आवरणके भेदसे वह पाँच भागोंमें विभक्त हो जाता है। इस सूत्रकी व्याख्या करते हुए सर्वार्थ-
सिद्धिमें मुख्यतया तीन विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है—१. मति आदि शब्दोंका व्युत्पत्ति-
लभ्य अर्थ। २. मति और श्रुतको समीपमें रखनेके कारणका निर्देश। ३. मतिके बाद श्रुत इत्यादि २०
रूपसे पाँच ज्ञानोंके निर्देश करनेका कारण।
§ १६५. प्रमाण और नयसे ज्ञान होता है यह पहले कह आये हैं। किन्हींने ज्ञानको प्रमाण
माना है, किन्हींने सन्निकर्षको और किन्हींने इन्द्रियको। अतः अधिकार प्राप्त मत्यादिक ही प्रमाण
हैं इस बातको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वह पाँचों प्रकार का ज्ञान दो प्रमाणरूप है ॥१०॥ २५
§ १६६. शंका—सूत्रमें 'तत्' पद किसलिए दिया है ? समाधान—जो दूसरे लोग संन्निकर्ष
आदिको प्रमाण मानते हैं उनकी इस कल्पनाके निराकरण करनेके लिए सूत्रमें 'तत्' पद दिया है।
सन्निकर्ष प्रमाण है, इन्द्रिय प्रमाण है ऐसा कितने ही लोग मानते हैं इसलिए इनका निराकरण
करनेके लिए सूत्रमें 'तत्' पद दिया है जिससे यह अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि वे मत्यादि ही प्रमाण
हैं अन्य नहीं। ३०
§ १६७. शंका—सन्निकर्ष या इन्द्रियको प्रमाण माननेमें क्या दोष है । समाधान—यदि
सन्निकर्षको प्रमाण माना जाता है तो सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थोंके अग्रहणका प्रसंग
प्राप्त होता है; क्योंकि इनका इन्द्रियोंसे सम्बन्ध नहीं होता। इसलिए सर्वज्ञताका अभाव हो जाता
१. विप्रकृष्टतर-मु० । २. 'सुदपरिचिदाणुभूदा''''।'—स० प्रा० मा० ४। ३. 'उपलब्धिसधनानि प्रमाणानि ।'
—१।१।३ न्या० मा० । ४. 'यदुपलब्धिनिमित्तं तत्प्रमाणं ।' न्या० दा० पृ० ५ । ५. नातोऽन्यदिति आ०, ३५
दि० १ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri