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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 171
  • ११८ § १३३ ] प्रथमोऽध्यायः ५९

एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणाङ्गुलासंख्येयभागोऽसंख्येयासंख्येया १ उत्सर्पिण्यवस-
र्पिण्यः । चतुर्णां क्षपकाणां सयोगकेवलिनां च सामान्यवत् ।
§ १३२. अनाहारकेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
सासादनसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं
प्रति नास्त्यन्तरम् । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण मासपृथक्त्वम् । ५
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । सयोगकेवलिनः नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण
वर्षपृथक्त्वम् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । अयोगकेवलिनः नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः ।
उत्कर्षेण षण्मासाः । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । अन्तरमवगतम् ।
§ १३३. भावो विभाव्यते । स द्विविधः सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावत् मिथ्या-
दृष्टिरित्योदयिको भावः । सासादनसम्यग्दृष्टिरिति पारिणामिको भावः । सम्यङ्मथ्यादृष्टिरिति १०
क्षायोपशमिको भावः । असंयतसम्यग्दृष्टिरिति औपशमिको वा क्षायिको वा क्षायोपशमिको वा
भावः । असंयतः पुनरौदयिकेन भावेन । संयतासंयतः प्रमत्तसंयतोऽप्रमत्तसंयत इति क्षायोपशमिको
भावः । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । चतुर्षु क्षपकेषु सयोगायोगकेवलिनोश्च क्षायिको
भावः ।
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और १५
उत्कृष्ट अन्तर अंगुलका असंख्यातवां भाग है जिसका प्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और
अवसर्पिणी है । चारों क्षपक और सयोगकेवलियोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ १३२. अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
सासादनसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यका
असंख्यातवां भाग है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी २०
अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर मासपृथक्त्व है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । सयोगकेवलीका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर
वर्षपृथक्त्व है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । अयोगकेवलीका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । इस
प्रकार अन्तरका विचार किया । २५
§ १३३. अब भावका विचार करते हैं । वह दो प्रकारका है—सामान्य और विशेष ।
सामान्यकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि यह औदयिकभाव है । सासादनसम्यग्दृष्टि यह पारिणामिक२ भाव है ।
सम्यग्मिथ्यादृष्टि यह क्षायोपशमिक३ भाव है । असंयतसम्यग्दृष्टि यह औपशमिक, क्षायिक या
क्षायोपशमिक भाव है । किन्तु इसमें असंयतपना औदयिक भावकी अपेक्षा है । संयतासंयत, प्रमत्त-
संयत और अप्रमत्तसंयत यह क्षायोपशमिक भाव है । चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव है । ३०
चारों क्षपक, सयोगकेवली और अयोगकेवलीके क्षायिक भाव है ।
१. भावः । उक्तं च-मिच्छे खलु ओदइओ विदिाए पुण पारिणामिओ भावो । मिस्से खओवसमिओ अविरद-
सम्मम्मि तिण्णेव ॥ १ ॥ असं—मु० । २. सासादनसम्यक्त्व यह दर्शनमोहनीय कर्मके उदय, उपशम, क्षय
और क्षयोपशमसे नहीं होता इस लिए निष्कारण होनेसे पारिणामिक भाव है । ३. सम्यग्मिथ्यात्वकर्मका उदय
होने पर श्रद्धानाश्रद्धानात्मक मिला हुआ जीव परिणाम होता है । उसमें श्रद्धानांश सम्यक्त्व अंश है । ३५
सम्यग्मिथ्यात्व कर्मका उदय उसका अभाव करनेमें असमर्थ है इस लिए सम्यग्मिथ्यात्व यह क्षायोपशमिक
भाव है ।