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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 165
  • १८ § १२० ] प्रथमोऽध्यायः ५३

केवललोभस्य सूक्ष्मसांपरायोपशमकस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्य-
न्तरम् । क्षपकस्य तस्य सामान्यवत् । अकषायेषु उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । शेषाणां त्रयाणां सामान्यवत् ।
§ १२०. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभङ्गज्ञानिषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया
एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । सासादनसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति ५
नास्त्यन्तरम् । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानिषु असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण पूर्वकोटी देशोना । संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया
नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण षट्षष्टिसागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
प्रमत्ताप्रमत्तयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । १०
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण षट्षष्टिसागरोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णां क्षपकाणां
सामान्यवत् । किं तु अवधिज्ञानिषु नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कृष्टेण वर्षपृथक्त्वम् ।
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । मनःपर्ययज्ञानिषु प्रमत्ताप्रमत्तसंयतयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण पूर्वकोटी देशोना । चतुर्णां क्षपकाणामवधिज्ञानिवत् । १५
द्वयोः केवलज्ञानिनोः सामान्यवत् ।
कषायमें सूक्ष्मसाम्परायिक उपशमकका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक
जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सूक्ष्मलोभवाले क्षपकका अन्तर ओघके समान है । कषायरहित
जीवोंमें उपशान्तकषायका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा
अन्तर नहीं है । शेष तीन गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है । २०
§ १२०. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी और विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टि-
का नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सासादन सम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी
और अवधिज्ञानी जीवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी
अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक १पूर्वकोटी है । संयतासंयतका २५
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट
अन्तर साधिक छ्यासठ २सागर है । प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस३ सागर
है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छ्यासठ४ सागर है । चारों क्षपकोंका ३०
अन्तर ओघके समान है । किन्तु अवधिज्ञानियोंमें नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय
और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व५ है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । मनःपर्ययज्ञानियोंमें
प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा
१. चार अन्तर्मुहूर्त कम पूर्व कोटि । २. आठ वर्ष और ग्यारह अन्तर्मुहूर्त कम तीन पूर्वकोटि अधिक छ्यासठ
सागर । किन्तु अवधिज्ञानीके ग्यारह अन्तर्मुहूर्तके स्थानमें १२ अन्तर्मुहूर्त कम करना चाहिए । ३. प्रमत्तके ३५
साढ़े तीन अन्तर्मुहूर्त कम पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागर उत्कृष्ट अन्तर है । और अप्रमत्तके दो अन्तर्मुहूर्त कम
पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागर उत्कृष्ट अन्तर है । ४. तीन या चार पूर्व कोटि अधिक छ्यासठ सागर । किन्तु
इसमें-से चारों उपशमकोंके क्रमसे २६, २४, २२ और २० अन्तर्मुहूर्त तथा आठ वर्ष कम कर देना चाहिए ।
५. अवधिज्ञानी प्रायः बहुत ही कम होते हैं, इसलिए इतना अन्तर बन जाता है ।