सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § १२१ -
§ १२१. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतेषु प्रमत्ताप्रमत्तयोर्नानाजीवा-
पेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । द्वयोरुपशमकयोर्नानाजीवापेक्षया
सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । द्वयोः क्षपकयोः
सामान्यवत् । परिहारशुद्धिसंयतेषु प्रमत्ताप्रमत्तयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति
जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयतेषूपशमकस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । तस्यैव क्षपकस्य सामान्यवत् । यथाख्याते अकषायवत् । संयतासंयतस्त
नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । असंयतेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्त-
रम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणत्रयंस्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । शेषाणां-
त्रयाणां सामान्यवत् ।
§ १२२. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनिषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टि-
सम्यग्मिथ्यादृष्टयोर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येय-
भागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे देशोने । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त२ है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम
एक३ पूर्वकोटी है । चारों क्षपकोंका अन्तर अवधिज्ञानियोंके समान है। दोनों केवलज्ञानियोंका
अन्तर ओघके समान है ।
§ १२१. संयम मार्गणाके अनुवादसे सामायिक शुद्धिसंयत और छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतोंमें
प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त४ है। दोनों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम
एक५ पूर्वकोटी है। दोनों क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है। परिहारशुद्धि संयतोंमें प्रमत्तसंयत
और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और
उत्कृष्ट ६ अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयतोंमें उपशमकका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। तथा उसी सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकका
अन्तर ओघके समान है। यथाख्यातमें अन्तर कषायरहित जीवोंके समान है। संयतासंयतका
नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। असंयतोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवको अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ
कम तेतीस सागर७ है। शेष तीन गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है।
§ १२२. दर्शनमार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवालोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान
है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा
१. —यमे उप-आ०, दि० १, दि० २, ता० । २. उपशमश्रेणि और प्रमत्त-अप्रमत्तका काल अन्तर्मुहूर्त होनेसे
मनःपर्ययज्ञानी प्रमत्त और अप्रमत्तका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त बन जाता है । ३. आठ वर्ष और
१२ अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि । ४. प्रमत्तको अप्रमत्तसे और अप्रमत्तको प्रमत्तसे अन्तरित कराके यह
अन्तर ले आना चाहिए। ५. आठ वर्ष और ग्यारह अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अपूर्वकरणका उत्कृष्ट
अन्तर है । अनिवृत्तिकरणका समयाधिक नौ अन्तर्मुहूर्त और आठ वर्ष कम एक पूर्वकोटि उत्कृष्ट अन्तर है।
६. प्रमत्त और अप्रमत्तकी परस्पर अन्तरित करानेसे यह अन्तर आ जाता है। ७. यह अन्तर सातवें नरकमें
प्राप्त होता है।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri