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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 558 में से

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पृष्ठ 173
  • ११८ § १४६ ] प्रथमोऽध्यायः ६१
    § १४२. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दशनाचक्षुर्दशनावधिदर्शनकेवलदर्शिनां सामान्यवत् ।
    § १४३. लेश्यानुवादेन षड्लेश्यानामलेश्यानां च सामान्यवत् ।
    § १४४. भव्यानुवादेन भव्यानां मिथ्यादृष्टचाद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् । अभव्यानां
    पारिणामिको भावः ।
    § १४५. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेः क्षायिको भावः । क्षायिकं ५
    सम्यक्त्वम् । असंयतत्वमौदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपशमिको भावः ।
    क्षायिकं सम्यक्त्वम् । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । क्षायिकं सम्यक्त्वम् । शेषाणां सामान्य-
    वत् । क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेः क्षायोपशमिको भावः । क्षायोपशमिकं सम्य-
    क्त्वम् । असंयतः पुनरौदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपशमिको भावः ।
    क्षायोपशामिकं सम्यक्त्वम् । औपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेरौपशमिको भावः । औप- १०
    शमिकं सम्यक्त्वम् । असंयतः पुनरौदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपश-
    मिको भावः । औपशमिकं सम्यक्त्वम् । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । औपशमिकं
    सम्यक्त्वम् । सासादनसम्यग्दृष्टेः पारिणामिको भावः । सम्यङ्मथ्यादृष्टेः क्षायोपशमिको भावः ।
    मिथ्यादृष्टेरौदयिको भावः ।
    § १४६. संज्ञानुवादेन संज्ञिनां सामान्यवत् । असंज्ञिनामौदयिको भावः । तदुभयव्यपदेश- १५
    रहितानां सामान्यवत् ।
    § १४२. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवाले, अचक्षुदर्शनवाले, अवधिदर्शनवाले और
    केवलदर्शनवाले जीवोंके ओघके समान भाव हैं।
    § १४३. लेश्यामार्गणाके अनुवादसे छहों लेश्यावाले और लेश्या रहित जीवोंके ओघके
    समान भाव हैं। २०
    § १४४. भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्योंके मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक ओघके
    समान भाव हैं। अभव्योंके पारिणामिक १ भाव हैं।
    § १४५. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिके क्षायिक
    भाव है। क्षायिक सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औदयिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और
    अप्रमत्तसंयतके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायिक सम्यक्त्व है। चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव २५
    है। क्षायिक सम्यक्त्व है। शेष गुणस्थानोंका ओघके समान भाव है। क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें
    असंयतसम्यग्दृष्टिके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायोपशमिक सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औद-
    यिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायोपशमिक
    सम्यक्त्व है। औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिके औपशमिक भाव है। औपशमिक
    सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औदयिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतके ३०
    क्षायोपशमिक भाव हैं। औपशमिक सम्यक्त्व है। चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव है।
    औपशमिक सम्यक्त्व है। सासादनसम्यग्दृष्टिके पारिणामिक भाव है। सम्यग्मिथ्यादृष्टिके क्षायोप-
    शमिक भाव है। मिथ्यादृष्टिके औदयिक भाव है।
    § १४६. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंके ओघके समान भाव हैं। असंज्ञियोंके औदयिक
    भाव हैं। तथा संज्ञी और असंज्ञी व्यवहारसे रहित जीवोंके ओघके समान भाव हैं। ३५
    १. यों तो ये भाव दर्शनमोहनीय और चारित्र मोहनीयके उदयादिकी अपेक्षा बतलाये गये हैं। किन्तु अभव्योंके
    'अभव्यत्व भाव क्या है' इसकी अपेक्षा भावका निर्देश किया है। यद्यपि इससे क्रम भंग हो जाता है तथापि
    विशेष जानकारीके लिए ऐसा किया है।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri