संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
२४४ शब्द संग्रह
(८)
कुंडलिया
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहीं ॥
सहज आसिकी नाहीं खाँड़ खाने की नाहीं ।
झूठ आसिकी करै मुलूक मैं जूती खाही ॥
जीते जी मरि जाय करै ना तन की आसा ।
आसिक को दिन राति रहै सूली पर बासा ॥
मान बड़ाई खोय नींद भरि नाहीं सोना ।
तिल भरि रक्त न माँस नहीं आसिक को रोना ॥
पलटू बड़े बेकूफ वे आसिक होने जाहिँ ।
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहीं ॥
(९)
झूलना
साहिब के दास कहाय यारो,
जगत की आस न राखिये जी ।
समरथ स्वामी को जब पाया,
जगत से दीन न भाखिये जी ॥
साहिब के घर मैं कौन कमी,
किस बात को अंतै आखिये जी ।
पलटू जो दुख सुख लाख परै,
वहि नाम सुधा रस चाखिये जी ॥
(१०)
झूलना
पहिले संसार से तोरि आवै,
तब बात पिया की पूछिये जी ।
पलटू साहिब ३२५
तरवार दोय है म्यान एकै,
किस भाँति से वा मैं कीजिये जी ॥
मीठे प्याले को दूर करौ,
कडु प्रेम पियाला पीजिये जी ।
पलटू जब सीस उतारि धरै,
तब राह पिया की लीजिये जी ॥
॥ सूरमा ॥
समुझि बूझि रन चढ़ना साधो, खूब लड़ाई लड़ना है ॥टेक॥
दम दम कदम परै आगे को, पीछे नाहिं पछरना है ।
तिल तिल घाव लगै जो तन मैं, खेत सेती क्या टरना है ॥१॥
सबद खैँचि समसेर¹ जेर करि, उन पाँचो को धरना है ।
काम क्रोध मद लोभ कैद करि, मन कर ठौरै मरना है ॥२॥
खड़ा रहै मैदान के ऊपर, उनकी चोट सँभरना है ।
आठ पहर असवार सुरत पर, गाफिल नाहीं परना है ॥३॥
सीस दिहा साहिब के ऊपर, किसकी डेर अब डेरना है ।
पलटू बाना रुंड² के ऊपर, अब क्या दूसर करना है ॥४॥
॥ पतिब्रता ॥
कुंडलिया
पतिबरता को लच्छन सब से रहै अधीन ॥
सब से रहै अधीन टहल वह सब की करती ।
सास ससुर औ भसुर ननद देवर से डरती ॥
सब को पोषन करै सभन की सेज बिछावै ।
सब को लेइ सुताय, पास तब पिय के जावै ॥
सूतै पिय के पास सभन को राखै राजी ।
ऐसा भक्त जो होय ताहि की जीती बाजी ॥
(१) शब्द रूपी तलवार । (२) धड़ ।
२६
२२६ शब्द संग्रह
पलटू बोलै मीठे बचन भजन मैं है लौलीन।
पतिबरता को लच्छन सब से रहै अधीन ॥
॥ साधु ॥
(१)
कुंडलिया
बड़ा होय तेहि पूजिये सन्तन किया बिचार ॥
सन्तन किया बिचार ज्ञान का दीपक लीन्हा।
देवता तैंतिस कोटि नजर मैं सब को चीन्हा ॥
सब का खंडन किहा खोजि के तीन निकारा।
तीनौं मैं दुइ सही मुक्ति का एकै द्वारा ॥
हरि को लिहा निकारि बहुर तिन मंत्र बिचारा।
हरि हैं गुन के बीच सन्त हैं गुन से न्यारा ॥
पलटू प्रथमै सन्त जन दूजे हैं करतार।
बड़ा होय तेहि पूजिये सन्तन किया बिचार ॥
(२)
कुंडलिया
सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल सन्त ॥
तैसे सीतल सन्त जगत की ताप बुझावैं।
जो कोइ आवै जरत मधुर मुख बचन सुनावैं ॥
धीरज सील सुभाव छिमा ना जात बखानी।
कोमल अति मृदु बैन बज्र को करते पानी ॥
रहन चलन मुसकान ज्ञान कौ सुगंधि लगावैं।
तीन ताप मिटि जाय संत के दरसन पावै ॥
पलटू ज्वाला उदर की रहै न मिटै तुरन्त।
सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल सन्त ॥
पलटू साहिब २२७
(३)
कुंडलिया
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
जैसे सहत कपास नाय चरखा मैं ओटै ।
रूई धरि जब तुमै हाथ से दोउ निभोटै१ ॥
रोम रोम अलग़ाय पकरि के धुनिया धूनी ।
पिउनो२ नँह३ दै काति सूत ले जुलहा बूनी ॥
धोबी भट्ठी पर धरी कुन्दीगर मुँगरी मारी ।
दरजी टुक टुक४ फारि जोरि के किया तयारी ॥
पर-स्वारथ के कारने दुख सहै पलटूदास ।
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
(४)
झूलना
सील सनेह सीतल बचन,
यही संतन की रीति है जी ।
सुनत वात के जुड़ाय जावै,
सब से करते वे प्रीति हैं जी ॥
चितवनि चलनि मुसकानि नवनि,
नहिँ राग द्वेष हार जीत है जी ।
पलटू छिमा संतोष सरल,
तिन कौ गावै स्रुति नीति५ है जी ॥
(५)
झूलना
पूरब पुन्न भये परगट, सतसंगति के बीच परी ।
आनँद भये जब संत मिले, वही सुभ दिन वहि सुभ घरी ॥
(१) नोचै । (२) रुई की मोटी बत्ती जिस से सूत निकालते हैं । (३) नाखून ।
(४) टुकड़े टुकड़े । (५) एक लिपि में "नेत" है ।
˙२२८ शब्द संग्रह
दरसन करत त्रय ताप मिटे, बिन कौड़ी दाम मैं जाय तरी।
पलटू आवागवन छूटा, जब चरनन की रज सीस धरी ॥
॥ दुष्ट ॥
कुंडलिया
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
सन असंत है एक काट के जल सैं सारै ।
कूँचै खैंचै खाल उपर से मुँगरा मारै ॥
तेकर बटि के भाँजि भाँजि कै बरतै रसरा ।
नर की बाँधै मुसुक बाँधते गउ औ बछरा ॥
अमरजाल फिर होय बझावै जलचर¹ जाई ।
खग मृग जीवा जंतु तेही मैं बहुत बझाई ॥
जिव दे जिव संतावते पलटू उनकी टेक ।
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
॥ ज्ञान ॥
(१)
कुंडलिया
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
आपुइ गई हिराय कवन अब कहै सँदेसा ।
जेकर पिय मैं ध्यान भई वह पिय के भेसा ॥
आगि माहिँ जो परै सोऊ अगनी ह्वै जावै ।
भृंगी कीट को भाँटि आपु सम लेइ बनावै ॥
सरिता बहि के गई सिंधु मैं रही समाई ।
सिव सक्ती के मिले नहीं फिर सक्ती आई ॥
पलटू दिवाल कहकहा² मत कोउ झाँकन जाय ।
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
(१) जल के जीव। (२) एक दीवार कहानी की जिसका होना चीन देश मैं
मशहूर है जिस पर चढ़ कर दूसरी ओर झाँकने से परिस्तान दीख पड़ता है
और ऐसा हर्ष होता है कि हँसी के मारे देखनेवाला बेइख़्तियार होकर उधर
कूद कर ग़ायब हो जाता है।
पलटू साहिब २२४
(२)
कुंडलिया
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ॥
ऐना टेढ़ा नाहिं टेढ़ को टेढ़े सूझै ।
जो कोइ देखे सोझ ताहि को सोझै बूझै ॥
जा को कछु नहिँ भेद भावना अपनी दरसै ।
जा को जैसी प्रीति मूरत सो तैसी परसै ॥
दुर्जन के दुर्बुद्धि पाप से अपने जरते ।
सज्जन के है सुमति सुमति से अपने तरते ॥
पलटू ऐना संत हैं सब देखै तेहि माहिँ ।
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ॥
(३)
अरिल
पहिले हो बैराग भक्ति तब कीजिये ।
सतसंगति के जोग ज्ञान तब लीजिये ॥
ऐसे उपजै ज्ञान भक्ति को पाइ कै ।
अरे हाँ पलटू ऊपरै लीजै मारि ठीक ठहराइ कै ॥
(४)
कहिबे से क्या भया भाई, जब ज्ञान आपु से होइ ॥टेक॥
अललपच्छ को चेटुका,१ वा को कौन करै उपदेस ।
उलटि मिलै परिवार मैं, वा से कौन कहै संदेस ॥ १ ॥
ज्योँ सिसु१ होत मराल२ के, वा को कौन सिखावै ज्ञान ।
नीर कँहै अलगाइ कै, वह छीर करतु है पान ॥ २ ॥
सिंह कै बच्चा गिरि पर्यो, वह खेलत तुरत सिकार ।
वा को कौन सिखावई, वो हस्ती डारत मार ॥ ३ ॥
(१) बच्चा। (२) हंस।
२३० शब्द संग्रह
संत को कौन सिखावता, उन्ह अनुभव भा परकास ।
सिखई बुधि केहि काम की, जो हृदय न पलटूदास ॥४॥
॥ सतसंग ॥
(१)
कुंडलिया
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
लोहा महँग बिकान छुए से कीमत निकरी ।
चंदन के परसंग चँदन भई बन की लकरी ॥
जैसे तिल का तेल फूल सँग महँग बिकाई ।
सतसंगति मैं पड़ा संत भा सदन कसाई ॥
गंग मैं है सुभगंग मिली जो नारा सोती ।
सीप बीच जो पड़ै बूंद सो होवै मोती ॥
पलटू हरि के नाम से गनिका चढ़ी बिमान ।
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
(२)
रेख़ता
बिना सतसंग ना कथा हरिनाम की,
बिना हरिनाम ना मोह भागै ।
मोह भागे बिना मुक्ति ना मिलैगी,
मुक्ति बिनु नाहिँ अनुराग लागै ॥
बिना अनुराग के भक्ति ना होयगी,
भक्ति बिनु प्रेम उर नाहिँ जागै ।
प्रेम बिनु राम ना राम बिनु संत ना,
पलटू सतसंग बरदान माँगै ॥
पलटू साहिब २३१
॥ गुप्त ॥
कुंडलिया
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
तिन तिन चले छिपाय प्रगट मैं होय हंरक्कत ।
भीड़ भाड़ से डेरै भीड़ मैं नहीं बरक्कत ॥
धनी भया जब आप मिली हीरा की खानी ।
ठग है सब संसार जुगत से चलै अपानी ॥
जो ह्वै रहते गुप्त सदा वह मुक्ति मैं रहते ।
उन पर आवै खेद प्रगट जो सब से कहते ॥
पलटू कहिये उसी से जो तन मन दै लै जाय ।
जिन जिन पाया बस्तु को तिन तिन चले छिपाय ॥
॥ वैराग ॥
(१)
अरिल
आठ पहर की मार बिना तरवार की ।
चूके सो नहिं ठाँव लड़ाई धार की ॥
उस ही से यह बनै सिपाही लाग का ।
अरे हाँ पलटू पड़ै दाग पर दाग पंथ बैराग, का ॥
(२)
काम क्रोध बंसि किहा नींद औ भूख को ।
लोभ मोह बसि किहा दुक्ख औ सुक्ख को ॥
पल मैं कोस हजार जाय यह डोलता ।
अरे हाँ पलटू वह ना लागा हाथ जौन यह बोलता ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
पड़ा रहु संत के द्वारे, बनत बनत बनि जाय ॥ टेक ॥
तन मन धन सब अरपन करिके, धके धनी के खाय ॥१॥
२३२ शब्द-संग्रह
स्वान बिर्त आवै सोइ पावै१, रहै चरन लौ लाय ॥२॥
मुरदा होय टरै नहिँ टारे, लाख कहो समुझाय ॥३॥
पलटूदास काम बनि जावै, इतने पर ठहराय ॥४॥
(२)
कुंडलिया
काजर दिये से का भया ताकन को ढब नाहिँ ॥
ताकन को ढब नाहिँ ताकन की गति है न्यारी ।
इकटक लेवै ताकि सोई है पिय की प्यारी ॥
ताकै नैन मिरोरि नहीं चित अंतै टारै ।
बिन ताके केहि काम लाख कोउ नैन सँवारै ॥
ताके मैँ है फेर फेर काजर मैँ नाहीं ।
भंगि२ मिली जो नाहिँ नफा क्या जोग के माहीं ॥
पलटू सनकारत३ रहा पिय को खिन खिन माहिँ ।
काजर दिये से का भया ताकन को ढब नाहिँ ॥
(३)
रेखता
नाचना नाचु तो खोलि घूँघट कँहै४,
खोलि के नाचु संसार देखै ।
खसम रिझाव तो ओट को छोड़ि दे,
भर्म संसार कौ दूरि फेकै ॥
लाज किसकी करै खसम से काम है,
नाचु भरि पेट फिर कौन छैकै ।
दास पलटू कहै तुहीँ सोहागिनी,
सोव सुख सेज तू खसम एकै ॥
(१) खाय । (२) युक्ति । (३) इशारा करना । (४) को ।
पलटू साहिब २३३
(४)
रेख़्ता
सुंदरी पिया की पिया को खोजती,
भई बेहोस तू पिया के कै।
बहुत सी पद्मिनी खोजती मरि गईं,
रटत ही पिया पिया एक एकै॥
सती सब होत हैं जरत बिनु आगि से,
कठिन कठोर वह नाहिं झाँकै।
दास पलटू कहै सीस उतारि के,
सीस पर नाचु जो पिया ताकै¹॥
(५)
भूलना
केतिक जुग गये बीति माला के फेरते।
छाला परि गये जीभ राम के टेरते॥
माला दीजे डारि मनै को फेरना।
अरे हाँ पलटू मुँह के कहे न मिलै दिलै बिच हेरना॥
(६)
अरिल
जीवन है दिन चारि भजन करि लीजिये।
तन मन धन सब वारि संत पर दीजिये॥
संतहि से सब होइ जो चाहै सो करैँ।
अरे हाँ पलटू संग लगे भगवान संत से वे डेरैँ॥
॥ दीनता ॥
(१)
कुंडलिया
दूसर पलटू इक रहा भक्ति दई तेहि जान॥
भक्ति दई तेहि जान नाम पर पख्यो मोकहँ।
गिरा परा धन पाय छिपायौँ मैं ले ओकहँ॥
(१) देखै।
३०
:
२३४ शब्द संग्रह
लिखा रहा कुछ आन कर्म मैं दीन्हा आनै ।
जानौँ महीं अकेल कोऊ दूसर नहिं जानै ॥
पाछे भा फिर चेत देय पर नाहीं लीन्हा ।
आखिर बड़े की चूक जोई निकसा सोई कीन्हा ॥
पलटू मैं पापी बड़ा भूल गया भगवान् ।
दूसर पलटू इक रहा भक्ति दई तेहि जान ॥
(२)
कुंडलिया
पतित-पावन बाना धख्यो तुमहिँ परी है लाज ॥
तुमहिँ परी है लाज बात यह हम ने बूझी ।
जब तुम बाना धख्यो नाँहिँ तब तुम कहँ सूझी ॥
अब तो तारे बनै नहीं तो बाना उतारो ।
फिर काहे को बड़ा बाच जो कहिके हारो ॥
आगहिँ तुम गये चूक दोष नहिँ दीजै मेरो ।
तुम यह जानत नाहिं पतित होइहैं बहुतेरो ॥
पलटू मैं तो पतित हाँ कियो असुभ सब काज ।
पतित-पावन बाना धख्यो तुमहिँ परी है
पलटू साहिब २३५
हरि धरि मेरो रूप करै सब काम है।
अरे हाँ पलटू बीच मँहै इक नाम मोर बदनाम है॥
॥ निन्दक ॥
(१)
कुंडलिया
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
काम हमारा होय बिना कौड़ी कौ चाकर ।
कमर बाँधि के फिरै करै तिहुँ लोक उजागर¹ ॥
उसे हमारी सोच पलक भर नाहिं बिसारी ।
लगो रहै दिन रात प्रेम से देता गारी ॥
भक्त कँहै दृढ़ करै जगत को भरम छुड़ावै ।
निन्दक गुरू हमार नाम से वही मिलावै ॥
सुनि के निन्दक मरि गया पलटू दिया है रोय ।
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
(२)
रेख़्ता
देखि के निंदकहिँ करौँ परनाम मैं,
धन्य महराज तुम भक्ति धोया ।
किहा निस्तार तुम आइ संसार मैं,
भक्त कै मैल बिनु दाम खोया ॥
भयो परसिद्ध परताप से आप के,
सकल संसार तुम सुजस बोया ।
दास पलटू कहैं निंदक के मुए से,
भया अकाज मैं बहुत रोया ॥
(१) रोशन, मशहूर ।
२३६ शब्द संग्रह
॥ तीर्थ व्रत ॥
अरिल
तीरथ व्रत में फिरे बहुत चित लाइ कै ।
जल पखान को पूजि मुए पछिताइ कै ॥
बस्तु न बूझी जाइ अपाने हाथ में ।
अरे हाँ पलटू जो कुछ मिलै सो मिलै संत के साथ में ॥
॥ मंगल ॥
जनमिउँ दुख की राति, परिउँ भौसागर हो ।
सोइ गइउँ भ्रम माहिँ, कुमति कै आगर हो ॥ १ ॥
सतगुरु दिहिनि जगाइ, उठिउँ अकुलाई हो ।
टूटि गइल भ्रम फंद, परम सुख पाई हो ॥ २ ॥
पिय को दिहिनि मिलाइ, हिये मोहिँ लीन्हा हो ।
अपनी दासी जानि, परम पद दीन्हा हो ॥ ३ ॥
सत्त सुकृति कै घैला१, प्रेम कै लेजुर२ हो ।
पनियाँ भरौँ डकोरि३, माँग झरि सेंदुर हो ॥ ४ ॥
सासु मोरि सुतै गजओबरि४, ननद मोरि अँगना हो ।
हम धन सूतैँ धवराहर५, पिय सँग जगना हो ॥ ५ ॥
झिरिहिरि बहै बयारि, अमी रस ढरकै हो ।
वरमी६ नौरँगिया कै डारि, चंदन गछ मरकै६ हो ॥ ६ ॥
तेहि चढ़ि बोलै हंस, सबद सुनि बाउर हो ।
मंगल पलटूदास, जगति कै नाउर७ हो ॥ ७ ॥
(१) घड़ा । (२) रस्सी । (३) पानी को झकझोर कर जिसमें खर कतवार
हट जाय । (४) इतना बड़ा कमरा जिस के दरवाज़े में से हाथी चला जाय ।
(५) ऊपर का कोठा । (६) झुकना । (७) नाऊ जिस के शुभ अवसरों पर
पलटू साहिब २३७
॥ मिश्रित ॥
(१)
कुंडलिया
बार बार बिनती करै, पलटूदास न लेइ ॥
पलटू दास न लेइ रहै कर जोरे ठाढ़ी ।
सरनागति मैं रहैँ सरन बिनु लागै गाढ़ी१ ॥
गोड़ दाबि मैं देउँ चरन धै सेवा करिहैँ ।
चौका देइहैँ लीपि बहुरि मैं पानी भरिहैँ ॥
पैँड़ा देउँ बुहारि सबन कै जूठ उठावौँ ।
जनि दुरियावहु मोहिँ रहै मैं इहवाँ पावौँ ॥
मुक्ति रहै द्वारे खड़ी लट से झाडू देइ ।
बार बार बिनती करै पलटूदास न लेइ ॥
(२)
कुंडलिया
बनिया पूरा सोई है जो तौलै सतनाम ॥
जो तौलै सतनाम छिमा का टाट बिछावै ।
प्रेम तराजू करै बाट बिस्वास बनावै ॥
बिबेक की करै दुकान ज्ञान का लेना देना ।
गादी है संतोष नाम का मारै टेना ॥
लादै उलदै भजन बचन फिर मीठे बोलै ।
कुंजी लावै सुरत सबद का ताला खोलै ॥
पलटू जिसकी बनि परी उसी से मेरा काम ।
बनिया पूरा सोई है जो तौलै सतनाम ॥
(१) गाढ़ = दुख ।
२३८ शब्द संग्रह
(३)
कुंडलिया
चिन्ता की लगी आग है जरै सकल संसार ॥
जरै सकल संसार जरत निरपति को देखा ।
बादसाह उमराव जरत हैं सैयद सेखा ॥
सुर नर मुनि सब जरैं जती जोगी सन्यासी ।
पंडित ज्ञानी चतुर जरैँ कनफटा उदासी ॥
जंगम सेवरा जरैँ जरैँ नागा बैरागी ।
कोउ न बचते आगि दुपहरी लागी आगी ॥
पलटू बचते संत जन जिन किया नाम आधार ।
चिन्ता की लगी आग है जरै सकल संसार ॥
(४)
अरिल
सब भैँड़ो की राह चले हैं जूटि१ के ।
आसिक बीर अकेल चला है फूटि के ॥
उलटि के खेलै खेल भया मन मगन मेँ ।
अरे हाँ पलटू छुटा भुइँचपा जाय एक ठो गगन में ॥
(५)
अरिल
खाला२ कै घर नाहिं भक्ति है नाम की ।
दाल भात है नाहिं खाये के काम की ॥
साहिब का घर दूर सहज ना जानिये ।
अरे हाँ पलटू गिरै तो चकनाचूर बचन को मानिये ॥
(६)
अरिल
माया ठगनी बड़ी ठगे यह जात है ।
बचै न या से कोऊ लगी दिन रात है ॥
कौड़ी नाहीं संग करोरनि जोरि कै ।
अरे हाँ पलटू गये हैं राजा रंक लँगोटो छोरि कै ॥
(१) झुंड के। (२) मौसी ।
तुलसी साहिब (हाथरसवाले)
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ २२६]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
कोइ सतगुरु देव री बताइ, चरन गहौँ ताहि के ॥टेक॥
चहुँ दिसि ढूँढ़ि फिरी कोइ भेदी, पूछत हौँ गुहराय ।
उन से कहौँ बिथा सब अपनी, केहि बिधि जीव जुड़ाय ॥१
जो कोइ सखी सुहागिनि होवै, कहै तन तपन बुझाय ।
पिउ की खोलि खबर कहै मो से, मरौँ री बिकल करि हाय ॥२
जो न्यामत दुनिया दौलत की, सो सब देउँ बहाय ।
बारम्बार वारि तन डारौँ, यह कहा मोल बिकाय ॥३॥
बिन स्वामी सिंगार सुहागिनि, लानत तोबा ताय।
पिय बिन सेज बिछावै ऐसी, नारि मरै बिख खाय ॥४॥
सतगुरु बिरहिनि बान कलेजे, रोवै और चिल्लाय ।
हाय हाय हिय मैं निसि बासर, हर दम पीर पिराय ॥५॥
यहि झुँड मैं कोइ पाऊ पियारी, पिया दुलारी आहि¹ ।
मैं दुखिया हौँ दर्द दिवानी, प्रीतम दरस लखाय ॥६॥
तुलसी प्यास बुझै प्यारे से, चढ़ि घर अधर समाय ।
किरपावंत संत समझावैँ, और न लगै उपाय ॥ ७ ॥
(२)
जिनके हिरदे गुरु संत नहीं :
उन नर औतार लिया न लिया ॥ टेक ॥
सूरत बिमल बिकल नहिँ जा के ।
बहु बक ज्ञान किया न किया ॥ १ ॥
(१) है।
२४० शब्द संग्रह
करम काल बस उद्र१ निहारा ।
जग बिच मूढ़ जिया न जिया ॥ २ ॥
अगम राह रस रीति न जानी ।
बहु सतसंग किया न किया ॥ ३ ॥
नाम अमल घट घोंटि न पीया ।
अमल अनेक पिया न पिया ॥ ४ ॥
मोटे मात जात ज़िंदगी मैं ।
सिर धरि पैर छुवा न छुवा ॥ ५ ॥
तुलसीदास साध नहिँ चीन्हा ।
तन मन धन न दिया न दिया ॥ ६ ॥
(३)
अरिल
संत मता है सार और सब जाल पसारा ।
परमहंस जग भेष बहे सब मन की लारा ॥
संत बिना नहिँ घाट बाट एको नहिँ पावै ।
अरे हाँ रे तुलसी अटक भटकि भ्रमखान संत बिन भव मैं आवै ॥
(४)
अरिल
भव जल अगम अथाह थाह नहिँ मिलै ठिकाना ।
सतगुरु केवट मिलै पार घर अपना जाना ॥
जग रचना जंजाल जीव माया ने घेरा ।
अरे हाँ रे तुलसी लोभ मोह बस परे करैं चौरासी फेरा ॥
॥ चितावनी ॥
(१)
रेख़्ता
जगत मद मान मैं माता । खुदी का खौफ नहिँ लाता ॥
कजा सिर पर खड़ी द्वारे । फिरिस्ते तीर तकि मारे ॥१॥
(१) पेट ।
तुलसी साहिब (हाथरसवाले) २४१
कमानी काल के हाथा । करै जम जीव की घाता ॥
पड़ा मगरूर¹ क्या सोवै । बहुर फिर सीस धरि रोवै ॥२॥
अगर यों सोच अपने सें । गये दिन बीत सपने में ॥
बदन सही पवन पानी । मलामत² हाड़ मिल सानी ॥३॥
गंदगी बीच अंदर में । बदन बदबोय मंदर में ॥
अरे नित क्या अन्हाता है । मैल मन का न जाता है ॥४॥
करेले नीम की भाई । कभी जावै न कड़वाई ॥
अरे दुरगंध का भाँड़ा । निरख कोइ संत ने छाड़ा ॥५॥
खलक दो दिन तमासा यों । परख पानी बतासा ज्यों ॥
अगर यों जान जिंदगानी । अबर ओला घुलै पानी ॥६॥
अवस³ तन यों बिनसता है। इधर घर का न रस्ता है ॥
मिर्ग की नाभि कस्तूरी । भटक ढूँढै जो बन मूरी ॥७॥
तेरा महबूब तेरे में । वस्तु गह ढूँढ़ डेरे में ॥
सगुनिया संत से पावै । आप मैं आप दरसावै ॥८॥
करै सतसंग मन टूटै । मलामत बुद्धि की छूटै ॥
गुरू मिल मैल कूँ काढ़ै । ज्ञान की उग्रता⁴ बाढ़ै ॥ ९ ॥
सुरत जब सीलता पावै । गगन की राह चढ़ जावै ॥
होय पति प्रीति निरधारा । मिलै तुलसी पदम प्यारा ॥१०॥
(२)
क्या सोवत गाफिल चेत, सिर पर काल खड़ा ॥टेक॥
जोर जुलम की रोति बिचारी, करि माया से हेत ।
जम की जबर खबर नहिँ जानी, बाँधि नरक दुख देत ॥१
बिनसै बदन अगिन बिच जारैँ, खीर खाँड रस लेत ।
फिरिफिरि काल कमान चढ़ावै, मार लेत खुल खेत ॥२॥
(१) अहंकारी । (२) गंदगी । (३) व्यर्थ । (४) तेज़ी ।
२१
२४२ शब्द संग्रह
बिष रस रंग संग बहु कीन्हा, करि करि बैस ब्रितेत१ ।
वृद्ध बनाय बूढ़ तन भइया, कारे केस सपेद ॥३॥
सुत दारा आदर अलसाने, बुढ़वा मरै परेत ।
छलबल माया करि गई रे, या दुनिया के हेत ॥४॥
मनी मान से धनी न चीन्हा, चिड़िया चुगि गइ खेत ।
तुलसी चरन सरन सतगुरु बिन, ग्रासत रवि जस केत ॥५॥
॥ बिरह ॥
(१)
सखी मोहिं नींद न आवै री । एरी बैरन बिरह जगावै ॥१
सूनी सेज पिया बिन ब्याकुल । पीर सतावै री ॥२॥
रैन न चैन दिवस दुख ब्यापै । जग नहिं भावै री ॥३॥
तलफत बदन बिना सुख सइयाँ । सब जरि जावै री ॥४॥
बिषधर२ लहर डसै नागिन सी । ज्यौं जस खावै री ॥५॥
देवै मौत दई बिरहन को । होते मरि जावै री ॥६॥
कैफ़३ बिना तुलसी तन सूखै । जिय तरसावै री ॥७॥
(२)
पी की मोहिं लहर उठत खुटत रैन नाहीं ।
कहा कहूँ करमन की रेख हिये की दरदाई ॥ १ ॥
अँखियाँ दुर दुरत नीर सखियाँ सुख नाहीं ।
पपिहा पिउ पिउ के बोल खोलत खिसियाई ॥ २ ॥
जियरा जरजर पिरात संत रटत साईं ।
लाई सुति चरन सरन हित चित चिन्हवाई ॥ ३ ॥
मेरे मन की मुराद साध संगत चाही ।
खोजै खुल खुल बिसेष लेखै अपनाई ॥ ४ ॥
(१) ख़तम । (२) साँप । (३) नशा ।
तुलसी साहिब (हाथरसवाले) २४३
तुलसी तत मत विलास पास प्रेम छाई ।
पाई घर धधक धीर रमक सी जनाई ॥ ५ ॥
(३)
मेरे दरद की पीर कसक किस से मैं कहूँ ॥ टेक ॥
ऐसा हकीम होय जोई जान दे दहूँ ।
खटकै कलेजे बीच बान तोर से सहूँ ॥ १ ॥
घायल की समझ सूर चूर घाव मैं रहूँ ।
हीये हवाल हाल गला काटि के लहूँ ॥ २ ॥
जैसे तड़पती मीन नीर पीर ज्योँ सहूँ ।
जैसे चकोर चंद चाह चित्त से चहूँ ॥ ३ ॥
सोची सुबह और साम पिया धाम कस गहूँ ।
तुलसी बिना मिलाप छुरी मार मर रहूँ ॥ ४ ॥
(४)
प्यारी पिया पीर खली आधी रतियाँ ॥ टेक ॥
सोवत समझ उठी अपने मैं । क्या कहूँ बरनि बिपतियाँ ॥१
चोली बन्द बदन बिच खटकै । उमँग उमँग फटै छतियाँ ॥२
रोवत रैन चैन नहिँ चित मैं । कूर करम की बतियाँ ॥३
तुलसी देस ऐस बिन पिय के । सोच लिखूँ कित पतियाँ ॥४
(५)
सावन
पिय बिन सावन सुख नहीं, हिये बिच उठत हिलोर ।
बोल बचन भावै नहीं, तन मन तड़पि अतोल ॥ १ ॥
पिय बिन बिरहन बावरी, जिय जस कसकत हूल ।
सूल उठै पति पीर की, धन संपत सुख धूल ॥ २ ॥
इत बैरी बदरा भये, गरजि घुमरि घनघोर ।
घुमरि घुमरि घर द्वार मैं, कूकै दादुर मोर ॥ ३ ॥