संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ शब्द-संग्रह
स्वान बिर्त आवै सोइ पावै१, रहै चरन लौ लाय ॥२॥
मुरदा होय टरै नहिँ टारे, लाख कहो समुझाय ॥३॥
पलटूदास काम बनि जावै, इतने पर ठहराय ॥४॥
(२)
कुंडलिया
काजर दिये से का भया ताकन को ढब नाहिँ ॥
ताकन को ढब नाहिँ ताकन की गति है न्यारी ।
इकटक लेवै ताकि सोई है पिय की प्यारी ॥
ताकै नैन मिरोरि नहीं चित अंतै टारै ।
बिन ताके केहि काम लाख कोउ नैन सँवारै ॥
ताके मैँ है फेर फेर काजर मैँ नाहीं ।
भंगि२ मिली जो नाहिँ नफा क्या जोग के माहीं ॥
पलटू सनकारत३ रहा पिय को खिन खिन माहिँ ।
काजर दिये से का भया ताकन को ढब नाहिँ ॥
(३)
रेखता
नाचना नाचु तो खोलि घूँघट कँहै४,
खोलि के नाचु संसार देखै ।
खसम रिझाव तो ओट को छोड़ि दे,
भर्म संसार कौ दूरि फेकै ॥
लाज किसकी करै खसम से काम है,
नाचु भरि पेट फिर कौन छैकै ।
दास पलटू कहै तुहीँ सोहागिनी,
सोव सुख सेज तू खसम एकै ॥
(१) खाय । (२) युक्ति । (३) इशारा करना । (४) को ।