संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
१२८ शब्द संग्रह
धरनी गति नहिँ आनि, करहु जस जानहु हो ।
मिलहु प्रगट पट१ खोलि, भरम जनि मानहु हो ॥६॥
(३)
हरि जन हरि के हाथ बिकाने ।
भावै कहो जग धिग जीवन है, भावै कहो बौराने ॥१॥
जाति गँवाय अजाति कहाये, साधु सँगति ठहराने ।
मेटो दुख दारिद्र परानो२, जूठन खाय अघाने ॥२॥
पाँच जने परबल परपंची, उलटि परे बंदिखाने ।
छुटी मजूरी भये हजूरी, साहिब के मन माने ॥३॥
निरममता निरबैर सभन तैं, निरसंका निरबाने ।
धरनी काम राम अपने तैं, चरन कमल लपटाने ॥ ४ ॥
॥ बिनय ॥
(१)
प्रभुजी अब जिनि मोहिँ बिसारो ।
असरन-सरन अधम-जन-तारन, जुग जुग बिरद तिहारो ॥१॥
जहँ जहँ जनम करम बसि पायो, तहँ अरुझे रस खारो।
पाँचहुँ के परपंच भुलाना, घरेउ न ध्यान अधारो ॥२॥
अंध गर्भ दस मास निरंतर, नखसिख सुरति सँवारी ।
मज्जा३ मुत्र अग्नि मल कृम जहँ, सहजै तहँ प्रतिपारी ॥३॥
दीजै दरस दयाल दया करि, गुन ऐगुन न बिचारो ।
धरनी भजि४ आयो सरनागति, तजि लज्जा कुल गारो५॥४॥
(२)
तुहि अवलंब हमारे हो ।
भावै पगु नाँगे करो, भावै तुरय६ सवारे हो ॥ १ ॥
(१) घूँघट। (२) भागा। (३) मज्जा = हड्डी का गूदा या सड़ा पंछा। (४) भाग
कर। (५) गाली। (६) घोड़ा।
धरनी दासजी १२४
जनम अनेकन बादि गे, निजु नाम विसारे हो।
अब सरनागत रावरी, जन करत पुकारे हो ॥ २ ॥
भवसागर बेरा¹ परो, जल माँझ मँझारे हो।
संतत² दीनदयाल ही, करि पार निकारे हो ॥ ३ ॥
धरनी मन बच कर्मना, तन मन धन वारे हो।
अपने बिरद निबाहिये, नहिं बनत बिचारे हो ॥ ४ ॥
(३)
मो सौँ प्रभु नाहिं दुखित, तुम सौँ सुखदाई ॥ टेक ॥
दीनबन्धु बान तेरो, आजु करु सहाई।
मो सौँ नहिँ दीन और, निरखो जग माँई ॥ १ ॥
पतित-पावन निगम कहत, रहत हौ कित गोई³।
मो सौँ नहिँ पतित और, देखो जग टोई ॥ २ ॥
अधम के उधारन तुम, चारो जुग ओई।
मो तैँ अब अधम आहि, कवन धौँ बड़ोई ॥ ३ ॥
धरनी मन मनिया, इक ताग मैं परोई।
आपन करि जानि लेहु, कर्म फंद छोई⁴ ॥ ४ ॥
॥ उपदेश ॥
कबित्त-जीव की दया जेहि जीव व्यापै नहीं,
भूखे न अहार प्यासे न पानी।
साधु से संग नहिँ सबद से रंग नहिँ,
बोलि जानै न मुख मधुर बानी ॥
एक जगदीस को सीस अरपै नहीं,
पाँच पच्चीस बहु बात ठानी।
राम को नाम निज धाम बिस्राम नहिँ,
धरनी कह धरनि मौँ धिग सो प्रानी⁵ ॥
(१) बेड़ा, नाव। (२) निरंतर। (३) गुप्त। (४) छोड़ा कर, काट कर।
(५) पृथ्वी पर ऐसे जीव को धिक्कार है।
१७
जगजीवन साहिब
————
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ११७]
॥ चितावनी ॥
(१)
अरे मन देहु तजि मतवारि ।
जे जे आये जगत महँ इहि, गये ते ते हारि ॥ १ ॥
नाँहिँ सुमिर्यौ नाम काँ, सब गये काम बिगारि ।
आपु काँ जिन बड़ा जान्यो, काल खायो मारि ॥ २ ॥
जानि आपुहिँ छोट जग, रहि रहौ डोरि सँभारि ।
बैठि कै चौगान निरखहु, रूप छवि अनुहारि१ ॥ ३ ॥
रहौ थिर सतसंग बासी, देहु सकल बिसारि ।
जगजिवन सतगुरु कृपा करि, लेहिँ सबै सँवारि ॥ ४ ॥
(२)
अरे मन समुझि करु पहिचान ।
को तैँ अहसि कहाँ तैँ आयसि, काहे भर्म भुलान ॥१॥
सुधि सँभारु बिचार करिकै, बूझु पाछिल ज्ञान ।
नात यहि दुइ चारि दिन का, अचल नहिँ अस्थान ॥२॥
लोक गढ़ यहु कोट काया, कठिन माया बान ।
लाग सब के बचे कोउ नहिँ, हन्यो सब को ध्यान ॥३॥
खबरदार बेखबर हो नहिँ, ओट नाम निरबान ।
जगजिवन सतगुरु राखि लैहैँ, चरन रहु लपटान ॥४॥
——————————————
(१) सदृश।
जगजीवन बानी १३१
(३)
हैं हैं जग त्यागि मन, चलिये सिर नाई ।
नाम जानि दीन हीन, करिये दीनताई ॥ १ ॥
अहंकार गर्व तैं, सब गये हैं बिलाई ।
रावन के सीस काटि, राम की दुहाई ॥ २ ॥
जिन जिन गुमान कीन्ह, मारि गर्दही मिलाई ।
साधि साधि बाँधि प्रीति, ताहि पर सहाई ॥ ३ ॥
परसहु गुरु सीस डारि, दुनिया बिसराई ।
जगजीवन आस एक, टेक रहिये लगाई ॥ ४ ॥
(४)
मन महँ नाहिं बूझत कोय ।
नहीं बसि कछु अहै आपन, करै करता होय ॥ १ ॥
कहत मैं तैं सूझि नाहीं, भर्म भूला सोय ।
पड़े धारा मोह की बसि, डारि सर्बस खोय ॥ २ ॥
करै निंदा साध की, परि पाप बूड़ै सोय ।
अंत फजिहत होहिँगे, पछिताय रहिहैं रोय ॥ ३ ॥
कहैं समुझि विचारि कै, गहि नाम दृढ़ घरु टोय ।
जगजीवन ह्वै रहहु निर्भय, चरन चित्त समाय ॥ ४ ॥
(५)
कहाँ गयो मुरली को बजइया, कहाँ गयो रे ॥ टेक ॥
एक समय जब मुरली बजायो, सब सुनि मोहि रह्यो रे ।
जिन के भाग भये पूर्बज१ के, ते वहि संग गह्यो रे ॥ १ ॥
खबरि न कोई केहुँ की पाई, को धौँ कहाँ गयो रे ।
ऐसे करता हरता यहि जग, तेऊ थिर न रह्यो रे ॥ २ ॥
(१) पूर्व जन्म ।
१३२ शब्द संग्रह
रे नर बौरे तैँ कितान है, केहिँ गनती माँ है रे ।
जगजीवनदास गुमान करहु नहिँ, सत्त नाम गहि रहु रे ॥३
॥ बिरह ॥
(१)
सखी री करौँ मैं कौन उपाई ।
मैं तौ ब्याकुल निसि दिन डोलौँ, उनहिँ दरद नहिँ आई॥१
काह जानि कै सुधि बिसराई, कछु गति जानि न जाई ।
मैं तौ दासी कलपौँ पिय बिनु, घर आँगन न सुहाई ॥२॥
तलफित लफि जल बिना मीनज्यौँ, अस दुख मोहिँ अधिकाई ।
निर्गुन नाह¹ बाँह गहि सेजिया, सूतहि हियरा जुड़ाई ॥३॥
बिन सँग सूते सुख नहिँ कबहूँ, जैसे फूल कुम्हिलाई ।
ह्वै जोगिनि मैं भस्म लगायौँ, रहिउँ नयन टक लाई ॥४॥
पैयाँ परौँ मैं निरखि निरखि कै, धहिँ का देहु मिलाई ।
सुरति सुमति करि मिलहिँ एक ह्वै, गगन मंदिल चलिजाई ५
रहि यहि महल टहल महँ लागी, सत्त की सेज बिछाई ।
हम तुम उनके सूति रहहिँ सँग, मिटै सबै दुचित्ताई ॥६॥
जगजीवन सिव ब्रह्मा बिस्नू, मन नहिँ रहि ठहराई ।
रबि ससि करि कुरबान ताहि छबि, पीवौ दरस अघाई ॥७
(२)
उनहीँ सेँ कहियो मोरी जाय ॥ टेक ॥
ए सखि पैयाँ परि मैं बिनवौँ, काहे हमैँ डारिन बिसराय ॥१
मैं का करौँ मोर बस नाहीं, दीन्ह्यो अहै मोहिँ भटकाय ॥२
ए सखि साईँ मोहिँ मिलावहु, देखि दरस मोर नैन जुड़ाय ॥३
जगजीवन मन मगन होउँ मैं, रहौँ चरन कमल लपटाय ४
(१) पति ।
Look at the letter: It has: Top horizontal line. A candrabinduँ` on top.
Then, under the horizontal line:
There is a vertical stroke down? No, it's a curve:
Wait, look at 'भ' in line 9: "भये".
The top of 'भ' has a little knob/loop!
In line 25: does it have a little knob?
Wait! Look at the left:
It goes down... wait, it DOES have a line at the top, but wait, look at 'स' in 'सुखित' (line 24):
The left stroke starts from the bar, goes down-left, then hooks in.
In line 25: it looks almost identical to 'स'. But wait, look at 'भँवरगुफा' vs 'सँवरगुफा':
Could a human transcriber read it as "भँवरगुफा"?
Wait, why would it be 'स'? If someone reads it as 'भँवरगुफा', they know the meaning is "भँवरगुफा". If someone reads it purely visually, could they see 'भँवरगुफा'?
Wait! Let me look at the top left of the letter:
Wait, is that a 'भ'?
Wait, look at the left side of the letter: it has a loop!
Wait, look at the space between the left part and the vertical stem:
It is quite
१३४ शब्द संग्रह
॥ प्रेम ॥
(१)
ऐसे साईँ की मैं बलिहरियाँ री ।
ए सखि संग रंग रस मातिउँ, देखि रहिउँ अनुहरियाँ री॥१
गगन भवन माँ मगन भइउँ मैं, बिनु दीपक उजियरियाँ री
झलकि चमकि तहँ रूप बिराजै, मिटी सकल अँधियरियाँ री२
काह कहौँ कहिबे की नाहीं, लागि जाहि मन मँहियाँ री ।
जगजीवन वह जोती निरमल, मोती हीरा वरियाँ१ री ॥३॥
(२)
साईँ तुम सों लागो मन मोर ॥ टेक ॥
मैं तौ भ्रमत फिरौँ निसुबासर,
चितवौ तनिक कृपा करि कोर ॥ १ ॥
नाहिं बिसरावहु नहिं तुम बिसरहु,
अब चित राखहु चरनन ठौर ॥ २ ॥
गुन ऐगुन मन आनहु नाहीं,
मैं तो आदि अंत को तोर ॥ ३ ॥
जगजीवन बिनती करि माँगै,
देहु भक्ति बर जानि कै
, or actually it's printed as ६ or ९? It looks like ॥६॥ or ॥९॥? Wait, Belvedere press's 9 is ९ which has a loop at the top and curve down to the right. Here it has a loop at the bottom like ६! It is literally a misprint of ६ for ९, or is it ९? In Belvedere Press, 9 is often ९. Let's look at ९: Belvedere's 9 is ९. Here it looks like ६. Let's look closely, actually it has a loop on the left: wait, it's ॥६॥ or ॥९॥? In Unicode, it's ॥६॥ or ॥९॥ - let's check: 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9. The verses are 1 to 9. It is definitely verse 9).
Wait, look at line 18 text:
जगजीवन काँ अब बिस्वास। राखहु सतगुरु अपने पास ॥
Wait, between काँ and अब:
Look at काँ: क + ा + ँ -> काँ
Then अब_बिस्वास: wait, is there a line under अब?
There is a horizontal stroke / underline between अब and बिस्वास,
१३६ शब्द संग्रह
(३)
अब मैं कवन गनती आउँ ।
दियो जबहिँ लखाइ महिँ कहँ, तबहिँ सुमिरौ नाउँ ॥१॥
समुझि ऐसे परत महिँ कहँ, बसे सरबस ठाउँ ।
अहो न्यारे कहूँ¹ नाहीं, रूप की बलि जाउँ ॥ २ ॥
नाथ का बल दियो जेहि कहँ, राखि निर्भय गाउँ ।
काल को डर नाहिँ उहवाँ, भला पायो दाउँ ॥ ३ ॥
चरन सीसहिँ राखि निरखी, चाखि दरस अघाउँ ।
जगजिवन गुर करहु दाया, दास तुम्हरा आउँ ॥ ४ ॥
(४)
साईं को केतानि गुन गावै ।
सूझि बूझि सब आवै तेहि काँ, जेहि काँ जौन लखावै ॥१॥
आपुहि भजत है आपु भजावत, आपु अलेख लखावै ।
जेहिँ कहँ अपनी सरनहिँ राखै, सोई भगत कहावै ॥२॥
टारत नहीं चरन तैं कबहूँ, नहिँ कबहूँ बिसरावै ।
सूरति खैंचि ऐँचि जब राखत, जोतिहिँ जोति मिलावै ॥३॥
सतगुर कियो गुरुमुखी तेहिकाँ, दूसर नाहिँ कहावै ।
जगजीवन ते भे सँग बाकी, अंत न कोऊ पावै ॥ ४ ॥
(५)
प्रभुजी का बसि अहै हमारी ।
जब चाहत तब भजन करावत, चाहत देत बिसारी ॥१॥
चाहत पल छिन छूटत नाहीं, बहुत होत हितकारी ।
चाहत दारि² सूखि पल डारत, डारि देत संसारी ॥ २ ॥
कहँ लहि बिनय सुनावाँ तुम तैं, मैं तौ अहौँ अनारी ।
जगजिवन दास पास रहै चरनन, कबहूँ करहु न न्यारी ॥३॥
(१) कहीं। (२) शाखा।
? Let's zoom in on जगजीवन ...: Letter 1: चLetter 2:रwithि->रिLetter 3:त! Wait, is that चरित्र? Look at the letters: ज ग ज ी व नspace First letter:चorस? It has a flat top, curve... wait, is it स? Wait, compare with साँईin line 7:सhas a left loop, horizontal connector, right vertical bar. In line 1, the second word: Letter 1: it has a loop on the left? No, it looks likeसा? No, wait! Wait, look at जगजीवन साहिबvsजगजीवन चरित: Wait, what is this book? Is it "जगजीवन चरित"? Wait! Jagjivan Sahib's life story is "जगजीवन चरित्र"? Wait, look at line 26: जगजिवन गुरु चरन सरनंLook at line 8:जगजीवन कै इतनी बिनतीNow look at line 1 header: Letter 1:सorच? Wait, let's look at the second word of line 1: It has: सorच`?
Wait, it has
१३८ शब्द संग्रह
(६)
साईँ मोहिँ भरोस तुम्हारा ।
मोरे बस नहिँ अहै एकौ, तुमहिँ करो निस्तारा ॥ १ ॥
मैं अज्ञान बुद्धि है नाहीं, का करि सकौँ बिचारा ।
जब तुम लेत पढ़ाय सिखावत, तब मैं प्रगट पुकारा ॥२॥
बहुतन भवसागर महँ बूड़त, तेहिँ उबारि कै तारा ।
बहुतन काँ जब कष्ट भयो है, तिन कै कष्ट निवारा ॥३॥
अब तौ चरन कि सरनहिँ आयौँ, गह्यौँ मैं पच्छ तुम्हारा ।
जगजीवन के साईँ समरथ, मोहिँ बल अहै तुम्हारा ॥४॥
(१०)
साहिब अजब कुदरत तोर ।
देखि गति कहि जात नाहीं, केतिक मति है मोर ॥१॥
नचत सब कोउ काछि कछनी, भ्रमत फिर बिन डोर ।
होत औगुन आप तैं, सब देत साहिब खोर१ ॥ २ ॥
कौल करि जग पठै दीन्ह्यो, तौन डाऱ्यो तोर२ ।
करत कपटं संत तेतीँ, कहैँ मोरी मोर ॥ ३ ॥
ऐसी जग की रीति आहै, कहा कहिये टेर ।
जगजिवनदास चरन गुरू के, सुरत करिये पोढ़ ॥ ४ ॥
(११)
चरनन तर दियो माथ, करिये अब मोहिँ सनाथ ।
दास करिकै जानी ॥ १ ॥
बूड़ा सब जगत सार, सूझै नहिँ वार पार ।
देखि नैनन बूझिय हित आनी ॥ २ ॥
सुमति मोहिँ देउ सिखाय, आनि मैं न रहि लुभाय ।
बुद्धिहीन भजनहीन, सुद्धि नाहिं आनी ॥ ३ ॥
(१) दोष । (२) तोड़ ।
सहस फन तैं सेस गावै, संकर तेहिँ ध्यान लावै।
ब्रह्मा वेद परगट कहै बानी ॥ ४ ॥
कहौँ का कहि जात नाहीं, जोती वा सर्ब माहिँ।
जगजीवन दरस चहै, दीजै बरदानी ॥ ५ ॥
(१२)
आरत अरज लेहु सुनि मोरी।
चरनन लागि रहै दृढ़ डोरी ॥ १ ॥
कबहूँ निकट तैं टारहु नाहीं।
राखहु मोहिँ चरन की छाहौँ ॥ २ ॥
दीजै केतिक बास यहँ कीजै।
अघ कर्म मेटि सरन करि लीजै ॥ ३ ॥
दासन दास ह्वै कहौँ पुकारी।
गुन मोहिँ नहिँ तुम लेहु सँवारी ॥ ४ ॥
जगजीवन कौँ आस तुम्हारी।
तुम्हरी छबि मूरति पर वारी ॥ ५ ॥
(१३)
केतिक बूझि, का आरति करऊँ। जैसे रखिहहिँ तैसे रहऊँ॥१
नाहीं कछु बसि आहै मोरी। हाथ तुम्हारे आहै डोरी ॥२
जस चाहौ तस नाच नचावहु। ज्ञान बास करि ध्यान लगावहु॥३
तुमहिँ जपत तुमहीँ बिसरावत। तुमहिँ चिताइ सरन लै आवत ॥४
दूसर कवन एक है सोई। जेहिँ कौँ चाहौ भक्त सो होई ॥५
जगजीवन करि बिनय सुनावै। साहिब समरथ नहिँ बिसरावै ॥६
(१४)
होली
यहि जग होरी, अरी मोहिँ तैं खेलि न जाई।
साईं मोहिँ बिसराय दियो है, तब तैं पर्यौ भुलाई ॥१॥
१४० शब्द संग्रह
सुख परि सुद्धि गई हरि मोरी, चित्त चेत नहिँ आई ।
अनहित हित करि जानि बिषै महँ, रह्यो ताहि लपटाई ॥२
यहि साँचे महँ पाँचौ नाचैँ, अपनि अपनि प्रभुताई ।
मैं का करौँ मोर बस नाहीं, राखत हैं अरुझाई ॥ ३ ॥
गगन मँदिल चलि थिर ह्रै रहिये, तकि छबि छकि निरथाई।
जगजीवन सखि साईँ समरथ, लेहैँ सबै बनाई ॥ ४ ॥
॥ साध ॥
(१)
जब मन मगन भा मस्तान ।
भयो सीतल महा कोमल, नाहिँ भावै आन ॥ १ ॥
डोरि लागी पोढ़ि गुरु तैँ, जगत तैँ बिलगान ।
अहै मता अगाध तिन का, करै को पहिचान ॥ २ ॥
अहँ ऐसे जगत माँ कोई, कहत आहँ ज्ञान ।
ऐसे निरमल ह्रै रहे हैं, जैसे निरमल भान ॥ ३ ॥
बड़ा बल है ताहि के रे, थमा है असमान ।
जगजिवन गुरु चरन परि कै, निर्गुनं धरि ध्यान ॥ ४ ॥
(२)
गऊ निकसि बन जाहीँ। बाछा उन घर ही माहीँ ॥ १ ॥
तृन चरहिँ चित्त सुत पासा। यहि जुक्ति साध जग बासा॥२
साध तैँ बड़ा न कोई । कहि राम सुनावत सोई ॥ ३ ॥
राम कही हम साधां। रस एक मता ओराधा ॥ ४ ॥
हम साध साध हम माहीं। कोउ दूसर जानै नाहीं ॥५॥
जिन दूसर करि जाना। तेहिँ होइहि नरक निदाना ॥६॥
जगजिवन चरन चित लावै। सो कहि के राम समुझावै ॥७
जगजीवन साहब १४१
॥ भेद ॥
(१)
जा के लगी अनहद तान हो, निरवान निरगुन नाम को॥१॥
जिकर करके सिखर हेरे, फिकर रारंकार की ॥२॥
जा के लगी अजपा गगन झलकै, जोति देख निसान की॥३
मधु मुरली मधुर बाजै, बाँए किंगरी सारँगी ॥ ४ ॥
दहिने जो घंटा संख बाजै, गैब धुन झनकार की ॥५॥
अकह की यह कथा न्यारी, सीखा नाहीं आन है ॥ ६॥
जगजिवन प्रानहि सोधि के, मिलि रहे सतनाम है ॥ ७ ॥
(२)
गगरिया मोरी चित सेाँ उतरि न जाय ॥ टेक ॥
इक कर करवा¹ एक कर उवहनि², बतियाँ कहैँ अरथाय॥१॥
सास ननद घर दारुन आहै, ता सेाँ जियरा डेराय ॥२॥
जो चित छूटै गागर फूटै, घर मोरि सासु रिसाय ॥३॥
जगजीवन अस भक्ती मारग, कहत अहँ गोहराय ॥
(chandrabindu)?
- Wait! Look at
कहैँ! - In
करैँ(Line 2):क,रwith two slants and chandrabindu:करैँ. - In Line 13:
क,हwith two slants and chandrabindu:कहैँ! - Wait, is there an aa-matra? Look closely: between
हandप्रगट: - Wait, is there an aa-matra? NO! There is no vertical line after
ह! - Look at
कहैँ:क+हwith ai-matra + chandrabindu =कहैँ! - Wait, let's look again: is it
कहैँorकहाँ? - Wait, look above the
ह: there is an ai-matraैwith a dot/crescent:कहैँ. - Wait, let's re-read the sentence:
- "कहैँ प्रगट पुकारि जेहि के, प्रीति अंतर आहिँ ।"
- "जगजिवन दास रीति अस, तब चरन महँ मिलि जाहिँ ॥ ७"
- "कहैँ प्रगट पुकारि" = they say / I say openly calling out, whoever has love inside
जगजीवन साहिब १४३
भर्म नहिँ तहँ भयो निर्भय, सत्त रत बैरागि ।
जगजीवन निरबान भे, गुरु दया जागे भागि ॥ ५ ॥
(२)
मन तन खाक करि कै जानु ।
नीच तैँ हूँ नीच, तेहि तैँ नीच आपुहि मानु ॥ १ ॥
त्यागु मैं तैँ दीन हूँ रहु, तजहु गर्व गुमान ।
देतु हैँ उपदेस याहै, निरखु सो निरबान ॥ २ ॥
कर्म धागा लाय बाँधा, हिंदु मूसलमान ।
खैँचि लीन्ह्यो तोरि धागा, बिरल कोइ बिलगान ॥३॥
खाक है सब खाक होइहि, समुझि आपन ज्ञान ।
सबद् सत कहि प्रगट भाखौँ, रहहि नाम निदान ॥ ४ ॥
काल को डर नाहिँ तिन्ह कौँ, चौथ¹ रहि चौगान ।
जगजीवन दास सतगुरु के, चरन रहि लपटान ॥ ५ ॥
(३)
मन मैं जेहिँ लागी जस भाई ।
सो जानै तैसे अपने मन, का सौँ कहै गोहराई ॥ १ ॥
साँची प्रीति की रीति है ऐसी, राखत गुप्त छिपाई ।
झूठे कहुँ सिखि लेत अहहिँ पढ़ि, जहँ तहँ झगरा लाई ॥२
लागे रहत सदा रस पागे, तजे अहहिँ दुचित्ताई ।
ते मस्ताने तिनहीँ जाने, तिनहिँ को देइ जनाई ॥ ३ ॥
राखत सीस चरन तैँ लागा, देखत सीस उठाई ।
जगजीवन सतगुरु की मूरति, सूरति रहे मिलाई ॥ ४ ॥
(४)
जो कोइ घरहिँ बैठा रहै ।
पाँच संगत करि पचीसौ, सबद अनहद लहै ॥ १ ॥
(१) चौथे लोक में।
१४४ शब्द संग्रह
दीन सीतल लीन मारग, सहज बाहनि बहै ।
कुमति कर्म कठोर काठहिँ, नाम पावक दहै ॥ २ ॥
मारि मैं तैं लाय डोरी, पवन थाम्हे रहै ।
चित्त कर तहँ सुमति साधू, सुरति माला गहै ॥ ३ ॥
राति दिन छिन नाहिँ छूटै, भक्त सोई अहै ।
जगजीवन कोइ संत बिरला, सबद की गति कहै ॥ ४ ॥
(५)
सत्त नाम बिना कहौ, कैसे निस्तरिहै ॥ टेक ॥
कठिन अहै माया जार, जा को नहिँ वार पार,
कहौ काह करिहै ॥ १ ॥
हो सचेत चौँकि जागु, ताहि त्यागि भजन लागु,
अंत भरम परिहै ॥ २ ॥
डारहि जमदूत फाँसि, आइहि नहिँ रोइ हाँसि,
कौन धीर धरिहै ॥ ३ ॥
लागहि नहिँ कोइ गोहारि, लेइहि नहिँ कोइ उबारि,
मनहिँ रोइ रहिहै ॥ ४ ॥
भगनी सुत नारि भाइ, मातु पितु सखा सहाइ,
तिनहिँ कहा कहिहै ॥ ५ ॥
काहुक नहिँ कोऊ जगत, मनहिँ अपने जानु गत,
जीवत मरि जाहु दीन अंतर माँ रहिहै ॥ ६॥
सिद्ध साध जोगि जती, जाइहि मरि सब कोई,
रसना सतनाम गहि रहिहै ॥ ७ ॥
जगजीवनदास रहै, बैठे सतगुरु के पास,
चरन सीस धरि रहिहै ॥ ८ ॥
यारी साहिब
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १२० ]
॥ गुरुदेव ॥
झूलना
गुरु के चरन की रज लै के, दोउ नैन के बिच अंजन दीया।
तिमिर मेटि उँजियार हुआ, निरंकार पिया को देखिलिया॥
कोटि सुरज तहँ छिपे घने, तीनि लोक धनी धन पाइ पिया।
सतगुरु ने जो करी किरपा, मरि के यारी जुग जुग जीया ॥
॥ अनहद शब्द ॥
(१)
झिलमिल झिलमिल बरखै नूरा,
नूर जहूर सदा भरपूरा ॥ १ ॥
रुनझुन रुनझुन अनहद बाजै,
भँवर गुँजार गगन चढ़ि गाजै ॥ २ ॥
रिमझिम रिमझिम बरखै मोती,
भयो प्रकास निरंतर जोती ॥ ३ ॥
निरमल निरमल निरमल नामा,
कह यारी तहँ लियो बिस्रामा ॥ ४ ॥
(२)
सुन्न के मुकाम मैं बेचून१ की निसानी है ॥ १ ॥
जिकिर२ रूह सोई अनहद बानी है ॥ २ ॥
अगम को गम्म नाहीं झलक पिसानी३ है ॥ ३ ॥
कहै यारी आपा चीन्हे सोई ब्रह्मज्ञानी है ॥ ४ ॥
(१) मालिक । (२) सुमिरन । (३) पेशानी माथा ।
१६
१४६ शब्द संग्रह
॥ प्रेम ॥
(१)
बिरहिनी मंदिर दियना बार ॥ टेक ॥
बिन बाती बिन तेल जुगति सौँ, बिन दीपक उँजियार ॥१
प्रान पिया मेरे गृह आयो, रचि पचि सेज सँवार ॥ २ ॥
सुखमन सेज परम तत रहिया, पिय निर्गुन निरकार ॥३॥
गावहु री मिलि आनंद मंगल, यारी मिलि के यार ॥४॥
(२)
होली
हौँ तो खेलौँ पिया सँग होरी ॥ १ ॥
दरस परस पतिबरता पिय की, छबि निरखत भइ बौरी ॥२
सोरह कला सँपूरन देखौँ, रबि ससि भे इक ठौरी ॥ ३ ॥
जब तैँ दृष्टि परी अबिनासी, लागो रूप ठगौरी ॥४॥
रसना रटत रहत निस बासर, नैन लगे यहि ठौरी ॥५॥
कह यारी भक्ती करू हरि की, कोई कहै सो कहौ री ॥६॥
॥ भेद ॥
(१)
झूलना
दोउ मूँदि के नैन अंदर देखा, नहिँ चाँद सुरज दिनरातिहैरे ।
रोसन समा बिनुतेल बाती, उस जोति सैँसैलिफानि¹हैरे॥
गोला मारि देखो आदम, कोउ अवर नाहिं सँगसाथिहैरे ।
यारी कहै तहकीक किया, तू मलकउलमौत² की जाति है रे ॥
(२)
झूलना
जमीँ बरखै असमान भींजै, बिन बातिहिँ तेल जलाइये जी।
जहाँ नूर तजल्ली³ बीच है रे, चैरंगी रंग दिखाइये जी ॥
(१) गुन। (२) जमराज । (३) प्रकाश।
यारी साहिब १४७
फूल बिना जदि फल होवै, नहि हीर¹ की लज्जत पाइये जी ।
यारो कहै यहि कौन बूझै, यह का सौं बात जनाइये जी ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
कवित्त
गहने के गढ़े तैं कहौं सोनो भी जातु है ।
सोनो बीच गहनो और गहनो बीच सोन है ॥
भीतर भी सोनो और बाहर भी सोन दीसै ।
सोनो तो अचल अंत गहनो को मीच² है ॥
सोन को तो जानि लीजै गहनो बरबाद कीजै ।
यारी एक सोनो ता मैं ऊँच कवन नीच है ॥
(२)
झूलना
बिन बंदगी इस आलम में, खाना तुझे हराम है रे ।
बंदा करै सोइ बंदगी, खिदमत में आठो जाम है रे ॥
यारी मौला बिसारि के, तू क्या लागै बेकाम है रे ।
कुछ जीते बंदगी करले, आखिर को गौर³ मुकाम है रे ॥
॥ मिश्रित ॥
कवित्त
आँधरे को हाथी हरि, हाथ जा को जैसो आयो ।
बूझा जिन जैसो, तिन तैसोई बतायो है ॥ १ ॥
टकटोरी दिन रैन, हिये हू के फूटे नैन ।
आँधरे को आरसी मैं, कहा दरसायो है ॥ २ ॥
मूल की खबरि नाहिं, जा सौं यह भयो मुलुक ।
वा को बिसारि भौंदू, डारै⁴ अरुझायो है ॥ ३ ॥
आपनो सरूप रूप, आपु माहिं देखै नाहिं ।
कहै यारी आँधरे ने, हाथी कैसो पायो है ॥४॥
(१) तत्व, गूदा । (२) मृत्यु । (३) क़वर । (४) शाखा मैं ।