संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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(३)
अब मैं कवन गनती आउँ ।
दियो जबहिँ लखाइ महिँ कहँ, तबहिँ सुमिरौ नाउँ ॥१॥
समुझि ऐसे परत महिँ कहँ, बसे सरबस ठाउँ ।
अहो न्यारे कहूँ¹ नाहीं, रूप की बलि जाउँ ॥ २ ॥
नाथ का बल दियो जेहि कहँ, राखि निर्भय गाउँ ।
काल को डर नाहिँ उहवाँ, भला पायो दाउँ ॥ ३ ॥
चरन सीसहिँ राखि निरखी, चाखि दरस अघाउँ ।
जगजिवन गुर करहु दाया, दास तुम्हरा आउँ ॥ ४ ॥
(४)
साईं को केतानि गुन गावै ।
सूझि बूझि सब आवै तेहि काँ, जेहि काँ जौन लखावै ॥१॥
आपुहि भजत है आपु भजावत, आपु अलेख लखावै ।
जेहिँ कहँ अपनी सरनहिँ राखै, सोई भगत कहावै ॥२॥
टारत नहीं चरन तैं कबहूँ, नहिँ कबहूँ बिसरावै ।
सूरति खैंचि ऐँचि जब राखत, जोतिहिँ जोति मिलावै ॥३॥
सतगुर कियो गुरुमुखी तेहिकाँ, दूसर नाहिँ कहावै ।
जगजीवन ते भे सँग बाकी, अंत न कोऊ पावै ॥ ४ ॥
(५)
प्रभुजी का बसि अहै हमारी ।
जब चाहत तब भजन करावत, चाहत देत बिसारी ॥१॥
चाहत पल छिन छूटत नाहीं, बहुत होत हितकारी ।
चाहत दारि² सूखि पल डारत, डारि देत संसारी ॥ २ ॥
कहँ लहि बिनय सुनावाँ तुम तैं, मैं तौ अहौँ अनारी ।
जगजिवन दास पास रहै चरनन, कबहूँ करहु न न्यारी ॥३॥
(१) कहीं। (२) शाखा।