ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1054, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—२१ देवता—इंद्र
असावि देवं गोऋजीकमन्धो न्यस्मिन्निन्द्रो जनुषेमुवोच.
बोधामसि त्वा हर्यश्व यज्ञैर्बोधा नः स्तोममन्धसो मदेषु.. (१)
दिव्य एवं गव्यमिश्रित सोमरस निचोड़ा गया है. ये इंद्र इस सोमरूपी अन्न में स्वभाव से
सम्मिलित रहते हैं. हे हरि नामक घोड़ों वाले इंद्र! हम यज्ञों के द्वारा तुम्हें हमारी बात बताते
हैं। तुम सोम के नशे में हमारी बात समझो. (१)
प्र यन्ति यज्ञं विपयन्ति बर्हिः सोममादो विदथे दुध्रवाचः.
न्यु भ्रियन्ते यशसो गृभादा दूरउपब्दो वृषणो नृषाचः.. (२)
यजमान यज्ञ में जाते हैं और कुश बिछाते हैं. यज्ञ में सोमलता कूटने के पत्थर भयानक
शब्द करते हैं. यशस्वी, दूर तक शब्द करने वाले, ऋत्विजों को मिलाने वाले एवं
अभिलाषापूरक पत्थर पत्थरों से बने घर से लिए जाते हैं. (२)
त्वमिन्द्र स्रवितवा अपस्कः परिष्ठिता अहिना शूर पूर्वीः.
त्वद्वावक्रे रथ्यो३ न धेना रेजन्ते विश्वा कृत्रिमाणि भीषा.. (३)
हे शूर इंद्र! तुमने वृत्र द्वारा रोके हुए जलों को प्रवाहित किया था. तुम्हारे कारण ही
नदियां रथस्वामियों के समान निकलती हैं. सारा संसार तुम्हारे भय से कांपता है. (३)
भीमो विवेषायुधेभिरेषामपांसि विश्वा नर्याणि विद्वान्.
इन्द्रः पुरो जर्हषाणो वि दूधोद्वि वज्रहस्तो महिना जघान.. (४)
इंद्र ने मानवहितकारी एवं सब कामों को जानने वाले आयुधों द्वारा भयंकर बनकर
असुरों को घेरा था एवं उनके नगरों को कंपित बनाया था. महान् एवं हाथ में वज्र धारण करने
वाले इंद्र ने असुरों को मारा था. (४)
न यातव इन्द्र जूजुवुर्नो न वन्दना शविष्ठ वेद्याभिः.
स शर्धदर्यो विषुणस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवा अपि गुर्ऋतं नः.. (५)
हे इंद्र! राक्षस हमारी हिंसा न करें. हे अतिशय बली इंद्र! वे राक्षस हमें प्रजाहीन न
बनावें. स्वामी इंद्र कुटिल व्यक्ति के मारने में उत्साह दिखाते हैं. ब्रह्मचर्यहीन लोग हमारे यज्ञ में
बाधा न बनें. (५)
अभि क्रत्वेन्द्र भूरध ज्मन्न ते विव्यङ्न्महिमानं रजांसि.
स्वेना हि वृत्रं शवसा जघन्थ न शत्रुरन्तं विविदद्युधा ते.. (६)
हे इंद्र! तुम कर्म द्वारा धरती पर वर्तमान प्राणियों को पराजित करते हो. सब लोक