ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—२ देवता—अग्नि
बोलेंगे. (१६)
सूक्त—२ देवता—अग्नि
यज्ञेन वर्धत जातवेदसमग्निं यजध्वं हविषा तना गिरा.
समिधानं सुप्रयसं स्वर्णरं द्युक्षं होतारं वृजनेषु धूर्षदम्.. (१)
हे ऋत्विजो! सभी उत्पन्न पदार्थों को जानने वाले अग्नि को यज्ञ के द्वारा बढ़ाओ तथा
हव्य एवं विस्तृत स्तुतियों द्वारा उनकी पूजा करो. अग्नि प्रज्वलित, शोभन अन्न युक्त, यजमान
को स्वर्ग में ले जाने वाले, दीप्त, यज्ञपूर्ण करने वाले एवं बल प्रदान करने वाले हैं. (१)
अभि त्वा नक्तीरुषसो ववाशिरेऽग्ने वत्सं न स्वसरेषु धेनव:.
दिवइवेदरतिर्मानुषा युगा क्षपो भासि पुरुवार संयतः.. (२)
हे अग्नि! गाएं जिस प्रकार दिन में बछड़े की इच्छा करती हैं, उसी प्रकार यजमान तुम्हें
रात और दिन चाहते हैं. हे सर्वप्रिय! तुम संयमशील रूप में स्वर्ग में व्याप्त हो, मनुष्यों के यज्ञों
में निवास करते हो एवं रात में प्रकाशित होते हो. (२)
तं देवा बुध्ने रजसः सुदंससं दिवस्पृथिव्योररतिं न्येरिरे.
रथमिव वेद्यं शुक्रशोचिषमग्निं मित्रं न क्षितिषु प्रशंस्यम्.. (३)
देवता लोग यज्ञ के मध्य भाग में स्थापित, सुदर्शन, धरती-आकाश के ईश्वर, धनपूर्ण रथ
के समान दीप्तवर्ण, मित्र के समान कार्यसाधक एवं प्रशंसित अग्नि की स्तुति करते हैं. (३)
तमुक्षमाणं रजसि स्व आ दमे चन्द्रमिव सुरुचं ह्रार आ दधुः.
पृश्न्याः पतरं चितयन्तमक्षभिः पाथो न पायुं जनसी उभे अनु.. (४)
आकाश की जलवर्षा से धरती को सींचने वाले, स्वर्ण के समान चमकीले,
आकाशगामी, अपनी ज्वालाओं से लोगों को चैतन्य करने वाले, जल के समान पालनकर्त्ता,
सबके जनक एवं धरती-आकाश को व्याप्त करने वाले अग्नि को जनरहित यज्ञशाला में
धारण किया गया है. (४)
स होता विश्वं परि भूत्वध्वरं तमु इव्यैर्मनुष ऋञ्जते गिरा.
हिरिशिप्रो वृधसानासु जर्भुरद्द्यौर्न स्तृभिश्चैतयद्रोदसी अनु.. (५)
वे होम पूर्ण करने वाले अग्नि समस्त यज्ञों को चारों ओर से व्याप्त करें. मनुष्य हव्य
और स्तुतियों द्वारा उसी अग्नि को सुशोभित करते हैं. जिस प्रकार तारागण आकाश को
प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार दीप्त शिखाओं वाले अग्नि बढ़ती हुई ओषधियों में बार-बार
जलकर धरती और आकाश के मध्य भाग को प्रकाशित करते हैं. (५)
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स नो रेवत्समिधानः स्वस्तये संददस्वान्रयिमस्मासु दीदिहि.
आ नः कृणुष्व सुविताय रोदसी अग्ने हव्या मनुषो देव वीतये.. (६)
हे अग्नि! तुम हमारे कल्याण के लिए अविनाशी एवं वृद्धिशील धन देते हुए प्रज्वलित
होकर प्रकाश फैलाओ तथा आकाश को हमारे लिए फलदाता बनाओ. तुम मेरे यजमान द्वारा
दिया हव्य देवों के भक्षण के लिए ले जाओ. (६)
दा नो अग्ने बृहतो दाः सहस्रिणो दुरो न वाजं श्रुत्या अपा वृधि.
प्राची द्यावापृथिवी ब्रह्मणा कृधि स्वर्ष्ण शुक्रमुषसो वि दिद्युतुः.. (७)
हे अग्नि हमें पर्याप्त गौ, अश्व तथा हजारों पुत्र-पौत्र प्रदान करो. हमारी कीर्ति के लिए
अन्न प्राप्ति का द्वार खोलो. हमारे उत्तम यज्ञ के कारण धरती और आकाश को हमारे अनुकूल
बनाओ. सूर्य जिस प्रकार संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार उषाएं तुम्हें प्रकाशित
करें. (७)
स इधान उषसो राम्या अनु स्वर्ष्ण दीदेदरुषेण भानुना.
होत्राभिरग्निर्मनुषः स्वध्वरो राजा विशामतिथिश्शारुरायवे.. (८)
अग्नि रमणीय उषाकाल में जलते हैं और अपनी उज्ज्वल किरणों से सूर्य के समान
चमकते हैं. वे अग्नि होता की यज्ञ साधनरूप स्तुतियों के आधार, उत्तम यज्ञ वाले, प्रजाओं के
स्वामी होकर यजमान के पास इस प्रकार आते हैं, जैसे प्यारा अतिथि आता है. (८)
एवा नो अग्ने अमृतेषु पूर्व्य धीष्पीपाय बृहद्दिवेषु मानुषा.
दुहाना धेनुर्वृजनेषु कारवे त्मना शतिनं पुरुरूपमिषणि.. (९)
हे अमितप्रभा युक्त एवं देवों के पूर्ववर्ती अग्नि! मनुष्यों में हमारी स्तुति तुम्हें तृप्त करती
है. जिस प्रकार दुधारू गाय यज्ञ के स्तोता को दूध देती है, उसी प्रकार तुम्हारी स्तुति असंख्य
धन देती है. (९)
वयमग्ने अर्वता वा सुवीर्यं ब्रह्मणा वा चितयेमा जनाँ अति.
अस्माकं द्युम्नमधि पञ्च कृष्टिषूच्चा स्वर्ष्ण शुशुचीत दुष्टरम्.. (१०)
हे अग्नि! हम तुम्हारे दिए हुए अन्न, अश्व आदि से शोभन सामर्थ्य प्राप्त करके सबसे
श्रेष्ठ बन जाएंगे. इससे वह हमारा अनंत धन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद पांच जातियों
के ऊपर प्रकाशित होगा जो दूसरों को प्राप्त होना कठिन है. (१०)
स नो बोधि सहस्य प्रशंस्यो यस्मिन्त्सुजाता इषयन्त सूरयः.
यमग्ने यज्ञमुपयन्ति वाजिनो नित्ये तोके दीदिवांसं स्वे दमे.. (११)
हे शत्रुपराभवकारी एवं स्तुति के योग्य अग्नि! हमारी महान् स्तुतियों को जानो. शोभन
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जन्म वाले स्तोता तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. हे अग्नि! यज्ञशाला में प्रकाशित तुम्हारी पूजा हव्य
रूपी अन्न हाथ में धारण करने वाले यजमान अपने पुत्र के निमित्त करते हैं. (११)
उभयासो जातवेदः स्याम ते स्तोतारो अग्ने सूरयश्च शर्मणि.
वस्वो रायः पुरुश्चन्द्रस्य भूयसः प्रजावतः स्वपत्यस्य शग्धि नः.. (१२)
हे जातवेद! तुम्हारे स्तोता और यजमान दोनों ही सुख प्राप्ति के लिए तुम्हारी शरण में
हैं. हमें निवास-योग्य अतिशय प्रसन्नतादायक एवं बहुत सी प्रजाओं तथा संतान से युक्त धन
दो. (१२)
ये स्तोतृभ्यो गोअग्रामश्वपेशसमग्ने रातिमुपसृजन्ति सूरयः.
अस्माञ्च तांश्च प्र हि नेषि वस्य आ बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१३)
हे अग्नि! जो लोग बुद्धिमान् स्तोताओं को उत्तम गौ और शक्तिशाली अन्न दान करते हैं,
उन्हें तथा हमें उत्तम स्थान पर ले चलो. हम उत्तम वीरों से युक्त होकर यज्ञ में बहुत से मंत्र
बोलेंगे. (१३)
सूक्त—३ देवता—अग्नि
समिद्धो अग्निर्निहितः पृथिव्यां प्रत्यङ्विश्वानि भुवनान्यस्थात्.
होता पावकः प्रदिवः सुमेधा देवो देवान्यजत्वग्निरर्हन्.. (१)
वेदी पर रखे हुए प्रज्वलित अग्नि समस्त प्राणियों के सामने स्थित हैं. होम निष्पादक,
शुद्धिकर्त्ता, पुराने, शोभन बुद्धि वाले, प्रकाशमान एवं यज्ञ के योग्य अग्नि देवों का आदर करें.
(१)
नराशंसः प्रति धामान्यञ्जन् तिस्रो दिवः प्रति मह्ना स्वर्चिः.
घृतप्रुषा मनसा हव्यमुन्दन्मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान्.. (२)
मनुष्यों द्वारा स्तुति के योग्य एवं सुंदर ज्वालाओं वाले अग्नि अपनी महिमा से प्रत्येक
यज्ञस्थल एवं तीनों प्रकाशित लोकों को प्रकट करते हैं. वे घी बरसाने की अभिलाषा से हव्य
को चिकना करते हुए यज्ञ के उच्च भाग में देवों को तृप्त करें. (२)
ईळितो अग्ने मनसा नो अर्हन्देवान्यक्षि मानुषात्पूर्वो अद्य.
स आ वह मरुतां शर्धो अच्युतमिन्द्रं नरो बर्हिषदं यजध्वम्.. (३)
हे हमारे द्वारा स्तुत अग्नि! हम पर प्रसन्न होकर यज्ञ के योग्य बनो एवं आज मनुष्यों से
पहले ही देवों के निमित्त यज्ञ करो. हे ऋत्विजो! मरुतों की शक्ति से युक्त अच्युत इंद्र को
बुलाओ एवं कुश पर स्थित इंद्र को लक्ष्य करके हवन करो. (३)
देव बर्हिर्वर्धमानं सुवीरं स्तीर्णं राये सुभरं वेद्यस्याम्.
घृतेनाक्तं वसवः सीदतेदं विश्वे देवा आदित्या यज्ञियासः.. (४)
हे कुशरूप, तेजस्वी, नित्य बढ़ने वाले एवं वीर पुत्रदाता अग्नि! हमें धन देने के लिए
वेदी पर फैल जाओ! हे वसुओ, विश्वेदेव एवं यज्ञ के योग्य आदित्यो! तुम घी से गीले किए गए
कुश पर बैठो. (४)
वि श्रयन्तामुर्विया हूयमाना द्वारो देवीः सुप्रायणा नमोभिः.
व्यचस्वतीर्वि प्रथन्तामजुर्या वर्णं पुनाना यशसं सुवीरम्.. (५)
हे प्रकाशित-द्वार रूप, विस्तृत मनुष्यों द्वारा नमस्कारयुक्त स्तुतियों से हवन किए जाते
हुए तथा लोगों द्वारा सरलता से प्राप्त करने योग्य अग्नि! तुम खुल जाओ. तुम व्यापक,
अविनाशी तथा यजमान के लिए शोभन पुत्र वाला रूप धारण करते हुए विशेष रूप से
प्रसिद्ध बनो. (५)
साध्वपांसि सनता न उक्षिते उषासानक्ता वय्येव रण्विते.
तन्तुं ततं संवयन्ती समीची यज्ञस्य पेशः सुदुघे पयस्वती.. (६)
हमें उत्तम फल देने वाली दिन एवं रात रूप अग्नि ऐसी दो कुशल नारियों के समान हैं
जो कपड़ा बुनने में कुशल हैं. बुनने वाली नारियां जिस प्रकार खड़े होकर धागों को बुनती हैं,
उसी प्रकार रात व दिन यज्ञ को पूरा करते हैं. वे जल से युक्त एवं फलदाता हैं. (६)
दैव्या होतारा प्रथमा विदुष्टर ऋजु यक्षतः समूचा वपुष्टरा.
देवान्यजन्तावृतुथा समज्जतो नाभा पृथिव्या अधि सानुषु त्रिषु.. (७)
सबसे अधिक विद्वान्, विशाल शरीर वाले अग्नि रूपी दो सुंदर होता पहले से ही यज्ञ के
योग्य होकर मंत्र द्वारा देवों की पूजा एवं यज्ञ करते हैं. वे पृथ्वी की नाभि के समान वेदी के
मध्य भाग में ऋतु के अनुसार गार्हपत्य आदि अग्नियों में मिल जाते हैं. (७)
सरस्वती साधयन्ती धियं न इळा देवी भारती विश्वतूर्तिः.
तिस्रो देवीः स्वधया बर्हिरदमच्छिद्रं पान्तु शरणं निषद्य.. (८)
हमारे यज्ञ को पूर्ण करने वाली सरस्वती, इला और सर्वत्र व्यापक भारती—ये तीनों
देवियां यज्ञशाला में निवास करें एवं हव्य पाने के लिए हमारे यज्ञ का निर्दोष रूप से पालन
करें. (८)
पिशङ्गरूपः सुभरो वयोधाः श्रुष्टी वीरो जायते देवकामः.
प्रजां त्वष्टा वि ष्यतु नाभिमस्मे अथा देवानामप्येतु पाथः.. (९)
त्वष्टा की कृपा से हमारे घर में स्वर्ण के समान उज्ज्वल रंग वाला, शोभन यज्ञकर्त्ता,
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अन्नदाता, उन्नत गुणों वाला, वीर तथा देवों को चाहने वाला पुत्र जन्म ले. वह हमें कुल की
रक्षा करने वाली संतान दे एवं हमारा अन्न देवों के पास जाए. (९)
वनस्पतिरवसृजन्नुप स्थादग्निर्हविः सूदयति प्र धीभिः.
त्रिधा समक्तं नयतु प्रजानन्देवेभ्यो दैव्यः शमितोप हव्यम्.. (१०)
हमारे कर्मों को जानने वाले वनस्पति रूप अग्नि समीप उपस्थित हैं. वे विशेष प्रकार के
कर्मों से हव्य को ठीक से पकाते हैं. शमिता नामक दिव्य अग्नि हव्य को तीन प्रकार से भली-
भांति शुद्ध जानकर देवों के समीप ले जावें. (१०)
घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम.
अनुष्वधमा वह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्.. (११)
मैं अग्नि की जन्मभूमि, वासस्थल एवं आश्रयदाता काष्ठ को अग्नि में डालता हूं. हे
कामवर्षी अग्नि! हव्य देने के समय देवों को बुलाकर प्रसन्न करो तथा स्वाहा के रूप में डाला
गया हव्य धारण करो. (११)
सूक्त—४ देवता—अग्नि
हुवे वः सुद्योत्मानं सुवृक्तिं विशामग्निमतिथिं सुप्रयसम्.
मित्रइव यो दिधिषाय्यो भूद्देव आदेवे जने जातवेदाः.. (१)
हे यजमानो! मैं तुम्हारे कल्याण के निमित्त अत्यंत तेजस्वी, पापरहित, यजमानों के
अतिथि एवं शोभन हवि वाले अग्नि को बुलाता हूं. जातवेद अग्नि मनुष्यों से लेकर देवों तक
सब प्राणियों को मित्र के समान धारण करते हैं. (१)
इमं विधन्तो अपां सधस्थे द्वितादधुर्भृगवो विश्वा३योः.
एष विश्वान्यभ्यस्तु भूमा देवानाम्ग्निररतिर्जीराश्वः.. (२)
अग्नि की सेवा करने वाले भृगुओं ने अग्नि को जल के निवासस्थान अंतरिक्ष में एवं
मानवों की संतान के बीच धारण किया. शीघ्रगामी अश्वों वाले एवं देवों के ईश्वर अग्नि हमारे
सभी शत्रुओं को हरावें. (२)
अग्निं देवासो मानुषीषु विक्षु प्रियं धुः क्षेष्यन्तो न मित्रम्.
स दीदयदुशतीरूर्य्या आ दक्षाय्यो यो दास्वते दम आ.. (३)
देवों ने स्वर्ग को जाते समय अपने प्रिय अग्नि को मनुष्यों के बीच मित्र के रूप में स्थित
किया था. वे अग्नि हव्यदाता यजमान के घर में देवों द्वारा स्थापित होकर उसके कल्याण के
लिए अपनी प्रिय रातों में प्रकाशयुक्त होते रहते हैं. (३)
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अस्य रण्वा स्वस्येव पुष्टिः सन्दृष्टिरस्य हियानस्य दक्षोः.
वि यो भरिभ्रदोषधीषु जिह्वामर्त्यो न रथ्यो दोधवीति वारान्.. (४)
अपने शरीर को पुष्ट करने के समान अग्नि के शरीर का पोषण एवं लकड़ियों को
जलाने के इच्छुक अग्नि का प्रकट होना भी बहुत सुंदर जान पड़ता है. रथ में जुता हुआ घोड़ा
मक्खियां उड़ाने के लिए जिस प्रकार बार-बार पूंछ हिलाता है, उसी प्रकार अग्नि अपनी
लपटों रूपी जीभ को फेरते हैं. (४)
आ यन्मे अभ्वं वनदः पनन्तोशिग्भ्यो नामिमीत वर्णम्.
स चित्रेण चिकिते रंसु भासा जुजुर्वाँ यो मुहुरा युवा भूत्.. (५)
मेरे स्तोता अग्नि के महत्त्व की स्तुति करते हैं. वे मेरे रूप की कामना करने वाले
ऋत्विजों को अपना रंग दिखाते हैं. वे रमणीय हव्य के निमित्त विचित्र दीप्ति से पहचाने जाते
हैं एवं बूढ़े होकर भी बार-बार जवान बन जाते हैं. (५)
आ यो वना तातृषाणो न भाति वार्ण पथा रथ्येव स्वानीत्.
कृष्णाध्वा तपू रण्वश्चिकेत द्यौरिव स्मयमानो नभोभिः.. (६)
अग्नि प्यासे के समान वृक्षों को जलाते हैं, जल के समान इधर-उधर जाते हैं तथा घोड़े
के समान शब्द करते हैं. अग्नि का मार्ग काला है और वे ताप देने वाले हैं. फिर भी वे तारों
भरे आकाश के समान शोभा पाते हैं. (६)
स यो व्यस्थादभि दक्षदुर्वी पशुर्नैति स्वयुरगोपाः.
अग्निः शोचिष्माँ अतसान्युष्णन्कृष्णव्यथिरस्वदयन्न भूम.. (७)
जो अग्नि अनेक प्रकार से धरती पर स्थित हैं, विस्तृत धरती के सामने बढ़ते हैं एवं
बिना रखवाले वाले पशु की तरह अपनी इच्छा से इधर-उधर जाते हैं, वे तेजस्वी अग्नि गीले
वृक्षों को जलाते हुए, कांटों को भस्म करते हुए सब वस्तुओं का भली प्रकार से स्वाद लेते हैं.
(७)
नू ते पूर्वस्यावसो अधीतो तृतीये विदथे मन्म शंसि.
अस्मे अग्ने संयद्वीरं बृहन्तं क्षुमन्तं वाजं स्वपत्यं रयिं दाः.. (८)
हे अग्नि! तुमने पहले सवन में हमारी जो रक्षा की थी, उसे स्मरण करके हम तीसरे
सवन में मनोहर स्तुतियां बोल रहे हैं. हे अग्नि! तुम हमें महान् वीरों, विशाल कीर्ति एवं सुंदर
संतान से युक्त धन दो. (८)
त्वया यथा गृत्समदासो अग्ने गुहा वन्वन्त उपरां अभि ष्युः.
सुवीरासो अभिमातिषाहः स्मत्सूरिभ्यो गृणते तद्द्यो धाः.. (९)
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हे अग्नि! गृत्समद के वंश में उत्पन्न ऋषि तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर जिस तरह गुहा में
छिपे धनों पर अधिकार कर सके एवं उत्तम संतान पाकर शत्रुओं का सामना कर सके, उसी
तरह कृपा करो. तुम बुद्धिमान् एवं स्तुतिकर्त्ता यजमानों को बहुत धन प्रदान करो. (९)
सूक्त—५ देवता—अग्नि
होताजनिष्ट चेतनः पिता पितृभ्य ऊतये.
प्रत्यक्षज्जेन्यं वसु शकेम वाजिनो यमम्.. (१)
होता, चेतना प्रदान करने वाले और पालक अग्नि पितरों की रक्षा के लिए उत्पन्न हुए हैं.
हम हव्य से युक्त होकर ऐसा धन प्राप्त कर सकेंगे जो अत्यंत पूज्य एवं जीतने योग्य हो. (१)
आ यस्मिन्सप्त रश्मयस्तता यज्ञस्य नेतरि.
मनुष्यद्दैव्यमष्टमं पोता विश्वं तदिन्वति.. (२)
यज्ञ-निर्वाहक अग्नि में सात रश्मियां व्याप्त हैं. वे देवों के पालक अग्नि, मनुष्यों के
पालक ऋत्विज् के समान यज्ञ के आठवें स्थान में बैठते हैं. (२)
दधन्वे वा यदीमनु वोचद्ब्रह्माणि वेरु तत्.
परि विश्वानि काव्या नेमिश्चक्रमिवाभवत्.. (३)
यज्ञ में हवि धारण करता हुआ अध्वर्यु जो मंत्र बोलता है अथवा बुद्धिमान् ऋत्विज् जो
भी कर्म करता है, उन्हें अग्नि उसी प्रकार धारण करते हैं, जिस प्रकार पहिए को नाभि धारण
करती है. (३)
साकं हि शुचिना शुचिः प्रशास्ता क्रतुनाजनि.
विद्वाँ अस्य व्रता ध्रुवा वयाइवानु रोहते.. (४)
शुद्ध प्रशास्ता नामक अग्नि शुद्ध यज्ञ के ही साथ उत्पन्न हुए थे. जिस प्रकार पक्षी फल
पाने के लिए एक शाखा से दूसरी शाखा पर जाता है, उसी प्रकार यजमान अग्नि संबंधी यज्ञों
को निश्चित फलदायक जानकर बार-बार करता है. (४)
ता अस्य वर्णमायुवो नेष्टुःसचन्त धेनवः.
कुवित्तिसृभ्य आ वरं स्वसारो या इदं ययुः.. (५)
यज्ञकर्म करने वाली उंगलियां गायों के समान नेष्टा नामक अग्नि की सेवा करती हैं. वे
ही अग्नि के गार्हपत्य आदि तीन रूपों की भी सेवा करती हैं. (५)
यदी मातुरुप स्वसा घृतं भरन्त्यस्थित. तासामध्वर्युरागतौ यवो वृष्टीव मोदते.. (६)
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जिस समय माता रूप वेदी के समीप भगिनी के समान जुहू नामक पात्र घी से भरकर
रखा जाता है, उस समय अध्वर्युस्वरूप अग्नि उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं, जैसे वर्षा होने पर जौ
हरे-भरे हो जाते हैं. (६)
स्वः स्वाय धायसे कृणुतामृत्विगृत्विजम्. स्तोमं यज्ञं चादरं वनेमा ररिमा वयम्.. (७)
ऋत्विज् रूप अग्नि अपना कर्म समझकर ऋत्विज् का काम करते हैं. हम भी अग्नि की
ही कृपा से स्तुतियां, यज्ञ और हव्य पर्याप्त मात्रा में देते हैं. (७)
यथा विद्वाँ अरंकरद्विश्वेभ्यो यजतेभ्यः.
अयमग्ने त्वे अपि यं यज्ञं चकृमा वयम्.. (८)
हे अग्नि! ऐसी कृपा करो कि तुम्हारा महत्त्व जानने वाला यजमान सभी देवों को प्रसन्न
कर सके. हे अग्नि! हम जिस यज्ञ को करेंगे, वह तुम्हारा ही होगा. (८)
सूक्त—६ देवता—अग्नि
इमां मे अग्ने समिधमिमामुपसदं वनेः. इमा उ षु शृधी गिरः.. (१)
हे अग्नि! यज्ञ में दी गई मेरी समिधा तथा आहुति का उपभोग करो एवं मेरी स्तुतियां
सुनो. (१)
अया ते अग्ने विधेमोजो नपादश्वमिष्टे. एना सूक्तेन सुजात.. (२)
हे अग्नि! इस आहुति के द्वारा हम तुम्हारी सेवा करेंगे. हे बल के नाती, विस्तृत यज्ञ के
स्वामी एवं सुंदर जन्म वाले अग्नि! इस सुंदर स्तुति द्वारा हम तुम्हें प्रसन्न करेंगे. (२)
तं त्वा गीर्भिर्गिर्वणसं द्रविणस्युं द्रविणोदः. सपर्यैम सपर्यवः.. (३)
हे धनदाता, स्तुति योग्य एवं हवि के अभिलाषी अग्नि! हम तुम्हारे सेवक बनकर
स्तुतियों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करेंगे. (३)
स बोधि सूरिर्मघवा वसुपते वसुदावन्. युयोध्य१स्मद् द्वेषांसि.. (४)
हे धनस्वामी, विद्वान् एवं धनदाता अग्नि! हमारी स्तुति जानकर हमारे शत्रुओं को
भगाओ. (४)
स नो वृष्टिं दिवस्परि स नो वाजमनर्वाणम्. स नः सहस्रिणीरिषः.. (५)
वे ही अग्नि हमारे कल्याण के लिए आकाश से वर्षा करते हैं एवं पर्याप्त बल तथा
हजारों प्रकार के अन्न देते हैं. (५)
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ईळानायावस्यवे यविष्ठ दूत नो गिरा. यजिष्ठ होतरा गहि.. (६)
हे अतिशय तरुण, देवदूत एवं यज्ञ के परम योग्य अग्नि! मेरी स्तुति सुनकर आओ एवं
अपने पूजक मुझको अपना आश्रय दो. (६)
अन्तर्ह्यग्न ईयसे विद्वाञ्जन्मोभया कवे. दूतो जन्येव मित्र्य:.. (७)
हे बुद्धिमान् अग्नि! तुम मनुष्यों के हृदय की भावना पहचानते हो. तुम यजमान और
देव दोनों के विषय में जानते हो. तुम मित्र के दूत के समान लोगों के हितकारी हो. (७)
स विद्वाँ आ च पिप्रयो यक्षि चिकित्व आनुषक्. आ चास्मिन्सत्सि बर्हिषि.. (८)
हे ज्ञानसंपन्न अग्नि! हमारी इच्छा सभी प्रकार से पूरी करो. हे चेतनायुक्त अग्नि! तुम
क्रमानुसार देवों का यज्ञ करो एवं बिछे हुए कुशों पर बैठो. (८)
सूक्त—७ देवता—अग्नि
श्रेष्ठं यविष्ठ भारताग्ने द्युमन्तमा भर. वसो पुरुस्पृहं रयिम्.. (१)
हे अतिशय तरुण, ऋत्विजों के संबंधी एवं व्याप्त अग्नि! हमें अति प्रशंसनीय, तेजस्वी
एवं बहुत से याचकों द्वारा मांगा गया धन प्रदान करो. (१)
मा नो अरातिरीशत देवस्य मर्त्यस्य च. पर्षि तस्या उत द्विष:.. (२)
हे अग्नि! हमें मनुष्यों एवं देवों की शत्रुता हरा न सके. हमें इन दोनों प्रकार के शत्रुओं से
बचाओ. (२)
विश्वा उत त्वया वयं धारा उदन्याइव. अति गाहेमहि द्विष:.. (३)
हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से हम सभी शत्रुओं को जल की धारा के समान लांघ जाएंगे.
(३)
शुचि: पावक वन्द्योऽग्ने बृहद्वि रोचसे. त्वं घृतेभिराहुतः.. (४)
हे शुद्ध, पवित्र करने वाले एवं वंदनीय अग्नि! तुम घृत द्वारा बुलाए गए हो और अत्यंत
प्रकाशित हो रहे हो. (४)
त्वं नो असि भारताग्ने वशाभिरुक्षभि:. अष्टापदीभिराहुतः.. (५)
हे ऋत्विजों का भरण करने वाले अग्नि! तुम हमारे हो. तुम बांझ गायों, बैलों एवं
गर्भिणी गायों द्वारा बुलाए गए हो. (५)
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