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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 496, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 496

स नो रेवत्समिधानः स्वस्तये संददस्वान्रयिमस्मासु दीदिहि.
आ नः कृणुष्व सुविताय रोदसी अग्ने हव्या मनुषो देव वीतये.. (६)
हे अग्नि! तुम हमारे कल्याण के लिए अविनाशी एवं वृद्धिशील धन देते हुए प्रज्वलित
होकर प्रकाश फैलाओ तथा आकाश को हमारे लिए फलदाता बनाओ. तुम मेरे यजमान द्वारा
दिया हव्य देवों के भक्षण के लिए ले जाओ. (६)
दा नो अग्ने बृहतो दाः सहस्रिणो दुरो न वाजं श्रुत्या अपा वृधि.
प्राची द्यावापृथिवी ब्रह्मणा कृधि स्वर्ष्ण शुक्रमुषसो वि दिद्युतुः.. (७)
हे अग्नि हमें पर्याप्त गौ, अश्व तथा हजारों पुत्र-पौत्र प्रदान करो. हमारी कीर्ति के लिए
अन्न प्राप्ति का द्वार खोलो. हमारे उत्तम यज्ञ के कारण धरती और आकाश को हमारे अनुकूल
बनाओ. सूर्य जिस प्रकार संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार उषाएं तुम्हें प्रकाशित
करें. (७)
स इधान उषसो राम्या अनु स्वर्ष्ण दीदेदरुषेण भानुना.
होत्राभिरग्निर्मनुषः स्वध्वरो राजा विशामतिथिश्शारुरायवे.. (८)
अग्नि रमणीय उषाकाल में जलते हैं और अपनी उज्ज्वल किरणों से सूर्य के समान
चमकते हैं. वे अग्नि होता की यज्ञ साधनरूप स्तुतियों के आधार, उत्तम यज्ञ वाले, प्रजाओं के
स्वामी होकर यजमान के पास इस प्रकार आते हैं, जैसे प्यारा अतिथि आता है. (८)
एवा नो अग्ने अमृतेषु पूर्व्य धीष्पीपाय बृहद्दिवेषु मानुषा.
दुहाना धेनुर्वृजनेषु कारवे त्मना शतिनं पुरुरूपमिषणि.. (९)
हे अमितप्रभा युक्त एवं देवों के पूर्ववर्ती अग्नि! मनुष्यों में हमारी स्तुति तुम्हें तृप्त करती
है. जिस प्रकार दुधारू गाय यज्ञ के स्तोता को दूध देती है, उसी प्रकार तुम्हारी स्तुति असंख्य
धन देती है. (९)
वयमग्ने अर्वता वा सुवीर्यं ब्रह्मणा वा चितयेमा जनाँ अति.
अस्माकं द्युम्नमधि पञ्च कृष्टिषूच्चा स्वर्ष्ण शुशुचीत दुष्टरम्.. (१०)
हे अग्नि! हम तुम्हारे दिए हुए अन्न, अश्व आदि से शोभन सामर्थ्य प्राप्त करके सबसे
श्रेष्ठ बन जाएंगे. इससे वह हमारा अनंत धन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद पांच जातियों
के ऊपर प्रकाशित होगा जो दूसरों को प्राप्त होना कठिन है. (१०)
स नो बोधि सहस्य प्रशंस्यो यस्मिन्त्सुजाता इषयन्त सूरयः.
यमग्ने यज्ञमुपयन्ति वाजिनो नित्ये तोके दीदिवांसं स्वे दमे.. (११)
हे शत्रुपराभवकारी एवं स्तुति के योग्य अग्नि! हमारी महान् स्तुतियों को जानो. शोभन
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