रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
प्रारंभिक मंगलाचरण एवं काम-स्वरूप
'मास्टर' मणिमालायाः ४६ संख्यको मणिः (कामशास्त्रविभागे १)
महाकविश्रीजयदेवविरचिता
रतिमञ्जरी
पण्डितश्रीकनकलालशर्म्मकृतया
'मनोरञ्जिनी'नामिकया सरलहिन्दीभाषाटीकया सहिता ।
सेयम् —
काशीस्थ 'संस्कृत-बुकडिपो' इत्यस्याधिपैः
मास्टर खेलाड़ीलाल ऐण्ड सन्स् महोदयैः
स्वीये
'मास्टर प्रिण्टिङ्ग वर्क्स' मुद्रणागारे
मुद्रयित्वा प्रकाशिता ।
अस्याः सर्वेऽधिकाराः प्रकाशकायत्तीकृताः ।
तृतीयं संस्करणम् ] सन् १९५४ ई० [ मूल्यम् = )
✤ श्रीपुष्पायुधाय नमः ✤
अथ रतिमञ्जरी
भाषाटीकासहिता
—००००—
✤ ग्रन्थकृन्मङ्गलम् ✤
नत्वा सदाशिवं देवं ना१गराणां मनोहरम् ।
रच्यते जयदेवेन सुबोधा रतिमञ्जरी ॥ १ ॥
✤ टीकाकृन्मङ्गलम् ✤
यस्याः कृपापाङ्गवशान्मनोभूः पुष्पायुधोऽप्यङ्गविहीनरूपः ।
२जेजेति लोकानखिलान् क्षणार्द्धे तां विश्वबीजां त्रिपुरां नमामि ॥ १ ॥
लोका व्यवाये ३पशुवत्प्रवृत्ताः कामाऽऽगमाचारविचारहीनाः ।
तेषां सुबोधाय करोमि टीकां भाषानिबद्धां र४तिमञ्जरीयाम् ॥ २ ॥
टी०—ग्रन्थ के आरम्भ में निर्विघ्न पूर्वक ग्रन्थ समाप्ति होने के लिये
मङ्गलाचरण आवश्यक जानकर जयदेव कवि मङ्गलाचरण करते हैं ।
टी०—रसिक जनों के मन को हरनेवाले सदा शिवजी को नमस्कार
कर मैं जयदेव सुबोध ( सुख से बोध करानेवाला ) रतिमञ्जरी नाम
कामशास्त्र बनाता हूँ ॥ १ ॥
रतिशास्त्रं कामशास्त्रं तस्य सारं समाहृतम् ।
सुप्रबन्धं सुसंक्षिप्तं जयदेवेन भाष्यते ॥ २ ॥
टी०—रतिशास्त्र और कामशास्त्र का सार ( तत्त्वभूत ) मनोज्ञ]
१—नागराणां रसज्ञानाम् । २—जेजेति अतिशयेन जयति पराभावयतीत्यर्थः ।
जयतेर्यङ्लुगन्तस्य रूपम् । ३—व्यवाये मैथुने । ४—रतिमञ्जर्या इयम् रतिमञ्जरीया
ताम् । ( गहादेराकृतिगणत्वाच्छः ) ।
२ रतिमञ्जरी-
रचनावाला और अति लघु ( यह रतिमञ्जरी नाम ग्रन्थ ) मुझ जयदेव
से कहा जाता है ॥ २ ॥
अथ स्त्रीपुंसोर्जातिलक्षणम्—
पद्मिनी चित्रिणी चैव शङ्खिनी हस्तिनी तथा ।
शशो मृगो वृषोऽश्वश्च स्त्रीपुंसोर्जातिलक्षणम् ॥ ३ ॥
टी०—स्त्रियों के चार भेद हैं—एक पद्मिनी, दूसरी चित्रिणी,
तीसरी शङ्खिनी, चौथी हस्तिनी । इसी प्रकार पुरुषों के भी चार भेद
हैं—पहिला शश, दूसरा मृग, तीसरा वृष, चौथा अश्व ॥ ३ ॥
अथ पद्मिनीलक्षणम्—
भवति कमलनेत्रा नासिकाक्षुद्ररन्ध्रा
अविरलकुचयुग्मा चारुकेशी कृशाङ्गी ।
मृदुवचनसुशीला गीतवाद्यानुरक्ता
सकलतनुसुवेशा पद्मिनी पद्मगन्धा ॥ ४ ॥
टी०—अब पद्मिनी स्त्री का लक्षण कहते हैं—वही स्त्री पद्मिनी है
जिसके नेत्र कमल के सदृश और नासिका की छिद्र छोटे हों, सघन
कुचयुग्म हो, सुन्दर केश हो, दुर्बल शरीर हो, कोमल वाणी हो, सुन्दर
स्वभाव हो, और गाने बजाने में आसक्त हो, सम्पूर्ण शरीर का वेश
सुन्दर हो, पद्म के समान शरीर की सुगन्ध हो ॥ ४ ॥
अथ चित्रिणीलक्षणम्—
भवति रतिरसज्ञा नातिखर्वा न दीर्घा
[ श्लो० ४ ]—कमल इव नेत्रे यस्याः सा । नासिकायां क्षुद्रो रन्ध्रो यस्याः सा ।
कुचयोर्युग्मं कुचयुग्मम् , अविरलं कुचयुग्मं यस्याः सा । चारु केशो यस्याः सा ।
कृशान्यङ्गानि यस्याः सा । मृदु वचनं यस्याः सा मृदुवचना । सुष्ठु शीलं यस्याः सा
सुशीला, मृदुवचना चासौ सुशीला मृदुवचनसुशीला । गीतं च वाद्यं च गीतवाद्ये
तयोरनुरक्ता । तनोः सुवेशस्तनुसुवेशः, सकलस्तनुसुवेशो यस्याः सा । पद्मवत् गन्धः
सुगन्धो यस्याः सा ।
भाषाटीकासहिता । ३
तिलकुसुमसुनासा स्निग्धनीलोत्पलाक्षी ।
घनकठिनकुचाढ्या सुन्दरी बद्धशीला
सकलगुणयुता सा चित्रिणी चित्रवक्त्रा ॥ ५ ॥
टी०—अब चित्रिणी स्त्री का लक्षण कहते हैं—वही स्त्री चित्रिणी
है जो रतिरस को जानती हो, और न बहुत छोटी हो और न बहुत
लम्बी हो । तिल पुष्प के समान नासिका वाली हो, चिकण नीलकमल
के सदृश नेत्र वाली हो, और निरन्तर कठिन कुचों से युक्त हो, सुन्दर
स्वभाव वाली हो, सकल गुणों से युक्त हो, और आश्चर्य मुखवाली हो ॥
अथ शङ्खिनीलक्षणम्—
दीर्घातिदीर्घनयना वरसुन्दरी या
कामोपभोगरसिका गुणशीलयुक्ता ।
रेखात्रयेण च विभूषितकण्ठदेशा
सम्भोगकेलिरसिका(निरता)किल शङ्खिनी सा ॥ ६ ॥
टी०—अब शङ्खिनी स्त्री का लक्षण कहते हैं-जो स्त्री लम्बी कदवाली
हो, दीर्घनेत्रवाली हो, अत्यन्त सुन्दरी हो, काम के उपभोग में रसिक हो,
गुण-शील सम्पन्न हो और जिसका कण्ठदेश तीनरेखा से युक्त (शोभाय-
मान) हो, सम्भोग क्रीडा में आसक्त हो, वह स्त्री शङ्खिनी है ॥ ६ ॥
अथ हस्तिनीलक्षणम्—
स्थूलाधरा स्थूलनितम्बभागा
स्थूलाङ्गुली स्थूलकुचा सुशीला ।
( श्लोक ५ ) रतिरसं जानाति या सा । तिलकुसुमवत् सुष्ठु शोभने नासिके
यस्याः सा । स्निग्धं च तन्नीलोत्पलञ्च स्निग्धनीलोत्पलं तद्वदक्षिणी यस्याः सा । घनौ
कठिनौ च तौ कुचौ ताभ्यामाढ्या । बद्धः शीलो यस्याः सा ।
[ श्लोक ६ ]—दीर्घातिदीर्घे नयने यस्याः सा। कामस्योपभोगः कामोपभोगस्तत्र
रसिका । गुणश्च शीलञ्च गुणशीलौ ताभ्यां युक्ता । विभूषितः कण्ठदेशो यस्याः
सा । सम्भोगकेलौ रसिका, सम्भोगकेलिरसिका ।
४ रतिमञ्जरी-
कामोत्सुका गाढरतिप्रिया या
नितान्तभोक्त्री करिणी मता सा ॥७॥
टी०—अब हस्तिनी स्त्री का लक्षण कहते हैं:—जो स्त्री पुष्ट अधर
वाली हो, पुष्ट नितम्ब ( कटिपश्चाद्भाग ) शाली हो, मोटी ( पुष्ट )
अङ्गुली वाली हो, पुष्ट स्तन वाली हो, सुन्दर स्वभाव वाली हो, कामके
विषय में उत्साह वाली हो, दृढ़ रति प्रिय हो, अतिशय भोग करने वाली
हो, वह स्त्री हस्तिनी है ॥ ७ ॥
अथ तासां सन्तोषकरान् पुरुषानाह—
शशके पद्मिनी तुष्टा चित्रिणी रमते मृगे ।
वृषभे शङ्खिनी तुष्टा हस्तिनी रमते हये ॥ ८ ॥
टी०—अब उक्त चतुर्विध स्त्रियों को जिन पुरुषों से सन्तोष होता है
सो कहते हैं—पद्मिनी स्त्री शश नाम पुरुष में सन्तुष्ट होतो है । चित्रिणी
स्त्री मृग नाम पुरुष में रमण करती है । शङ्खिनी स्त्री वृषभ नाम पुरुष में
सन्तुष्ट होती है । और हस्तिनी स्त्री हयनाम पुरुष में रमण करती है ॥८॥
अथ स्त्रीजातिचतुष्टयलक्षणम्—
पद्मिनी पद्मगन्धा च मीनगन्धा च चित्रिणी ।
शङ्खिनी क्षारगन्धा च मदगन्धा च हस्तिनी ॥ ९ ॥
टी०—पद्मसदृश गन्धवाली पद्मिनी स्त्री होती है । मीन सदृश गन्ध
वाली चित्रिणी स्त्री होती है । खार सदृश गन्ध वाली शङ्खिनी स्त्री होती
है । मदके सदृश गन्ध वाली हस्तिनी स्त्री होती है ॥ ९ ॥
[श्लो० ७] स्थूलोऽधरो यस्याः सा । स्थूलो नितम्बभागो यस्याः सा । स्थूला-
ऽङ्गुलिर्यस्याः सा । स्थूलौ कुचौ यस्याः सा । सुष्ठु शोभनः शीलो यस्याः सा । कामे
उत्सुका कामोत्सुका । गाढा रतिः प्रिया यस्याः सा । नितान्तं भोक्त्री नितान्तभोक्त्री ।
[ श्लो० ९ ] पद्मवत् गन्धो यस्याः सा । मीनवत् गन्धो यस्याः सा । क्षीरवत्
गन्धो यस्याः सा । मद इव गन्धो यस्याः सा ।
१. चतुर्विध नायिका-लक्षण (पद्मिनी, चित्रिणी, शङ्खिनी, हस्तिनी)
भाषाटीकासहिता ।
अथ नायिकाभेदाः—
बाला च तरुणी प्रौढा वृद्धा भवति नायिका ।
गुणयोगेन रन्तव्या नारी वश्या भवेत्तदा ॥१०॥
टी०—बाला, तरुणी, प्रौढा, वृद्धा—ये चार प्रकार की नायिका
(स्त्रियाँ) होती हैं। ये गुणयोग से रमण करने योग्य हैं। गुणयोग से
रमण करने ही से स्त्री वशीभूत होती है ॥१०॥
अथ नायिकालक्षणम्—
आषोडशाद्भवेद्बाला तरुणी त्रिंशता मता ।
पञ्चपञ्चाशता प्रौढा भवेद्वृद्धा ततः परम् ॥११॥
टी०—षोडश [सोलह] वर्ष पर्यन्त स्त्री बाला रहती है। तीस वर्ष
पर्यन्त स्त्री तरुणी रहती है। पचपन वर्ष पर्यन्त स्त्री प्रौढा रहती है।
इसके ऊपर स्त्री वृद्धा होती है ॥११॥
अथ नायिकावशीकरणविधिः—
फलमूलादिभिर्बाला तरुणी रतियोगतः ।
प्रेमदानादिभिः प्रौढा वृद्धा च दृढताडनात् ॥१२॥
टी०—फल मूल आदि भोज्यपदार्थों से बाला स्त्री प्रसन्न होती है।
रतिक्रीडा करने से तरुणी स्त्री प्रसन्न होती है। प्रेमादिक से प्रौढा स्त्री
प्रसन्न होती है। और अधिक ताड़न से वृद्धा स्त्री प्रसन्न होती है ॥१२॥
अथ नायिकागुणाः—
बाला तु प्राणदा प्रोक्ता तरुणी प्राणहारिणी ।
प्रौढा करोति वृद्धत्वं वृद्धा तु मरणं दिशेत् ॥१३॥
टी०—अब नायिका के गुण कहते हैं—बाला स्त्री प्राण देने वाली
कही गई है। तरुणी स्त्री प्राण हरने वाली कही गई है। प्रौढा स्त्री शरीर
शिथिल करने वाली कही गई है। वृद्धा स्त्री तो मरण देने वाली ही है ॥
६ रतिमञ्जरी-
अथ कामस्थानानि—
अङ्गुष्ठे चरणे च गुल्फनिलये जानुद्वये वस्तिके
नाभौ वक्षसि कक्षयोर्निगदिता कण्ठे कपोलेऽधरे ।
नेत्रे कर्णयुगे ललाटफलके मौलौ च वामभ्रुवा-
मूर्ध्वाधश्चलनक्रमेण कथिता चान्द्रीकला पक्षयोः ॥१४॥
टी०—अब स्त्रियों के किन २ स्थानों में काम रहता है सो कहते हैं—
( १ ) अङ्गुष्ठों में ( २ ) चरणों में ( ३ ) पैरके टिखने में ( ४ ) गोड़ों में
( ५ ) नाभि के नीचे मूत्राशय में ( ६ ) नाभि में ( ७ ) वक्षःस्थल में
( ८ ) काँखों में ( ९ ) कण्ठ में ( १० ) गाल में ( ११ ) नीचे के ओष्ठ में
( १२ ) नेत्र में ( १३ ) काम में ( १४ ) ललाट में ( १५ ) मस्तक में
काम रहता है, ( अर्थात् ) स्त्री के इन अङ्गों में शुक्लपक्ष में ऊर्ध्वक्रम से,
कृष्णपक्ष में अधःक्रम से, [चान्द्रीकला ( कामनिवासस्थान ) कामशास्त्रा-
चार्यों ने कहा है ॥ १४ ॥ अन्यच्च—
सीमन्ते नयनेऽधरे च गलके वक्षःस्थले चूचुके
नाभौ श्रोणितटे मनोभवगृहे जानौ च जङ्घातटे ।
गुल्फे पादतले तदङ्गुलितटेऽङ्गुष्ठे च तिष्ठत्यसौ
वृद्धिक्षीणतया समं शशिकला पक्षद्वये योषिताम्॥१५॥
टी०—( १ ) मस्तक के मध्य ( २ ) नेत्र ( ३ ) अधर ( ४ ) गला
( ५ ) वक्षःस्थल ( ६ ) स्तन ( ७ ) नाभि ( ८ ) कटि ( ९ ) योनि
( १० ) जानु ( घुटनो ) ( ११ ) जंघा ( १२ ) पैरके टिखने ( १३ ) पैर-
तले ( १४ ) पैर की अंगुली ( १५ ) पैर के अंगूठे, स्त्रियों के इन ( १६ )
अङ्गों में शुक्ल-कृष्ण दोनों पक्षों में चन्द्रकळा ( कामनिवासस्थान ) सम
( तुल्य ) है ॥ १५ ॥
शुक्लपक्षे वसेद्वामे पादाङ्गुलिकनिष्ठके ।
शुक्लप्रतिपदादौ च कृष्णे चाधः प्रलम्बते ॥ १६ ॥
भाषाटीकासहिता । ७
टी०—शुक्ल पक्ष में और शुक्ल पक्षकी प्रतिपत्तिथि में बाँएँ पैर की
कनिष्ठ अंगुली में काम वास करता है । कृष्ण पक्ष में बाएँ पैर की कनिष्ठ
अंगुली के नीचे भाग में काम वास करता है ॥ १६ ॥
पुंसः सव्ये स्त्रिया वामे शुक्ले कृष्णे विपर्ययः ।
एतानि कामस्थानानि ज्ञेयानि नागरैः सदा ॥१७॥
टी०—शुक्ल पक्ष में पुरुष के दक्षिण भाग स्त्री के वाम भाग में,
कृष्ण पक्ष में पुरुष के वाम भाग स्त्री के दक्षिण भाग में काम का वास-
स्थान है, यह रसिक जन जानें ॥ १७ ॥
अथ प्रबलवनितानिधुवनविधिः—
बलयुक्ता यदा नारी विपरीतरतिर्भवेत् ।
सञ्चाल्य तु कलास्थानं रन्तव्या कामिनी तदा ॥१८॥
टी०—जो स्त्री प्रबल (अर्थात् बलयुक्त) हो तब कला (काम)
स्थान को सञ्चालन कर पुरुष विपरीत रति हो अर्थात् स्त्री को अपने
ऊपर विराजमान करके रमण करे ॥ १८ ॥
अथ चुम्बनस्थानानि—
नेत्रे कण्ठे कपोले च हृदि पार्श्वद्वयेऽपि च ।
ग्रीवायां नाभिदेशे च कामी चुम्बति कामिनीम् ॥१९॥
टी०—कामी पुरुष कामिनी के नेत्र, कण्ठ, गाल, हृदय, पसवाड़,
गला, नाभि—इन स्थानों का चुम्बन करता है ॥१९॥
मुखे जंघे कपोले च जघने मदनालये ।
स्तनयुग्मे सदा प्रीतिः कामी चुम्बति कामिनीम् ॥२०॥
टी०—कामी पुरुष कामिनी के मुख, जङ्घा, कपोल, जघन (नाभि के
अधोदेश ), योनि, स्तन-इन स्थानों में प्रसन्न होकर सदा चुम्बन करता है ॥
प्रेम्णा स्त्रियं समालिङ्ग्य शीत्कारं मुखचुम्बनम् ।
कण्ठासक्तं पुनः कृत्वा गाढालिङ्गनमाचरेत् ॥२१॥
८ रतिमञ्जरी-
टी०-प्रेम से स्त्री का आलिङ्गन कर और शीत्कार पूर्वक मुख का
चुम्बन कर, फिर कण्ठ में लगाकर दृढ़ आलिङ्गन करै ॥२१॥
विधृत्य हस्तौ जघनोपविष्टः
शीत्कृत्य वक्त्रं च मुदा प्रचुम्ब्य ।
भगे च लिङ्गं स्तनमद्दर्दनञ्च
दत्वा च प्रेम्णा परमेच्च कामी ॥२२॥
टी०--कामी पुरुष स्त्री के जघन पर बैठकर, उसके दोनों हाथों को
पकड़कर, हर्ष से शीत्कार पूर्वक मुख का चुम्बन कर, योनि में लिङ्ग को
देकर, स्तनों का मर्दन करते हुए प्रेम से रमण करै ॥२२॥
केतक्यग्रनखां कृत्वा नखाँस्त्रीन् पञ्च चैव वा ।
पृष्ठे च जघने योनौ दत्वा कामी रमेत् स्त्रियम् ॥२३॥
टी०--कामी पुरुष केतकी (केवड़ा) पुष्प के सदृश नख करके,
तीन अथवा पाँचों नखों को पृष्ठ, जघन और योनि में देकर स्त्री से
रमण करै ॥ २३ ॥
नखरोमाञ्चितं कृत्वा दन्तेनाऽधरपीडनम् ।
ग्रीवामाकृष्य भगेन योनौ लिंगेन ताडनम् ॥२४॥
टी०-नखों में रोमाञ्च कर दाँत से अधर का पीडन कर, वेग से
गला को आकर्षण कर, योनि (भग) में लिङ्ग से ताडन करै ॥२४॥
लिङ्गप्रवेशनं कृत्वा धृत्वा गाढप्रयोगतः ।
पार्श्वद्वयञ्च सम्पीड्य सस्पृहं ताडयेद्भगम् ॥२५॥
टी०-योनि में लिङ्ग को स्थापितकर, अपने दोनों हाथों से जोर से
पकड़कर, दोनों पसवाड़ों को पीडनकर, यथेच्छ भग को ताडन करै ॥२५॥
समालिङ्ग्य स्त्रियं गाढं स्तनयुग्मे च मर्द्दनम् ।
योनिं नाभौ च सम्मर्द्य निष्ठुरं लिङ्गताडनम् ॥२६॥
भाषाटीकासहिता । ९
टी०--स्त्री को आलिङ्गन कर, फिर अधिक बाथ भरके दोनों स्तनों
को मर्दन करै । फिर नाभि की ओर योनि को मर्दन कर, उसमें दृढ
लिङ्ग ताडन करे ॥२६॥
केशं करेण संगृह्य दृढं सन्ताडयेद्भगम् ।
वदने चुम्बनं कृत्वा भगं हस्तेन मर्दयेत् ॥२७॥
टी०—केशों को हाथ से पकड़कर, योनि को दृढ़ ताडन करै । मुख
में चुम्बन कर योनि को हाथ से मर्दन करे ॥२७॥
अथ पद्मिनीरमणविधिः—
कुचं करेण सम्मर्द्य पीडयेदधरं दृढम् ।
रमणः पद्मबन्धेन पद्मिनीरतिमादिशेत् ॥२८॥
टी०—हाथ से कुचों को मर्दनकर अधर को दृढ़ पीड़न करै, फिर
रमण (स्वामी) कमलासन से पद्मिनी स्त्री से रति (भोग) करै ॥२८॥
अथ चित्रिणीरमणविधिः—
शीत्कारं चुम्बनं कृत्वा गले हस्ते च चुम्बनम् ।
कुचं हस्तेन सम्मर्द्य चित्रिणीरतिमादिशेत् ॥२९॥
टी०--शीत्कार पूर्वक चुम्बनकर फिर गला और हाथ का चुम्बन करै ।
पश्चात् हाथ से स्तनों को मर्दनकर चित्रिणी स्त्री के साथ रति (भोग) करै ॥
अथ शङ्खिनीरतिविधिः--
स्त्रीपुंसोस्तथान्योऽन्यं भगे लिंगे च चुम्बनम् ।
रमणं तु यथा गाढं शङ्खिनीरतिमादिशेत् ॥३०॥
टी०—परस्पर स्त्री पुरुष भग और लिङ्ग में चुम्बन करै (अर्थात्
स्त्री लिङ्ग में चुम्बन करै और पुरुष भग में चुम्बन करै, फिर दृढ़ रमण
(भोग) करै, यह शङ्खिनी स्त्री के साथ रति की विधि कही है ॥३०॥
अथ हस्तिनीरमणविधिः--
केशं करेण संगृह्य सुदृढं जालबन्धनम् ।
२. आलिङ्गन, चुम्बन, रति-बन्ध एवं ग्रन्थ उपसंहार
१० रतिमञ्जरी-
भगं करेण सन्ताड्य हस्तिनीरतिमादिशेत् ॥३१॥
टी०--हाथ से केश को पकड़कर सुदृढ़ ( अच्छी तरह ) जालबन्ध
करै । फिर हाथ से योनि को मर्द्दन कर हस्तिनी स्त्री से रति ( भोग )
करै ॥ ३१ ॥
अथ भगलक्षणम्-
कूर्मपृष्ठं गजस्कन्धं पद्मगन्धि सुगन्धि यत् ।
अलोमकं सुविस्तीर्णं भगं पञ्चविधं वरम् ॥३२॥
टी०--(१) कछुवा की पीठ के सदृश (२) हाथी के स्कन्ध के सदृश
(३) कमलगन्ध के सदृश सुगन्धयुक्त (४) लोमरहित (५) सुन्दर विस्तृत-
ये पाँच प्रकार के भग ( योनि ) उत्तम हैं ॥३२॥
अथ भगदोषः—
शीतलं निम्नमत्युच्चं गोजिह्वासदृशं खरम् ।
इत्युक्तं कामशास्त्रज्ञैर्भगदोषचतुष्टयम् ॥३३॥
टी०-( १ ) शीतल ( ठण्डी ) ( २ ) गहिरी ( ३ ) अतिशय ऊँची
( ४ ) गौ की जीभ के सदृश कठोर—ये चार प्रकार भग के दोष काम-
शास्त्र को जानने वालों ने कहा है ॥३३॥
अथ लिङ्गलक्षणम्-
मुसलं वंशकवीरं द्विविधं लिङ्गलक्षणम् ।
स्थूलं मुसलमित्युक्तं दीर्घं वंशकवीरकम् ॥३४॥
टी०-मुसल और वंशकबीर ये दो प्रकार के लिङ्ग होते हैं । स्थूल
श्लो० ३१—जालेन बन्धनं जालबन्धनम् ( जालसदृशबन्धनमित्यर्थः ) ।
श्लो० ३२-कूर्मपृष्ठं कूर्मपृष्ठसदृशम् । गजस्कन्धं गजस्कन्धसदृशम् । पद्मगन्ध-
वत् सुगन्धयुक्तम् । न विद्यन्ते लोमानि यस्मिन् तत् ।
श्लोक० ३३—स्त्रिया जितः स्त्रीजितः । नार्यां सत्यपरो नारीसत्यपरः । षडङ्गुलं
शरीरं यस्य सः । श्रीरस्यास्तीति श्रीमान् ।
भाषाटीकासहिता । ११
( मोटा ) लिङ्ग को मुसल कहा है, दीर्घ ( लम्बा ) लिङ्ग को वंशकबीर
कहा है ॥ ३४ ॥
अथ पुरुषाणां जातिभेदे शशपुरुषलक्षणम्--
स्त्रीजितो गायकश्चैव नारीसत्यपरः सुखी ।
षडंगुलशरीरश्च स श्रीमान् शशको मतः ॥३५॥
टी०—जो पुरुष स्त्री के वशीभूत हो गान करने वाला हो, स्त्री में
सत्य बोलने वाला हो, सुखी हो, छः अङ्गुल का लिङ्ग वाला हो, धनवान्
हो, वह शशक कहा गया है ॥ ३५ ॥
अथ मृगपुरुषलक्षणम्—
श्रेष्ठस्तु धार्मिकः श्रीमान् सत्यवादी प्रियंवदः ।
अष्टांगुलशरीरश्च रूपयुक्तो मृगो मतः ॥३६॥
टी०—जो पुरुष श्रेष्ठ ( अच्छा ) हो, धर्मात्मा हो, धनवान् हो,
सत्य बोलने वाला हो, प्रिय बोलने वाला हो, आठ अङ्गुल का लिङ्ग वाला
हो, रूपवान् हो, वह मृग जाति का पुरुष कहा गया है ॥३६॥
अथ वृषपुरुषलक्षणम्--
उपकारपरो नित्यं स्त्रीजितः श्लेष्मलः सुखी ।
दशांगुलशरीरश्च मनस्वी वृषभो मतः ॥३७॥
टी०—जो पुरुष नित्य परोपकारी हो, स्त्री के वशीभूत हो, कफ
प्रकृति वाला हो, सुखी हो, दश अङ्गुल का लिङ्ग वाला हो, मनस्वी हो,
वह पुरुष वृषभ जाति का कहा गया है ॥३७॥
अथ हयपुरुषलक्षणम्--
काष्ठतुल्यवपुर्धृष्टो मिथ्यावाद्यश्च निर्भयः ।
द्वादशांगुललिङ्गश्च दरिद्रश्च हयो मतः ॥३८॥
टी०—काष्ठ के सदृश कठोर शरीर वाला हो, ढीठ हो, झूठ बोलने
श्लो० ३८—काष्ठेन तुल्यं वपुर्यस्य सः । मिथ्या वाक् यस्य सः । भयान्नि-
ष्क्रान्तो निर्भयः । द्वादशांगुलं लिङ्गं यस्य सः ।
१२ रतिमञ्जरी-
बाला हो, भय रहित हो, बारह अङ्गुल का लिङ्ग वाला हो, निर्धन हो,
वह अश्व जाति का पुरुष कहा गया है ॥३८॥
अथाऽऽसनानि-
अतृप्ता रमणे नार्यो रमन्ते न यदा तदा ।
नानाबन्धैर्वक्ष्यमाणै रन्तव्याः कामिभिः स्त्रियः ॥३९॥
टी०-जब स्त्री स्वामी में अतृप्त होकर रमण न करै तब आगे कहे
जाने वाले अनेक आसनों द्वारा पुरुषों से स्त्री रमण करने योग्य है ॥३९॥
अथ षोडशासननामानि-
पद्मासनो नागपादो लतावेष्टोऽर्द्धसम्पुटः ।
कुलिशः सुन्दरश्चैव तथा केशरसंज्ञकः ॥४०॥
टी०-( १ ) पद्मा ( कमला ) सन । ( २ ) नागपाद ( ३ ) लतावेष्ट
( ४ ) अर्द्धसम्पुट ( ५ ) कुलिश ( ६ ) सुन्दर ( ७ ) केशर ॥४०॥
हिल्लोलो नरसिंहोऽपि विपरीतस्तथा परः ।
क्षुद्गारो धेनुकश्चैव उत्कण्ठश्च ततः परः ॥४१॥
टी०-(८) हिल्लोल (९) नृसिंह (१०) विपरीत (११) क्षुद्गार (१२)
धेनुक (१३) उत्कण्ठ ॥४१॥
सिंहासनो रतिर्नागो विद्याधरस्तु षोडश ॥४२॥
टी०-(१४) सिंहासन (१५) रतिनाग (१६) विद्याधर-ये षोडश
( सोळह ) आसन हैं ॥ ४२ ॥
अथ पद्मासनलक्षणम्-
हस्ताभ्यां च समालिङ्ग्य नारी पद्मासनोपरि ।
रमेद्गाढं समाकृष्य बन्धोऽयं पद्मसंज्ञकः ॥४३॥
टी०-पुरुष दोनों हाथों से स्त्री को आलिङ्गन कर दृढ़ बाथ भरकर
पद्मासन के ऊपर रमण करै, यह पद्मासन कहा है ॥४३॥
भाषाटीकासहिता । १३
अथ नागपादासनलक्षणम्—
स्कन्धे पादौ समाधाय योनौ लिङ्गं प्रवेश्य च।
कामी रमेद्दृढं नारीं नागपादासनं स्मृतम् ॥४४॥
टी०—दोनों पैरों को कन्धे पर रखकर योनि में लिङ्ग को प्रवेश कर
कामी पुरुष नारी से दृढ रमण करै, इसको नागपाद नाम आसन कहा है ॥
अथ लतावेष्टनासनलक्षणम्—
बाहुभ्यां पादयुग्माभ्यां वेष्टयित्वा रमेत् स्त्रियम् ।
लिंगेन ताडयेद्योनिं लतावेष्टोऽयमुच्यते ॥४५॥
टी०—कामी पुरुष दोनों हाथों और दोनों पैरों से स्त्री को लपेट
कर रमण करै। और लिङ्ग से भग को ताडन करे, यह लतावेष्ट नामका
आसन कहा गया है। जैसे लता वृक्ष में लिपटती है वैसे स्त्री में लिपट
जाने से यह लतावेष्ट नाम से प्रसिद्ध है ॥ ४५ ॥
अर्द्धसम्पुटासनलक्षणम्—
अन्तरिक्षे स्त्रियः पादौ कृत्वा स्वस्य च भूतले ।
हस्ताभ्यां मर्दनं कृत्वा स्तनयोश्च निरन्तरम् ।
कामी रमेत्स्त्रियं तूर्णं बन्धोऽयमर्द्धसम्पुटः ॥४६॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री के दोनों पैरों को ऊपर उठा कर अपने दोनों
पैरों को पृथ्वी पर रखकर दोनों हाथों से स्तनों को निरन्तर मर्दन करके
स्त्री से शीघ्र रमण करै, यह अर्द्धसम्पुट आसन है ॥ ४६ ॥
अथ कुलिशासनलक्षणम्—
स्त्रीपादद्वयमास्फाल्य हठाल्लिंगेन ताडनम् ।
योनौ कुर्यात्सदा कामी बन्धः कुलिशसंज्ञकः ॥४७॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री के दोनों पैरों को मर्दन कर हठ से योनि में
लिङ्ग से सदा ताडन करै, यह कुलिश नाम आसन है ॥ ४७ ॥
१४ रतिमञ्जरी-
रतिसुन्दरासनलक्षणम्-
नारीपादद्वयं स्वामी धारयेदूर्ध्वदेशतः ।
कुचौ धृत्वा पिबेद्वक्त्रं बन्धोऽयं रतिसुन्दरः ॥४८॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के दोनों पगों को ऊपर रक्खै । स्तनों को
पकड़ कर मुख का चुम्बन करै, यह रतिसुन्दर नाम आसन है ॥ ४८ ॥
केशरासनलक्षणम्-
स्त्रिया जङ्घे समापीड्य दोर्भ्यां गात्रस्य मर्दनम् ।
पुनः प्रपीडयेद्योनिं बन्धः केसरसंज्ञकः ॥४९॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के दोनों जङ्घे को मर्दन कर और दोनों
हाथों से शरीर का मर्दन फिर योनि को लिङ्ग से ताडन करै यह
केसरासन कहा है ॥ ४९ ॥
अथ नृसिंहासनलक्षणम्-
पादौ सम्पीड्य योनौ च हठाल्लिङ्गप्रवेशनम् ।
हस्ताभ्यां वेष्टनं गाढं बन्धो नृसिंहसंज्ञकः ॥५०॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री की योनि का मर्दन कर हठ से योनि में
लिङ्ग प्रवेश कर दोनों हाथों से दृढ लिपट कर रमण करै यह नृसिंह
नाम आसन कहा है ॥ ५० ॥
अथ विपरीतासनलक्षणम्-
अंशावेकं पदं कृत्वा द्वितीयं कटिसंस्थितम् ।
नारीं च सुरमेत्कामी विपरीतासनं स्मृतम् ॥५१॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के एक पैर को अपने जङ्घे पर रख कर
दूसरे पैर को कमर के समीप कर नारी से अच्छी तरह रमण करै यह
विपरीतासन कहा गया है ॥ ५१ ॥
अथ क्षुद्रारासनलक्षणम्-
पार्श्वोपरि पदौ कृत्वा योनिं लिंगेन ताडयेत् ।
भाषाटीकासहिता । १५
बाहुभ्यां ताडयेद्गाढं क्षुद्गारो बन्धसंज्ञकः ॥५२॥
टी०—स्त्री के दोनों पगों को अपने पसवाड़े पर रख लिङ्ग से
योनि को ताडन करै । और दोनों हाथों से दृढ ताडन करै, यह क्षुद्रारा-
सन कहा है ॥ ५२ ॥
धेनुकासनलक्षणम्—
सुप्तां स्त्रियं समालिंग्य स्वयं सुप्तो रमेत्पुनः ।
यल्लिगं चालयेद्योनौ बन्धोऽयं धेनुकः स्मृतः ॥५३॥
टी०—सोती हुई स्त्री को आलिङ्गन कर आप भी सोता हुआ जिस
हेतु योनि में लिंग चलाता हुआ कामी रमण करता है इस लिये धेनुक
नाम का यह आसन कहा गया है ॥ ५३ ॥
उत्कण्ठासनलक्षणम्—
नारीपादौ च हस्तेन धारयेद्गलके पुनः ।
स्तनार्पितकरः कामी बन्धश्चोत्कण्ठसंज्ञकः ॥५४॥
टी०—कामी पुरुष के दोनों पगों को हाथ से कण्ठ में रख फिर
अपने दोनों हाथों को स्तन पर धरै, यह उत्कण्ठासन है ॥ ५४ ॥
अथ सिंहासनबन्धलक्षणम्—
स्वीये जङ्घाद्वये कामी कृत्वा योषित्पदद्वयम् ।
स्तनौ धृत्वा रमेन्नारीबन्धः सिंहासनो मतः ॥५५॥
टी०--कामी पुरुष अपने दोनों जंघे पर स्त्री के दोनों पैरों को रख-
कर स्तनों को मर्दन कर स्त्री से रमण करै, यह सिंहासन बन्ध कहा है ॥
अथ रतिनागबन्धलक्षणम्—
पीडयेदुरुयुग्मेन कामुकः कामिनीं यदि ।
रतिनागः समाख्यातः कामिनीनां मनोहरः ॥५६॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री को दोनों उरुओं से पीड़ित कर उसके साथ
१६ रतिमञ्जरी—
रमण करै । यह कामिनियों के मनको हरने वाला रतिनाग नाम आसन
कहा है ॥ ५६ ॥
अथ विद्याधरासनलक्षणम्—
नार्याश्चोरुयुगं धृत्वा कराभ्यां ताडयेत्पुनः ।
रमयेन्निर्भरं कामी बन्धो विद्याधरो मतः ॥५७॥
टी०—कामी पुरुष दोनों हाथों से स्त्री के दोनों जङ्घे को धारण कर
फिर योनि ताडन करता हुआ दृढ रमण करै, यह विद्याधर नाम आसन
कहा है ॥ ५७ ॥
अथ कामिजनप्रशंसा—
स्त्रियमानीय यत्नेन विधृत्य चरणद्वयम् ।
वशं नयति यः कामी रतिशास्त्रविचक्षणः ॥५८॥
टी०—जो कामी पुरुष यत्न से स्त्री को लाकर उसके दोनों चरणों
को धर कर वशीभूत करता है, वह रतिशास्त्र का पण्डित है ॥ ५८ ॥
रतिशास्त्रं समाकर्ण्य बन्धान् पद्मादिषोडश ।
नानाविधरतिं कुर्यात्कामिन्या कामुको जनः ॥५९॥
टी०—कामी पुरुष रतिशास्त्र को सुनकर पद्मादि सोलह आसन को
जानकर कामिनी के साथ अनेक प्रकार से रति करै ॥ ५९ ॥
सर्वशास्त्रार्थवक्त्रेण जयदेवेन धीमता ।
मञ्जरी रतिशास्त्रस्य कृत्वा नीता समाप्तताम् ॥६०॥
टी०—सब शास्त्रों का अर्थ मुख में है जिसके ऐसा बुद्धिमान् जय-
देव कवि ने रतिशास्त्र की मञ्जरी समाप्त की ॥ ६० ॥
ॐ विक्रेयसंस्कृतपुस्तकानि ॐ
अन्योक्तिसाहस्री—पं० श्रीबदरीनाथझा कृत ॥=)
अर्थसंग्रह—पं० श्रीराजनारायणशास्त्रीकृत सं० टी० भा० टी० १)
अलङ्कारसारमञ्जरी—म०म० पं० श्रीनारायणशास्त्रीखिस्तेकृत ।=)
उत्कीर्णलेखाञ्जलि—श्रीजयचन्द्रविद्यालङ्कारकृत सं.टी.भा०टी० ।।।)
मेघदूत—सं० टी०, श्रीमन्नालालअभिमन्युकृत भा० टी० १।)
छन्दःकौमुदी--म० म० पं० श्रीनारायणशास्त्री खिस्ते कृत ।=)
जातकमाला—प० श्री बटुकनाथशास्त्रीखिस्ते कृत सं० टी० २)
तर्कभाषा—पं० श्री राजनारायणशास्त्री कृत सं०टी०, भा०टी० १)
नैषधीयचरित--पं० श्रीऋषीश्वरनाथभट्ट कृत हि० टी० ६)
पञ्चतन्त्र—प्रथमतन्त्र, श्रीमन्नालालअभिमन्यु कृत हि० टी० २।।)
पालिजातकावलि--प्रो० श्रीबटुकनाथशर्माकृत सं.टी.,भा.टी. २।)
प्रसन्नराघव नाटक--पं० श्रीरामचन्द्रमिश्रकृत ,, ,, ३)
मुद्राराक्षस नाटक-पं०श्रीब्रह्मानन्दशुक्लकृत सं.टी.भा.टी. २) २ ॥)
मृच्छकटिक नाटक-,, ,, ,, ,, ५) ६)
रघुवंश महाकाव्य--१-२सर्ग, सञ्जीवनी, हिन्दी टीका सहित १)
रामवनगमन—पं० श्रीराजनारायणशास्त्रीकृत सं०टी०भा०टी० १।)
विदुलोपाख्यान—,, ,, ,, ,, ॥=)
वैदिकसूक्तसंग्रह—पं० श्रीवेणीरामशर्मागौडकृत ,, ,, १।)
सावित्र्युपाख्यान—पं० श्रीब्रह्मानन्दशुक्लकृत सं०टी० भा०टी० १।)
संस्कृतसाहित्य का सम्पूर्णेतिहास--श्रीहजूररामशास्त्रीकृत ॥)
हर्षचरितसारदीपिका--पं० श्रीब्रह्मानन्दशुक्लकृत हिन्दी ॥)
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कचौड़ीगली, बनारस-१