रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहिता । ३
तिलकुसुमसुनासा स्निग्धनीलोत्पलाक्षी ।
घनकठिनकुचाढ्या सुन्दरी बद्धशीला
सकलगुणयुता सा चित्रिणी चित्रवक्त्रा ॥ ५ ॥
टी०—अब चित्रिणी स्त्री का लक्षण कहते हैं—वही स्त्री चित्रिणी
है जो रतिरस को जानती हो, और न बहुत छोटी हो और न बहुत
लम्बी हो । तिल पुष्प के समान नासिका वाली हो, चिकण नीलकमल
के सदृश नेत्र वाली हो, और निरन्तर कठिन कुचों से युक्त हो, सुन्दर
स्वभाव वाली हो, सकल गुणों से युक्त हो, और आश्चर्य मुखवाली हो ॥
अथ शङ्खिनीलक्षणम्—
दीर्घातिदीर्घनयना वरसुन्दरी या
कामोपभोगरसिका गुणशीलयुक्ता ।
रेखात्रयेण च विभूषितकण्ठदेशा
सम्भोगकेलिरसिका(निरता)किल शङ्खिनी सा ॥ ६ ॥
टी०—अब शङ्खिनी स्त्री का लक्षण कहते हैं-जो स्त्री लम्बी कदवाली
हो, दीर्घनेत्रवाली हो, अत्यन्त सुन्दरी हो, काम के उपभोग में रसिक हो,
गुण-शील सम्पन्न हो और जिसका कण्ठदेश तीनरेखा से युक्त (शोभाय-
मान) हो, सम्भोग क्रीडा में आसक्त हो, वह स्त्री शङ्खिनी है ॥ ६ ॥
अथ हस्तिनीलक्षणम्—
स्थूलाधरा स्थूलनितम्बभागा
स्थूलाङ्गुली स्थूलकुचा सुशीला ।
( श्लोक ५ ) रतिरसं जानाति या सा । तिलकुसुमवत् सुष्ठु शोभने नासिके
यस्याः सा । स्निग्धं च तन्नीलोत्पलञ्च स्निग्धनीलोत्पलं तद्वदक्षिणी यस्याः सा । घनौ
कठिनौ च तौ कुचौ ताभ्यामाढ्या । बद्धः शीलो यस्याः सा ।
[ श्लोक ६ ]—दीर्घातिदीर्घे नयने यस्याः सा। कामस्योपभोगः कामोपभोगस्तत्र
रसिका । गुणश्च शीलञ्च गुणशीलौ ताभ्यां युक्ता । विभूषितः कण्ठदेशो यस्याः
सा । सम्भोगकेलौ रसिका, सम्भोगकेलिरसिका ।