रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहिता । ९
टी०--स्त्री को आलिङ्गन कर, फिर अधिक बाथ भरके दोनों स्तनों
को मर्दन करै । फिर नाभि की ओर योनि को मर्दन कर, उसमें दृढ
लिङ्ग ताडन करे ॥२६॥
केशं करेण संगृह्य दृढं सन्ताडयेद्भगम् ।
वदने चुम्बनं कृत्वा भगं हस्तेन मर्दयेत् ॥२७॥
टी०—केशों को हाथ से पकड़कर, योनि को दृढ़ ताडन करै । मुख
में चुम्बन कर योनि को हाथ से मर्दन करे ॥२७॥
अथ पद्मिनीरमणविधिः—
कुचं करेण सम्मर्द्य पीडयेदधरं दृढम् ।
रमणः पद्मबन्धेन पद्मिनीरतिमादिशेत् ॥२८॥
टी०—हाथ से कुचों को मर्दनकर अधर को दृढ़ पीड़न करै, फिर
रमण (स्वामी) कमलासन से पद्मिनी स्त्री से रति (भोग) करै ॥२८॥
अथ चित्रिणीरमणविधिः—
शीत्कारं चुम्बनं कृत्वा गले हस्ते च चुम्बनम् ।
कुचं हस्तेन सम्मर्द्य चित्रिणीरतिमादिशेत् ॥२९॥
टी०--शीत्कार पूर्वक चुम्बनकर फिर गला और हाथ का चुम्बन करै ।
पश्चात् हाथ से स्तनों को मर्दनकर चित्रिणी स्त्री के साथ रति (भोग) करै ॥
अथ शङ्खिनीरतिविधिः--
स्त्रीपुंसोस्तथान्योऽन्यं भगे लिंगे च चुम्बनम् ।
रमणं तु यथा गाढं शङ्खिनीरतिमादिशेत् ॥३०॥
टी०—परस्पर स्त्री पुरुष भग और लिङ्ग में चुम्बन करै (अर्थात्
स्त्री लिङ्ग में चुम्बन करै और पुरुष भग में चुम्बन करै, फिर दृढ़ रमण
(भोग) करै, यह शङ्खिनी स्त्री के साथ रति की विधि कही है ॥३०॥
अथ हस्तिनीरमणविधिः--
केशं करेण संगृह्य सुदृढं जालबन्धनम् ।