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सर्वकोश
रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)

रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)

Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary

कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished18 पृष्ठ

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भाषाटीकासहिता ।
अथ नायिकाभेदाः—
बाला च तरुणी प्रौढा वृद्धा भवति नायिका ।
गुणयोगेन रन्तव्या नारी वश्या भवेत्तदा ॥१०॥
टी०—बाला, तरुणी, प्रौढा, वृद्धा—ये चार प्रकार की नायिका
(स्त्रियाँ) होती हैं। ये गुणयोग से रमण करने योग्य हैं। गुणयोग से
रमण करने ही से स्त्री वशीभूत होती है ॥१०॥
अथ नायिकालक्षणम्—
आषोडशाद्भवेद्बाला तरुणी त्रिंशता मता ।
पञ्चपञ्चाशता प्रौढा भवेद्वृद्धा ततः परम् ॥११॥
टी०—षोडश [सोलह] वर्ष पर्यन्त स्त्री बाला रहती है। तीस वर्ष
पर्यन्त स्त्री तरुणी रहती है। पचपन वर्ष पर्यन्त स्त्री प्रौढा रहती है।
इसके ऊपर स्त्री वृद्धा होती है ॥११॥
अथ नायिकावशीकरणविधिः—
फलमूलादिभिर्बाला तरुणी रतियोगतः ।
प्रेमदानादिभिः प्रौढा वृद्धा च दृढताडनात् ॥१२॥
टी०—फल मूल आदि भोज्यपदार्थों से बाला स्त्री प्रसन्न होती है।
रतिक्रीडा करने से तरुणी स्त्री प्रसन्न होती है। प्रेमादिक से प्रौढा स्त्री
प्रसन्न होती है। और अधिक ताड़न से वृद्धा स्त्री प्रसन्न होती है ॥१२॥
अथ नायिकागुणाः—
बाला तु प्राणदा प्रोक्ता तरुणी प्राणहारिणी ।
प्रौढा करोति वृद्धत्वं वृद्धा तु मरणं दिशेत् ॥१३॥
टी०—अब नायिका के गुण कहते हैं—बाला स्त्री प्राण देने वाली
कही गई है। तरुणी स्त्री प्राण हरने वाली कही गई है। प्रौढा स्त्री शरीर
शिथिल करने वाली कही गई है। वृद्धा स्त्री तो मरण देने वाली ही है ॥