रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
१. चतुर्विध नायिका-लक्षण (पद्मिनी, चित्रिणी, शङ्खिनी, हस्तिनी)
भाषाटीकासहिता ।
अथ नायिकाभेदाः—
बाला च तरुणी प्रौढा वृद्धा भवति नायिका ।
गुणयोगेन रन्तव्या नारी वश्या भवेत्तदा ॥१०॥
टी०—बाला, तरुणी, प्रौढा, वृद्धा—ये चार प्रकार की नायिका
(स्त्रियाँ) होती हैं। ये गुणयोग से रमण करने योग्य हैं। गुणयोग से
रमण करने ही से स्त्री वशीभूत होती है ॥१०॥
अथ नायिकालक्षणम्—
आषोडशाद्भवेद्बाला तरुणी त्रिंशता मता ।
पञ्चपञ्चाशता प्रौढा भवेद्वृद्धा ततः परम् ॥११॥
टी०—षोडश [सोलह] वर्ष पर्यन्त स्त्री बाला रहती है। तीस वर्ष
पर्यन्त स्त्री तरुणी रहती है। पचपन वर्ष पर्यन्त स्त्री प्रौढा रहती है।
इसके ऊपर स्त्री वृद्धा होती है ॥११॥
अथ नायिकावशीकरणविधिः—
फलमूलादिभिर्बाला तरुणी रतियोगतः ।
प्रेमदानादिभिः प्रौढा वृद्धा च दृढताडनात् ॥१२॥
टी०—फल मूल आदि भोज्यपदार्थों से बाला स्त्री प्रसन्न होती है।
रतिक्रीडा करने से तरुणी स्त्री प्रसन्न होती है। प्रेमादिक से प्रौढा स्त्री
प्रसन्न होती है। और अधिक ताड़न से वृद्धा स्त्री प्रसन्न होती है ॥१२॥
अथ नायिकागुणाः—
बाला तु प्राणदा प्रोक्ता तरुणी प्राणहारिणी ।
प्रौढा करोति वृद्धत्वं वृद्धा तु मरणं दिशेत् ॥१३॥
टी०—अब नायिका के गुण कहते हैं—बाला स्त्री प्राण देने वाली
कही गई है। तरुणी स्त्री प्राण हरने वाली कही गई है। प्रौढा स्त्री शरीर
शिथिल करने वाली कही गई है। वृद्धा स्त्री तो मरण देने वाली ही है ॥
६ रतिमञ्जरी-
अथ कामस्थानानि—
अङ्गुष्ठे चरणे च गुल्फनिलये जानुद्वये वस्तिके
नाभौ वक्षसि कक्षयोर्निगदिता कण्ठे कपोलेऽधरे ।
नेत्रे कर्णयुगे ललाटफलके मौलौ च वामभ्रुवा-
मूर्ध्वाधश्चलनक्रमेण कथिता चान्द्रीकला पक्षयोः ॥१४॥
टी०—अब स्त्रियों के किन २ स्थानों में काम रहता है सो कहते हैं—
( १ ) अङ्गुष्ठों में ( २ ) चरणों में ( ३ ) पैरके टिखने में ( ४ ) गोड़ों में
( ५ ) नाभि के नीचे मूत्राशय में ( ६ ) नाभि में ( ७ ) वक्षःस्थल में
( ८ ) काँखों में ( ९ ) कण्ठ में ( १० ) गाल में ( ११ ) नीचे के ओष्ठ में
( १२ ) नेत्र में ( १३ ) काम में ( १४ ) ललाट में ( १५ ) मस्तक में
काम रहता है, ( अर्थात् ) स्त्री के इन अङ्गों में शुक्लपक्ष में ऊर्ध्वक्रम से,
कृष्णपक्ष में अधःक्रम से, [चान्द्रीकला ( कामनिवासस्थान ) कामशास्त्रा-
चार्यों ने कहा है ॥ १४ ॥ अन्यच्च—
सीमन्ते नयनेऽधरे च गलके वक्षःस्थले चूचुके
नाभौ श्रोणितटे मनोभवगृहे जानौ च जङ्घातटे ।
गुल्फे पादतले तदङ्गुलितटेऽङ्गुष्ठे च तिष्ठत्यसौ
वृद्धिक्षीणतया समं शशिकला पक्षद्वये योषिताम्॥१५॥
टी०—( १ ) मस्तक के मध्य ( २ ) नेत्र ( ३ ) अधर ( ४ ) गला
( ५ ) वक्षःस्थल ( ६ ) स्तन ( ७ ) नाभि ( ८ ) कटि ( ९ ) योनि
( १० ) जानु ( घुटनो ) ( ११ ) जंघा ( १२ ) पैरके टिखने ( १३ ) पैर-
तले ( १४ ) पैर की अंगुली ( १५ ) पैर के अंगूठे, स्त्रियों के इन ( १६ )
अङ्गों में शुक्ल-कृष्ण दोनों पक्षों में चन्द्रकळा ( कामनिवासस्थान ) सम
( तुल्य ) है ॥ १५ ॥
शुक्लपक्षे वसेद्वामे पादाङ्गुलिकनिष्ठके ।
शुक्लप्रतिपदादौ च कृष्णे चाधः प्रलम्बते ॥ १६ ॥
भाषाटीकासहिता । ७
टी०—शुक्ल पक्ष में और शुक्ल पक्षकी प्रतिपत्तिथि में बाँएँ पैर की
कनिष्ठ अंगुली में काम वास करता है । कृष्ण पक्ष में बाएँ पैर की कनिष्ठ
अंगुली के नीचे भाग में काम वास करता है ॥ १६ ॥
पुंसः सव्ये स्त्रिया वामे शुक्ले कृष्णे विपर्ययः ।
एतानि कामस्थानानि ज्ञेयानि नागरैः सदा ॥१७॥
टी०—शुक्ल पक्ष में पुरुष के दक्षिण भाग स्त्री के वाम भाग में,
कृष्ण पक्ष में पुरुष के वाम भाग स्त्री के दक्षिण भाग में काम का वास-
स्थान है, यह रसिक जन जानें ॥ १७ ॥
अथ प्रबलवनितानिधुवनविधिः—
बलयुक्ता यदा नारी विपरीतरतिर्भवेत् ।
सञ्चाल्य तु कलास्थानं रन्तव्या कामिनी तदा ॥१८॥
टी०—जो स्त्री प्रबल (अर्थात् बलयुक्त) हो तब कला (काम)
स्थान को सञ्चालन कर पुरुष विपरीत रति हो अर्थात् स्त्री को अपने
ऊपर विराजमान करके रमण करे ॥ १८ ॥
अथ चुम्बनस्थानानि—
नेत्रे कण्ठे कपोले च हृदि पार्श्वद्वयेऽपि च ।
ग्रीवायां नाभिदेशे च कामी चुम्बति कामिनीम् ॥१९॥
टी०—कामी पुरुष कामिनी के नेत्र, कण्ठ, गाल, हृदय, पसवाड़,
गला, नाभि—इन स्थानों का चुम्बन करता है ॥१९॥
मुखे जंघे कपोले च जघने मदनालये ।
स्तनयुग्मे सदा प्रीतिः कामी चुम्बति कामिनीम् ॥२०॥
टी०—कामी पुरुष कामिनी के मुख, जङ्घा, कपोल, जघन (नाभि के
अधोदेश ), योनि, स्तन-इन स्थानों में प्रसन्न होकर सदा चुम्बन करता है ॥
प्रेम्णा स्त्रियं समालिङ्ग्य शीत्कारं मुखचुम्बनम् ।
कण्ठासक्तं पुनः कृत्वा गाढालिङ्गनमाचरेत् ॥२१॥
८ रतिमञ्जरी-
टी०-प्रेम से स्त्री का आलिङ्गन कर और शीत्कार पूर्वक मुख का
चुम्बन कर, फिर कण्ठ में लगाकर दृढ़ आलिङ्गन करै ॥२१॥
विधृत्य हस्तौ जघनोपविष्टः
शीत्कृत्य वक्त्रं च मुदा प्रचुम्ब्य ।
भगे च लिङ्गं स्तनमद्दर्दनञ्च
दत्वा च प्रेम्णा परमेच्च कामी ॥२२॥
टी०--कामी पुरुष स्त्री के जघन पर बैठकर, उसके दोनों हाथों को
पकड़कर, हर्ष से शीत्कार पूर्वक मुख का चुम्बन कर, योनि में लिङ्ग को
देकर, स्तनों का मर्दन करते हुए प्रेम से रमण करै ॥२२॥
केतक्यग्रनखां कृत्वा नखाँस्त्रीन् पञ्च चैव वा ।
पृष्ठे च जघने योनौ दत्वा कामी रमेत् स्त्रियम् ॥२३॥
टी०--कामी पुरुष केतकी (केवड़ा) पुष्प के सदृश नख करके,
तीन अथवा पाँचों नखों को पृष्ठ, जघन और योनि में देकर स्त्री से
रमण करै ॥ २३ ॥
नखरोमाञ्चितं कृत्वा दन्तेनाऽधरपीडनम् ।
ग्रीवामाकृष्य भगेन योनौ लिंगेन ताडनम् ॥२४॥
टी०-नखों में रोमाञ्च कर दाँत से अधर का पीडन कर, वेग से
गला को आकर्षण कर, योनि (भग) में लिङ्ग से ताडन करै ॥२४॥
लिङ्गप्रवेशनं कृत्वा धृत्वा गाढप्रयोगतः ।
पार्श्वद्वयञ्च सम्पीड्य सस्पृहं ताडयेद्भगम् ॥२५॥
टी०-योनि में लिङ्ग को स्थापितकर, अपने दोनों हाथों से जोर से
पकड़कर, दोनों पसवाड़ों को पीडनकर, यथेच्छ भग को ताडन करै ॥२५॥
समालिङ्ग्य स्त्रियं गाढं स्तनयुग्मे च मर्द्दनम् ।
योनिं नाभौ च सम्मर्द्य निष्ठुरं लिङ्गताडनम् ॥२६॥
भाषाटीकासहिता । ९
टी०--स्त्री को आलिङ्गन कर, फिर अधिक बाथ भरके दोनों स्तनों
को मर्दन करै । फिर नाभि की ओर योनि को मर्दन कर, उसमें दृढ
लिङ्ग ताडन करे ॥२६॥
केशं करेण संगृह्य दृढं सन्ताडयेद्भगम् ।
वदने चुम्बनं कृत्वा भगं हस्तेन मर्दयेत् ॥२७॥
टी०—केशों को हाथ से पकड़कर, योनि को दृढ़ ताडन करै । मुख
में चुम्बन कर योनि को हाथ से मर्दन करे ॥२७॥
अथ पद्मिनीरमणविधिः—
कुचं करेण सम्मर्द्य पीडयेदधरं दृढम् ।
रमणः पद्मबन्धेन पद्मिनीरतिमादिशेत् ॥२८॥
टी०—हाथ से कुचों को मर्दनकर अधर को दृढ़ पीड़न करै, फिर
रमण (स्वामी) कमलासन से पद्मिनी स्त्री से रति (भोग) करै ॥२८॥
अथ चित्रिणीरमणविधिः—
शीत्कारं चुम्बनं कृत्वा गले हस्ते च चुम्बनम् ।
कुचं हस्तेन सम्मर्द्य चित्रिणीरतिमादिशेत् ॥२९॥
टी०--शीत्कार पूर्वक चुम्बनकर फिर गला और हाथ का चुम्बन करै ।
पश्चात् हाथ से स्तनों को मर्दनकर चित्रिणी स्त्री के साथ रति (भोग) करै ॥
अथ शङ्खिनीरतिविधिः--
स्त्रीपुंसोस्तथान्योऽन्यं भगे लिंगे च चुम्बनम् ।
रमणं तु यथा गाढं शङ्खिनीरतिमादिशेत् ॥३०॥
टी०—परस्पर स्त्री पुरुष भग और लिङ्ग में चुम्बन करै (अर्थात्
स्त्री लिङ्ग में चुम्बन करै और पुरुष भग में चुम्बन करै, फिर दृढ़ रमण
(भोग) करै, यह शङ्खिनी स्त्री के साथ रति की विधि कही है ॥३०॥
अथ हस्तिनीरमणविधिः--
केशं करेण संगृह्य सुदृढं जालबन्धनम् ।