रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 13, कुल 18 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ रतिमञ्जरी-
बाला हो, भय रहित हो, बारह अङ्गुल का लिङ्ग वाला हो, निर्धन हो,
वह अश्व जाति का पुरुष कहा गया है ॥३८॥
अथाऽऽसनानि-
अतृप्ता रमणे नार्यो रमन्ते न यदा तदा ।
नानाबन्धैर्वक्ष्यमाणै रन्तव्याः कामिभिः स्त्रियः ॥३९॥
टी०-जब स्त्री स्वामी में अतृप्त होकर रमण न करै तब आगे कहे
जाने वाले अनेक आसनों द्वारा पुरुषों से स्त्री रमण करने योग्य है ॥३९॥
अथ षोडशासननामानि-
पद्मासनो नागपादो लतावेष्टोऽर्द्धसम्पुटः ।
कुलिशः सुन्दरश्चैव तथा केशरसंज्ञकः ॥४०॥
टी०-( १ ) पद्मा ( कमला ) सन । ( २ ) नागपाद ( ३ ) लतावेष्ट
( ४ ) अर्द्धसम्पुट ( ५ ) कुलिश ( ६ ) सुन्दर ( ७ ) केशर ॥४०॥
हिल्लोलो नरसिंहोऽपि विपरीतस्तथा परः ।
क्षुद्गारो धेनुकश्चैव उत्कण्ठश्च ततः परः ॥४१॥
टी०-(८) हिल्लोल (९) नृसिंह (१०) विपरीत (११) क्षुद्गार (१२)
धेनुक (१३) उत्कण्ठ ॥४१॥
सिंहासनो रतिर्नागो विद्याधरस्तु षोडश ॥४२॥
टी०-(१४) सिंहासन (१५) रतिनाग (१६) विद्याधर-ये षोडश
( सोळह ) आसन हैं ॥ ४२ ॥
अथ पद्मासनलक्षणम्-
हस्ताभ्यां च समालिङ्ग्य नारी पद्मासनोपरि ।
रमेद्गाढं समाकृष्य बन्धोऽयं पद्मसंज्ञकः ॥४३॥
टी०-पुरुष दोनों हाथों से स्त्री को आलिङ्गन कर दृढ़ बाथ भरकर
पद्मासन के ऊपर रमण करै, यह पद्मासन कहा है ॥४३॥