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सर्वकोश
रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)

रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)

Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary

कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished18 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

६ रतिमञ्जरी-
अथ कामस्थानानि—
अङ्गुष्ठे चरणे च गुल्फनिलये जानुद्वये वस्तिके
नाभौ वक्षसि कक्षयोर्निगदिता कण्ठे कपोलेऽधरे ।
नेत्रे कर्णयुगे ललाटफलके मौलौ च वामभ्रुवा-
मूर्ध्वाधश्चलनक्रमेण कथिता चान्द्रीकला पक्षयोः ॥१४॥
टी०—अब स्त्रियों के किन २ स्थानों में काम रहता है सो कहते हैं—
( १ ) अङ्गुष्ठों में ( २ ) चरणों में ( ३ ) पैरके टिखने में ( ४ ) गोड़ों में
( ५ ) नाभि के नीचे मूत्राशय में ( ६ ) नाभि में ( ७ ) वक्षःस्थल में
( ८ ) काँखों में ( ९ ) कण्ठ में ( १० ) गाल में ( ११ ) नीचे के ओष्ठ में
( १२ ) नेत्र में ( १३ ) काम में ( १४ ) ललाट में ( १५ ) मस्तक में
काम रहता है, ( अर्थात् ) स्त्री के इन अङ्गों में शुक्लपक्ष में ऊर्ध्वक्रम से,
कृष्णपक्ष में अधःक्रम से, [चान्द्रीकला ( कामनिवासस्थान ) कामशास्त्रा-
चार्यों ने कहा है ॥ १४ ॥ अन्यच्च—
सीमन्ते नयनेऽधरे च गलके वक्षःस्थले चूचुके
नाभौ श्रोणितटे मनोभवगृहे जानौ च जङ्घातटे ।
गुल्फे पादतले तदङ्गुलितटेऽङ्गुष्ठे च तिष्ठत्यसौ
वृद्धिक्षीणतया समं शशिकला पक्षद्वये योषिताम्॥१५॥
टी०—( १ ) मस्तक के मध्य ( २ ) नेत्र ( ३ ) अधर ( ४ ) गला
( ५ ) वक्षःस्थल ( ६ ) स्तन ( ७ ) नाभि ( ८ ) कटि ( ९ ) योनि
( १० ) जानु ( घुटनो ) ( ११ ) जंघा ( १२ ) पैरके टिखने ( १३ ) पैर-
तले ( १४ ) पैर की अंगुली ( १५ ) पैर के अंगूठे, स्त्रियों के इन ( १६ )
अङ्गों में शुक्ल-कृष्ण दोनों पक्षों में चन्द्रकळा ( कामनिवासस्थान ) सम
( तुल्य ) है ॥ १५ ॥
शुक्लपक्षे वसेद्वामे पादाङ्गुलिकनिष्ठके ।
शुक्लप्रतिपदादौ च कृष्णे चाधः प्रलम्बते ॥ १६ ॥