रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहिता । ११
( मोटा ) लिङ्ग को मुसल कहा है, दीर्घ ( लम्बा ) लिङ्ग को वंशकबीर
कहा है ॥ ३४ ॥
अथ पुरुषाणां जातिभेदे शशपुरुषलक्षणम्--
स्त्रीजितो गायकश्चैव नारीसत्यपरः सुखी ।
षडंगुलशरीरश्च स श्रीमान् शशको मतः ॥३५॥
टी०—जो पुरुष स्त्री के वशीभूत हो गान करने वाला हो, स्त्री में
सत्य बोलने वाला हो, सुखी हो, छः अङ्गुल का लिङ्ग वाला हो, धनवान्
हो, वह शशक कहा गया है ॥ ३५ ॥
अथ मृगपुरुषलक्षणम्—
श्रेष्ठस्तु धार्मिकः श्रीमान् सत्यवादी प्रियंवदः ।
अष्टांगुलशरीरश्च रूपयुक्तो मृगो मतः ॥३६॥
टी०—जो पुरुष श्रेष्ठ ( अच्छा ) हो, धर्मात्मा हो, धनवान् हो,
सत्य बोलने वाला हो, प्रिय बोलने वाला हो, आठ अङ्गुल का लिङ्ग वाला
हो, रूपवान् हो, वह मृग जाति का पुरुष कहा गया है ॥३६॥
अथ वृषपुरुषलक्षणम्--
उपकारपरो नित्यं स्त्रीजितः श्लेष्मलः सुखी ।
दशांगुलशरीरश्च मनस्वी वृषभो मतः ॥३७॥
टी०—जो पुरुष नित्य परोपकारी हो, स्त्री के वशीभूत हो, कफ
प्रकृति वाला हो, सुखी हो, दश अङ्गुल का लिङ्ग वाला हो, मनस्वी हो,
वह पुरुष वृषभ जाति का कहा गया है ॥३७॥
अथ हयपुरुषलक्षणम्--
काष्ठतुल्यवपुर्धृष्टो मिथ्यावाद्यश्च निर्भयः ।
द्वादशांगुललिङ्गश्च दरिद्रश्च हयो मतः ॥३८॥
टी०—काष्ठ के सदृश कठोर शरीर वाला हो, ढीठ हो, झूठ बोलने
श्लो० ३८—काष्ठेन तुल्यं वपुर्यस्य सः । मिथ्या वाक् यस्य सः । भयान्नि-
ष्क्रान्तो निर्भयः । द्वादशांगुलं लिङ्गं यस्य सः ।