रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ रतिमञ्जरी-
रतिसुन्दरासनलक्षणम्-
नारीपादद्वयं स्वामी धारयेदूर्ध्वदेशतः ।
कुचौ धृत्वा पिबेद्वक्त्रं बन्धोऽयं रतिसुन्दरः ॥४८॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के दोनों पगों को ऊपर रक्खै । स्तनों को
पकड़ कर मुख का चुम्बन करै, यह रतिसुन्दर नाम आसन है ॥ ४८ ॥
केशरासनलक्षणम्-
स्त्रिया जङ्घे समापीड्य दोर्भ्यां गात्रस्य मर्दनम् ।
पुनः प्रपीडयेद्योनिं बन्धः केसरसंज्ञकः ॥४९॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के दोनों जङ्घे को मर्दन कर और दोनों
हाथों से शरीर का मर्दन फिर योनि को लिङ्ग से ताडन करै यह
केसरासन कहा है ॥ ४९ ॥
अथ नृसिंहासनलक्षणम्-
पादौ सम्पीड्य योनौ च हठाल्लिङ्गप्रवेशनम् ।
हस्ताभ्यां वेष्टनं गाढं बन्धो नृसिंहसंज्ञकः ॥५०॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री की योनि का मर्दन कर हठ से योनि में
लिङ्ग प्रवेश कर दोनों हाथों से दृढ लिपट कर रमण करै यह नृसिंह
नाम आसन कहा है ॥ ५० ॥
अथ विपरीतासनलक्षणम्-
अंशावेकं पदं कृत्वा द्वितीयं कटिसंस्थितम् ।
नारीं च सुरमेत्कामी विपरीतासनं स्मृतम् ॥५१॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के एक पैर को अपने जङ्घे पर रख कर
दूसरे पैर को कमर के समीप कर नारी से अच्छी तरह रमण करै यह
विपरीतासन कहा गया है ॥ ५१ ॥
अथ क्षुद्रारासनलक्षणम्-
पार्श्वोपरि पदौ कृत्वा योनिं लिंगेन ताडयेत् ।