रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 18 में से
संदर्भ में पढ़ें१० रतिमञ्जरी-
भगं करेण सन्ताड्य हस्तिनीरतिमादिशेत् ॥३१॥
टी०--हाथ से केश को पकड़कर सुदृढ़ ( अच्छी तरह ) जालबन्ध
करै । फिर हाथ से योनि को मर्द्दन कर हस्तिनी स्त्री से रति ( भोग )
करै ॥ ३१ ॥
अथ भगलक्षणम्-
कूर्मपृष्ठं गजस्कन्धं पद्मगन्धि सुगन्धि यत् ।
अलोमकं सुविस्तीर्णं भगं पञ्चविधं वरम् ॥३२॥
टी०--(१) कछुवा की पीठ के सदृश (२) हाथी के स्कन्ध के सदृश
(३) कमलगन्ध के सदृश सुगन्धयुक्त (४) लोमरहित (५) सुन्दर विस्तृत-
ये पाँच प्रकार के भग ( योनि ) उत्तम हैं ॥३२॥
अथ भगदोषः—
शीतलं निम्नमत्युच्चं गोजिह्वासदृशं खरम् ।
इत्युक्तं कामशास्त्रज्ञैर्भगदोषचतुष्टयम् ॥३३॥
टी०-( १ ) शीतल ( ठण्डी ) ( २ ) गहिरी ( ३ ) अतिशय ऊँची
( ४ ) गौ की जीभ के सदृश कठोर—ये चार प्रकार भग के दोष काम-
शास्त्र को जानने वालों ने कहा है ॥३३॥
अथ लिङ्गलक्षणम्-
मुसलं वंशकवीरं द्विविधं लिङ्गलक्षणम् ।
स्थूलं मुसलमित्युक्तं दीर्घं वंशकवीरकम् ॥३४॥
टी०-मुसल और वंशकबीर ये दो प्रकार के लिङ्ग होते हैं । स्थूल
श्लो० ३१—जालेन बन्धनं जालबन्धनम् ( जालसदृशबन्धनमित्यर्थः ) ।
श्लो० ३२-कूर्मपृष्ठं कूर्मपृष्ठसदृशम् । गजस्कन्धं गजस्कन्धसदृशम् । पद्मगन्ध-
वत् सुगन्धयुक्तम् । न विद्यन्ते लोमानि यस्मिन् तत् ।
श्लोक० ३३—स्त्रिया जितः स्त्रीजितः । नार्यां सत्यपरो नारीसत्यपरः । षडङ्गुलं
शरीरं यस्य सः । श्रीरस्यास्तीति श्रीमान् ।