रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहिता । ७
टी०—शुक्ल पक्ष में और शुक्ल पक्षकी प्रतिपत्तिथि में बाँएँ पैर की
कनिष्ठ अंगुली में काम वास करता है । कृष्ण पक्ष में बाएँ पैर की कनिष्ठ
अंगुली के नीचे भाग में काम वास करता है ॥ १६ ॥
पुंसः सव्ये स्त्रिया वामे शुक्ले कृष्णे विपर्ययः ।
एतानि कामस्थानानि ज्ञेयानि नागरैः सदा ॥१७॥
टी०—शुक्ल पक्ष में पुरुष के दक्षिण भाग स्त्री के वाम भाग में,
कृष्ण पक्ष में पुरुष के वाम भाग स्त्री के दक्षिण भाग में काम का वास-
स्थान है, यह रसिक जन जानें ॥ १७ ॥
अथ प्रबलवनितानिधुवनविधिः—
बलयुक्ता यदा नारी विपरीतरतिर्भवेत् ।
सञ्चाल्य तु कलास्थानं रन्तव्या कामिनी तदा ॥१८॥
टी०—जो स्त्री प्रबल (अर्थात् बलयुक्त) हो तब कला (काम)
स्थान को सञ्चालन कर पुरुष विपरीत रति हो अर्थात् स्त्री को अपने
ऊपर विराजमान करके रमण करे ॥ १८ ॥
अथ चुम्बनस्थानानि—
नेत्रे कण्ठे कपोले च हृदि पार्श्वद्वयेऽपि च ।
ग्रीवायां नाभिदेशे च कामी चुम्बति कामिनीम् ॥१९॥
टी०—कामी पुरुष कामिनी के नेत्र, कण्ठ, गाल, हृदय, पसवाड़,
गला, नाभि—इन स्थानों का चुम्बन करता है ॥१९॥
मुखे जंघे कपोले च जघने मदनालये ।
स्तनयुग्मे सदा प्रीतिः कामी चुम्बति कामिनीम् ॥२०॥
टी०—कामी पुरुष कामिनी के मुख, जङ्घा, कपोल, जघन (नाभि के
अधोदेश ), योनि, स्तन-इन स्थानों में प्रसन्न होकर सदा चुम्बन करता है ॥
प्रेम्णा स्त्रियं समालिङ्ग्य शीत्कारं मुखचुम्बनम् ।
कण्ठासक्तं पुनः कृत्वा गाढालिङ्गनमाचरेत् ॥२१॥