रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)
Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary
कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ रतिमञ्जरी-
टी०-प्रेम से स्त्री का आलिङ्गन कर और शीत्कार पूर्वक मुख का
चुम्बन कर, फिर कण्ठ में लगाकर दृढ़ आलिङ्गन करै ॥२१॥
विधृत्य हस्तौ जघनोपविष्टः
शीत्कृत्य वक्त्रं च मुदा प्रचुम्ब्य ।
भगे च लिङ्गं स्तनमद्दर्दनञ्च
दत्वा च प्रेम्णा परमेच्च कामी ॥२२॥
टी०--कामी पुरुष स्त्री के जघन पर बैठकर, उसके दोनों हाथों को
पकड़कर, हर्ष से शीत्कार पूर्वक मुख का चुम्बन कर, योनि में लिङ्ग को
देकर, स्तनों का मर्दन करते हुए प्रेम से रमण करै ॥२२॥
केतक्यग्रनखां कृत्वा नखाँस्त्रीन् पञ्च चैव वा ।
पृष्ठे च जघने योनौ दत्वा कामी रमेत् स्त्रियम् ॥२३॥
टी०--कामी पुरुष केतकी (केवड़ा) पुष्प के सदृश नख करके,
तीन अथवा पाँचों नखों को पृष्ठ, जघन और योनि में देकर स्त्री से
रमण करै ॥ २३ ॥
नखरोमाञ्चितं कृत्वा दन्तेनाऽधरपीडनम् ।
ग्रीवामाकृष्य भगेन योनौ लिंगेन ताडनम् ॥२४॥
टी०-नखों में रोमाञ्च कर दाँत से अधर का पीडन कर, वेग से
गला को आकर्षण कर, योनि (भग) में लिङ्ग से ताडन करै ॥२४॥
लिङ्गप्रवेशनं कृत्वा धृत्वा गाढप्रयोगतः ।
पार्श्वद्वयञ्च सम्पीड्य सस्पृहं ताडयेद्भगम् ॥२५॥
टी०-योनि में लिङ्ग को स्थापितकर, अपने दोनों हाथों से जोर से
पकड़कर, दोनों पसवाड़ों को पीडनकर, यथेच्छ भग को ताडन करै ॥२५॥
समालिङ्ग्य स्त्रियं गाढं स्तनयुग्मे च मर्द्दनम् ।
योनिं नाभौ च सम्मर्द्य निष्ठुरं लिङ्गताडनम् ॥२६॥