रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
६४ रसिकप्रिया
निर्वाह हो सके और जिसका कहीं किसी को कुछ पता भी न चल सके । (आपने
मेरे प्रेम के कारण जो ) आसन, वस्त्र, सुगंध और गहने छोड़ दिए हैं, यहाँ
तक तो किसी प्रकार बात बनी है पर आप जो मेरे (खिलाए ) बिना पान
नहीं खाते, हे कन्हैया यह आप मेरे साथ प्रीति कर रहे हैं या वैर ? क्योंकि
सखियाँ मेरी खिल्ली उड़ाती हैं जिससे मुझे क्लेश होता है ) ।
सूचना — इस सवैये में नायक के अनुकूलत्व वस्तु से लेशालंकार व्यंग्य है ।
(३३) अथ प्रकाश अनुकूल, यथा — ( सवैया )
केसव सूधे बिलोचन सूधी बिलोकनि कों अवलोकें सदाई ।
सूधियै बात सुनें समुझें कहि आवति सूधियै बात सुहाई ।
सूधी सी हाँसी सुधा निधि सो मुख सोधि लई बसुधा की सुधाई ।
सूधे सुभाइ सबै सजनी बस कैसैं किये अति टेढ़े कन्हाई ।५।
शब्दार्थ -- बिलोचन = ( द्विलोचन ) दोनों नेत्र । बिलोकनि = दृष्टि,
नजर । सदाई = सदैव । सुधानिधि = चंद्रमा, श्लेष से सिधाई ( सुधाई ) का
भांडार, अत्यंत सीधा । सोधि लई = खोज कर एकत्र कर ली । बसुधा =
पृथ्वी । सुधाई = सीधापन; अमृतत्व ।
भावार्थ — ( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, तेरे नेत्र सीधे हैं
और तू सीधी नजर से सदा देखती भी है । तू सीधी ही बात सुनती-समझती
है और सदैव सीधी ही बात कहती भी है । तेरी हँसी भी सीधी है और तेरा
मुख भी सुधाकर के समान है । तूने वसुधा का साग सुधातव (अमृतत्व और
स धापन) ढूँढ़-ढूँढ़कर एकत्र कर लिया है । इस प्रकार सब तरह के सीधे
स्वभाव की होकर तूने अत्यंत टेढ़े श्रीकृष्ण को कैसे अपने वश में कर लिया ?
अलंकार — श्रीकृष्ण जो सबसे टेढ़े रहते हैं वे नायिका के वश में हैं, यही
अनुकूलता है । नायक को वश में कर लेने की बात सब लोग जान गए इससे
'प्रकाश अनुकूल' है ।
(३४) अन्यच्च (सवैया)
मेरे तो नाहिन चंचल लोचन नाहिन केसव बानी सुधाई ।
जानौं न भूषन-भेद के भावनि भूलिहू मैं नहिं भौंह चढ़ाई ।
भोरेहूँ ना चितयो हरि ओर त्यों घूँरु करूँ इहिं भाँति लुगाई ।
रंचक तौ चतुराई न चित्तहि कान्ह भए बस काहे तें माई ।६।
शब्दार्थ - बानी (वाणी) = बोली । सुधाई = अमृत की भाँति, मीठी ।
५-कों-सों । सुधानिधि सो-सुधाकर से। सुभाइ-स्वभाव ।
६-नाहिन-नाहिनैं। बानी०-बानि सुहाई। भावनि०-भाव के भेदनि ।
मैं नहिं-नेनहिं; नैनन । चतुराई०-चतुराइ चित्त न । काहे०-कासु कें ।
५ द्वितीय प्रभाव ६५
भूषण-भेद के भाव = सोलहो शृंगार करके पति को रिझाना। भोरहूँ = भूलकर
भी । घेरु = बदनामी । लुगाई = स्त्रियाँ । रंचक = किंचित्, थोड़ी । माई =
हे सखी (स्त्रियों का संबोधन) ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति सखी प्रति) हे सखी, न तो मेरे नेत्र ही
चंचल हैं और न मेरी वाणी ही मनोहर है। न तो मैं सोलहो शृंगार करके
पति को रिझाने का ढंग ही जानती हूँ और न मैंने उन्हें रिझाने के लिए
कभी भौंहें ही चढ़ाई हैं (तिरछी नजर की है)। इसी प्रकार मैंने भूलकर भी
कृष्ण की ओर वैसे नही देखा जैसी ये स्त्रियाँ मेरी बदनामी कर रही हैं। मेरे
चित्त में (पति को वश में करनेवाली) चतुरता भी किञ्चिन्मात्र नहीं, पर न
जाने श्रीकृष्ण मेरे वश में कैसे हो गए !
अलंकार—प्रथम विभावना ।
सूचना—इस सवैये में 'भोरेहूँ ना चितयो' (भूलकर भी दृष्टिपात नहीं
किया) को लेकर शंका की जाती है कि नायिका ने जब श्रीकृष्ण की ओर देखा
ही नहीं तो उसमें स्वकीयत्व कहाँ रहा । पर 'त्यों' शब्द से नायिका का लक्ष्य
'घेरु' की अतिशयता की ओर है। इससे उक्त शंका का परिहार हो जाता है।
( ३५ ) अथ दक्षिण-लच्छन—(दोहा)
पहिले सो हिय हेतु डर, सहज बड़ाई कानि ।
चित्त चलैहूँ ना चलै, दच्छिन-लच्छन जानि । ७ ।
शब्दार्थ—पहिलो सो = पहले का सा ही । हेतु = प्रेम । सहज =
स्वाभाविक । कानि = मर्यादा ।
भावार्थ—दूसरी प्रेमिकाओं का प्रिय हो जाने पर भी जो पूर्व की प्रेमिका
से पहले का सा ही प्रेम करे और डरता रहे, स्वभाव से ही जिसमें बड़प्पन
की मर्यादा है और चित्त चलने पर भी जो अपने को संभालता है, वह
दक्षिण नायक है ।
( ३६ ) अथ प्रच्छन्न दक्षिण, यथा—(कबित्त)
हरि से हितू सों भ्रम भूलिहू न कीजै मान,
हातो कियें हियहूँ तें होति हित हानियै ।
लोक में अलोक आनि नीकेहूँ कों लागतु है,
सीताजू कों दूत-गोत कैसे उर आनियै ।
आँखिनि जो देखियति सोई साँची केसवदास,
काननि की सुनी साँची कबहुँ न मानियै ।
७—पहिलो सो-पहिली सों । बड़ाई-बढ़ाई । ८—भ्रम-भ्रमि । मान-
मन । कियें-करि । नीकेहूँ-नीके हौ; नीकहू । को लागतु-लगावत । गोत-
गोता । केसोदास-केसौराइ । को न-कहा ।
६६ रसिकप्रिया
गोकुल की कुलटा ये यौं हीं उलटावति हैं,
आजु लौं तौ वैसेई हैं कालि की न जानियै ।८।
शब्दार्थ—हातो कियें = दूर करने से । अलोक = निंदा, कलंक ।
नीकेहूँ = भले को भी । गीत = कथित वृत्तांत । दूत-गीत = (बहुव्रीहि) दूत
का कहा (धोबी ने सीताजी पर अपयश लगाया था जिसे ‘दुर्मुख’ नामक
दूत ने राम को सुनाया था) । कैसे उर आनियै = कैसे विश्वास किया जाय ।
कुलटा = व्यभिचारिणी । उलटावति हैं = उलटा-पलटा करती रहती हैं, कुछ
का कुछ कह देती हैं ।
भावार्थ—(अंतरंग सखी की उक्ति नायिका से) तू श्रीकृष्ण सरीखे प्रेमी
के संबंध में भ्रम भूलकर भी मत कर । यदि तू उन्हें अपने हृदय से दूर करती
है तो भी प्रेम की हानि होती है । संसार में लोग भले को भी अपयश लगा
देते हैं । भला दूत ने सीताजी के संबंध में जो (कलंकवाली धोबी की) बात
कही थी उस पर कैसे विश्वास किया जा सकता है ? जो आँखों से देखी जाय
उसी को सत्य मानना चाहिए । कान से सुनी (बात) को कभी सत्य न समझना
चाहिए । ये गोकुल की कुलटाएँ इसी प्रकार बातें पलट दिया करती हैं ।
आज तक तो कृष्ण पूर्ववत् ही (निरपराध) हैं, कल की कौन (राम) जाने ।
अलंकार—काव्यलिंग, दृष्टांत ।
( ३७ ) अथ प्रकाश दक्षिण, यथा—( सवैया )
चित चोप चितैबे की तैसियै है अरु तैसियै भाँति डरात घनै ।
अरु तैसोई कोमल बोल गुपाल के मोहत हैं तिहिं भाँति मनै ।
गुन तैसोई, हास-बिलास सबै हुते तैसोई केसव कौन गनै ।
सखि तू कहै आन बधू के अधीन हैं सो परतीक किधौं सपनै । ६ ।
शब्दार्थ—चोप = चाव, इच्छा । घनै = अत्यंत । मनै = मन को ।
हुते = थे । आन = ( अन्य ) दूसरी । बधू = स्त्री । परतीक = ( प्रत्यक् )
प्रत्यक्ष, वास्तव में । सपनै = स्वप्न अर्थात् झूठ ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति बहिरंग सखी से ) हे सखी, श्रीकृष्ण में
पहले ही जैसा मुझे देखने का चित्त में चाव है और वैसे ही वे मुझसे अब भी
अत्यंत डरा करते हैं । उनकी वाणी भी वैसी ही (पूर्ववत्) कोमल है और वे
वैसे ही मेरे मन को मोहते भी हैं । उनमें वैसे ही गुण अब भी हैं और वैसे
ही (पहले के से) सब हास-विलास भी वर्तमान हैं। इन सब (बातों) को
कौन गिनाए । इसलिए तू जो यह कह रही है कि वे अब दूसरी स्त्री के वश
में हो गए हैं, यह प्रत्यक्ष सत्य है अथवा स्वप्न (झूठ) है । ( मुझे विश्वास
१—परतीक-परतीत ।
द्वितीय प्रभाव ६७
नहीं होता कि श्रीकृष्ण ने किसी दूसरी स्त्री से प्रेम कर लिया है) ।
(३८) बहि-अंतर गूढ़-अगूढ़ निरंतर कामकला कुल कौन गनै ।
कहि केसव हास-बिलास सबै प्रतिद्यौस बढ़ें रसरीति सनै ।
जिनको जिय मेरेई जीव जियै सखि काय मनो बच प्रीति घनै ।
तिनकों कहैं आन बधू के अधीन हैं सो परतीक किधौं सपने ।१०।
शब्दार्थ—बहि = बहिः, बाहर । अंतर = भीतर ।
सूचना—सरदार इस सवैये को केशव का नहीं मानते ।
(३६) अथ शठ-लक्षण— (दोहा)
मुँह मीठी बातैं कहै, निपट कपट जिय जानि ।
जाहिन डरु अपराध को, सठ करि ताहि बखानि ।११।
शब्दार्थ—निपट = अत्यंत । जानि = जानो । सठ करि = 'शठ' नाम
से । बखानि = बखानो, कहो ।
(४०) अथ प्रच्छन्न शठ, यथा—(सवैया)
रुचि पंकज चंदन बंदन कंचन रंच न रोचनहू की बची ।
कहिये किहिं कारन को इते लायक का पर भामिनि भौंह नची ।
अनुमानत हौं अँखियाँ लखि लाल ये नाहिंनै राति के रोष रची ।
तन तेरे बियोग तप्यो तरुनी तिहिं मानहुँ मो हिय माँह तची ।१२।
शब्दार्थ—रुचि = छवि, शोभा । पंकज = ( यहाँ पर ) लाल कमल ।
चंदन = लाल चंदन । बंदन = सिंदूर । कंचन = सोना । रंच = थोड़ा ।
रोचन = रोली । कों इते लायक = इस योग्य कौन है, इसका पात्र कौन है ।
भामिनी = स्त्री (संबोधन में) । भौंह नची = भौंह चढ़ाई है । तची = तप्त हुई ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति मानिनी नायिका से ) तुम्हारे नेत्रों के
द्वारा लाल कमल, रक्त चंदन, सिंदूर, सोना और रोली की शोभा कुछ भी
बच न सकी ( उन्हीं की भाँति ये लाल हैं ) । इसका क्या कारण हैं ? कौन
इस ( क्रोध ) के योग्य है जिस पर तुमने भौंहें चढ़ाई हैं ? तुम्हारी लाल
आँखें देखकर अनुमान करता हूँ कि ये ( मेरी अनुपस्थिति के कारण ) रात
में किए गए रोष से लाल नहीं हैं । प्रत्युत मेरा शरीर ( रात में ) तुम्हारे
वियोग में तप रहा था इसी कारण मानो तुम्हारी आँखें मेरे हृदय ( की
वियोगाग्नि ) से तपकर लाल हो गई हैं । ( क्योंकि तुम मेरे हृदय में निवास
करती हो ) ।
अलंकार—सापह्नव हेतूत्प्रेक्षा ।
१०— तिनकों-तिनसौं । १२— रंचन-चंपक । बची-रची । अनुमानत-
नमडानत ।
६८ रसिकप्रिया
अथ प्रकाश शठ, यथा—( कवित्त )
(४१) काननि के रँगे रंग नैननि के डोलो संग,
नासा-अंग रसना के रसहीं समाने हौ ।
और गूढ़ कहा कहौँ मूढ़ हौ जू ? जानि जाहु,
प्रौढ़िरूढ़ केसवदास नीके करि जाने हौ ।
तन आन, मन आन, कपट-निधान कान्ह,
साँची कहौ मेरी आन काहे कौं डराने हौ ।
वे तो हैं बिकानी हाथ मेरें, हौं तिहारें हाथ,
तुम ब्रजनाथ हाथ कौन के बिकाने हौ ? ।१३।
शब्दार्थ—काननि के रँगे रंग = कानों के रंग में रँगे हुए हो अर्थात्
जिसकी प्रशंसा अपने कानों से सुनते हो उसी को देखने के लिए उतावले हो
जाते हो । नासा-अंग = नासिका के अंग में । नासा० = नासिका के अंग में या
रसना के रस में ही डूबे रहते हो । नासिका जिस नायिका की गंध की ओर
खींचती है उधर को जाते हो । जीभ जो कहने को कहती है वही कहते हो ।
गूढ़ = भेद की बात । प्रौढ़ि = ढिठाई । रूढ़ = विचार में दृढ़ । नीकें करि = भली
भाँति । आन = ( अन्य ) दूसरी बात । निधान = खजाना । आन = सौगंध,
कसम । हौं = मैं ।
भावार्थ— ( बहिरंग सखी की उक्ति नायक से ) तुम कानों के रंग में
रँगे हुए हो ( कान से जिसकी प्रशंसा सुन पाते हो उसी को देखने के लिए
उत्सुक हो जाते हो ) । तुम अपने नेत्रों के संग-संग घूमते फिरते हो ( नेत्र
जिसके रूप पर मुग्ध होते हैं, उसे देखने के लिए नेत्रों के इशारे पर घूमते
रहते हो ) । यही नहीं, नासिका जिस गंध की ओर ले जाती है उधर ही
जाते हो, जीभ जो कहलाती है वही कहते हो (नाक में जिस किसी की सुगंध
पहुँचती है, वाणी द्वारा उसी से बात करने के लिए उत्कंठित हो उठते हो)।
अधिक गूढ़ बातें और क्या कहूँ तुम नादान तो हो नहीं ( कि समझाने की
आवश्यकता पड़े, बस इतने से ही ) समझ लो कि तुम ढिठाई के रंग-ढंग में
निपुण हो और इसे लोग भली भाँति जानते भी हैं । तुम्हारे शरीर (मुख)
में कुछ और मन में कुछ (और बात) रहा करती है । कृष्ण, तुम बड़े कपटी
हो । तुमको मेरी सौगंध है, सच बताओ तुम क्यों डर रहे हो ? वे (नायिका)
तो मेरे हाथ बिकी हैं (मेरे वश में हैं) और मैं तुम्हारे हाथ बिकी हूँ (तुम्हारे
इच्छानुकूल कार्य करने को तत्पर रहती हूँ ) । पर यह तो बताओ कि हे
१३—काननि०-कान रंग रँगे नैन तिनही के डोलें संग । सयाने-सों
साने । प्रौढ़िरूढ़-प्रौढ़ि रूढ़ि ।
द्वितीय प्रभाव ६६
ब्रजनाथ, तुम किसके हाथ बिके हो ? ( तुमने किस दूसरी नायिका से प्रेम
कर लिया है ? ) ।
अलंकार - एकावली ( चतुर्थ चरण में ) ।
सूचना - 'प्रौढ़िरूढ़' शब्द का प्रयोग अभी तक केवल केशव की ही
कविता में मिला है। इसका प्रयोग 'रामचंद्रचंद्रिका' में भी किया गया है -
प्रौढ़िरूढ़िकोस मूढ़ गूढ़ गेह में गयौ । - रामचंद्रचंद्रिका ( १६।२४ ) ।
अथ धृष्ट-लक्षण - ( दोहा )
(४२) लाज न गारिहु मार की, छाँडि दई सब त्रास ।
देख्यौ दोष न मानही, धृष्ट सु कहिये तास ।१४।
शब्दार्थ - लाज ० = गाली पाने और मार खाने की भी लज्जा नहीं है ।
त्रास = डर । देख्यौ ० = दोष करते हुए पाए जाने पर भी अपने दोष को
स्वीकार नहीं करता ।
अथ प्रच्छन्न धृष्ट, यथा - (दोहा)
(४३) नेह-भरे लै लै भाजत भाजन कौन गनै दधि दूध मठाए ।
गारि दिये तें हँसैं बरजें घर आवत हैं जनु बोलि पठाए ।
लाज की और कहा कहौं केसव जे सुनिये ते सबै गुन ठाए ।
मामी पियै इनकी मेरी माइ को हैं हरि आठहुँ गाँठ अठाए ।१५।
शब्दार्थ - नेह = स्नेह अर्थात् मक्खन, घी आदि । भाजन = पात्र ।
मठाए = मट्ठे वाले ( भाजन ) । बरजें = मना करने पर भी । बोलि पठाए =
बुला भेजे गए । जे सुनिये ते = जो गुण सुने जाते थे वे सब । ठाए = हैं ।
मामी पीना = (मुहावरा) जिम्मेदारी के साथ इनकार करना, मुकर जाना ।
मामी = पानी (किसी कार्य के संबंध में पवित्र पानी को हाथ में लेना या पीना
उस कार्य के अस्वीकार के लिए प्रमाण होता है) । आठहुँ गाँठ = सब प्रकार
से ( आगे छंद १६ में आठ गांठों का उल्लेख है । ), भली भाँति । अठाए =
शरारती । आठ गाँठ अठाई = छँटा हुआ धूर्त ।
भावार्थ - ( नायिका की उक्ति अंतरंग सखी से ) कृष्ण मेरे मक्खन,
घी आदि से भरे बर्तन ले लेकर भाग जाते हैं, दही, दूध और मट्ठे के बर्तनों
की तो गिनती ही नहीं । वे गाली देने पर हँसते हैं और मना करने पर भी
घर में इस प्रकार आते हैं, मानो बुला भेजे गए हों। लाज की और बातें क्या
कहूँ, इनके जितने गुण (अवगुण) सुने जाते थे वे सबके सब इनमें हैं। हे सखी,
१४-मानही-मानई । कहिये ०-केसवदास । १५- मठाए-मिठाए । ते
सबै ०-गुन ते सब ठाए । मामी-मीमी । अठाए-हठाए ।
७० रसिकप्रिया
इनकी शरारत के लिए कहाँ तक इनकार किया जा सकता है ये तो सब
प्रकार से छँटे हुए उपद्रवी हैं ।
अलंकार—लोकोक्ति (चतुर्थ चरण में) ।
अथ प्रकाश धृष्ट-लक्षण—(दोहा)
(४४) मनसा बाचा कर्मना, बिहँसनि चितवनि लेखि ।
चलनि चातुरी आतुरी, आठौ गाँठ बिसेषि ।१६।
शब्दार्थ—लेखि = लेखो, समझो । चलनि = चाल ।
अथ प्रकाश, धृष्ट यथा—(सवैया)
(४५) सौंह को सोचु सकोचु न पाँच को डोलत साहु भए करि चोरी ।
बैननि बंचकताई रची रति नैनन के सँग डोलत डोरी ।
लाज करै न डरै हित-हानि तें आनि अरे जिय जानिकै भोरी ।
नाहिनै केसव साख जिन्हैं बकिकै तिनसों दुखवै मुख को री ।१७।
शब्दार्थ—सौंह = सौगंध । पाँच = पंच । साहु = (साधु) सच्चे, ईमान-
दार । बैन = (वचन) वाणी । बंचकताई = धूर्तता । रति = प्रीति, अनुराग ।
डोरी = डोरियाई हुई, संग लगी हुई । आनि = आकर । अरे = अड़ गए ।
जिय जानि कै भोरी = यह जानकर कि भोली भाली हूँ (मूर्ख हूँ) । साख =
प्रमाण, एतबार । बकिकै = बकवाद करके । दुखवै = पीड़ित करे, कष्ट दे ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति बहिरंग सखी से) हे सखी, श्रीकृष्ण को
न तो सौगंध की ही परवा है और न पंच का ही कोई संकोच है । वे चोरी
करके भी साह बने फिरते हैं (दूसरी स्त्री के साथ प्रेम करके भी अपने को
निर्दोष बतलाते हैं) । उनकी बातों में धूर्तता भरी है और अनुराग नेत्रों के
साथ डोलता है (उनके नेत्रों में दूसरी स्त्रियों की प्रीति समाई हुई है) उन्हें
न तो लज्जा ही आती है न वे अपने हित की हानि से ही डरते हैं । वे मुझे
भोली भाली समझकर यहाँ पर आ डटे हैं । जिनकी बातों का कोई एतबार
नहीं उनके साथ बकवाद करके अपने मुख को कौन पीड़ा दे (उनसे बात भी
नहीं करना चाहती) ।
अलंकार—विशेषोक्ति (प्रथम चरण में) ।
(दोहा)
(४६) बरने कबि-नायक सबै, नायक इहि अनुसार ।
सब-गुन-लायक नायिका, सुनि अब बहुत प्रकार ।१८।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां
चतुर्विधनायकप्रच्छन्नप्रकाशवर्णनं नामद्वितीयः प्रभावः ।२।
१७—डोलति—डोरति । जानिकै—जानि कि । कै तिन—ऐसेनि ।
१८—बरने—बरनेहूँ ।
तृतीय प्रभाव ७१
तृतीय प्रभाव
अथ नायिका-जाति-वर्णन—( दोहा )
( ४७ ) प्रथम पद्मिनी चित्रिनी, जुवती जाति प्रमान ।
बहुरि संखिनी हस्तिनी, केसवदास बखान ।१।
अथ पद्मिनी-लक्षण—( दोहा )
( ४८ ) सहज सुगंध सरूप सुभ, पुन्यप्रेम सुखदानि ।
तनु तनु भोजन रोष रति, निद्रा मान बखानि ।२।
शब्दार्थ—सहज = स्वाभाविक । पुन्यप्रेम = पवित्र प्रेम । सुखदानि =
सुखदायक । तनु = दुबला, थोड़ा, सूक्ष्म । तनु = शरीर ।
( ४६ ) सलज सुबुद्धि उदार मृदु, हास बास सुचि अंग ।
अमल अलोम अनंग-भुव, पद्मिनी हाटक-रंग ।३।
शब्दार्थ—सलज = लज्जावती । वास=वस्त्र । अलोम=लोमरहित ।
अनंगभुव=काम-क्रीड़ा की भूमि । हाटक-रंग = सुवर्ण ।
पद्मिनी, यथा—( कवित्त )
( ५० ) हँसत कहत बात फूल से झरत जात,
गूढ़ भूरि हाव-भाव कोक की सी कारिका ।
पन्नगी नगी-कुमारि आसुरी सुरी निहारि,
डारौं वारि किन्नरी नरी गँवारि नारिका ।
तापै हौं कहा है जाउँ बलि जाउँ केसौदास,
रची बिधि एक ब्रजलोचन की तारिका ।
भौर से भँवत अभिलाष लाख भाँति दिब्य,
चंपे की सी कली बृषभान की कुमारिका ।४।
शब्दार्थ—भूरि = बहुत । कोक = कोकशास्त्र के रचयिता कोकदेव ।
की सी = समान । कारिका = ( कोकशास्त्र के ) नियमों के श्लोक । गूढ़० =
गूढ़ हाव-भावों के निमित्त कोक की कारिका के समान है ( कोक के सूत्रों में
जिन हाव-भावों का वर्णन है उनका मूर्तिमान् रूप है ) । पन्नगी = सर्पिणी ।
१—केसव०—केसवराइ सुजान । ३ — सलज-सहज । भुव-भू । ४—
डारौं०-वारि डारौं, डारौं नारि । गँवारि-गमारि । केसौ०-केसोराइ ।
भँवत-भ्रमत ।
७२ रसिकप्रिया
नगी-कुमारि = पर्वत-कन्या । नरी = मानवी । नरी० = गँवार मानवी स्त्रियाँ
उसके सामने क्या हैं (कुछ नहीं) । तापै हौं कहा ह्वै जाऊँ = उस पर मैं
और क्या हो जाऊँ (सिवा निछावर होने के) । बिधि = ब्रह्मा । ब्रजलोचन
की तारिका = ब्रजवासियों के नेत्रों की पुतली । वृषभान = राधिका के पिता ।
उक्ति—सखी द्वारा रूपवर्णन ।
अलंकार—उपमा ।
सूचना—चंपे के पास भौरों के घूमने का भाव यह है कि जिस प्रकार
भौंरा चंपे के चारो ओर मँडराया करता है उसपर बैठ नहीं सकता उसी प्रकार
राधिकाजी के लाखों अभिलाष होते रहते हैं ।
व्याकरण—'अभिलाष' शब्द पुंलिंग है ।
अथ चित्रिणी-लक्षण—(दोहा)
(५१) नृत्य गीत कबिता रुचै, अचल चित्त चल दृष्टि ।
बहिरति रति अति सुरत-जल, मुख सुगंध की सृष्टि ॥५॥
शब्दार्थ—बहिरति = बर्हिरति, बाहरी रति (आलिंगन, चुंबन, स्पर्श,
मर्दन, नखदान, रददान, अधरपान) । रति = प्रेम । सुरत-जल = काम-
सलिल, स्मरजल ।
(५२) बिरल लोम तन मदन-गृह, भावत सकल सुबास ।
मित्र-चित्र-प्रिय चित्रिनी, जानहु कैसोदास ॥६॥
चित्रिणी, यथा—(सवैया)
(५३) बोलिबो, बोलनि को सुनिबो, अवलोकनि कै अवलोकनि जोते ।
नाचिबो गाइबो बीन बजाइबो रीझि रिझाइ कों जानति तोते ।
राग बिरागनि के परिरंभन हास बिलासनि तें रति कोते ।
तौ मिलतौ हरि मित्रहि कों सखि ऐसे चरित्र जौ चित्र में होते ॥७॥
शब्दार्थ—अवलोकनि = चितवन । जोते = (जोवते) हम देखते ।
तोते = तुझसे । राग = प्रेम, अनुराग । बिराग = मान, उदासीनता । परि-
रंभन = आलिंगन । रति कोते = प्रेम बढ़ाते ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) हे सखी, स्वयम् बोलना और
दूसरों की बोली सुनना, स्वयम् देखना और देखकर दूसरे की चितवन देखना
नाचना, गाना, बाँसुरी बजाना, रीझना, दूसरों को रिझाना (जिस प्रकार
श्रीकृष्ण का तुझसे जानती समझती हूँ, उसी प्रकार इस चित्र का भी तुझसे
जानती समझती) । (अनुकूल रहने पर) प्रेमपूर्वक स्वयम् रूठने पर विराग-
भरा, उदासीनतायुक्त आलिंगन तथा हास-विलास से प्रेम का संवर्धन भी उसी
प्रकार यह करता जिस प्रकार श्रीकृष्ण करते हैं । यदि इस चित्र में ये सब
५—बहिरति-बिहरत । रति-रत । मुख-मधु ।
७४ रसिकप्रिया
अलंकार — अन्योक्ति और रूपकातिशयोक्ति ।
सूचना — सपत्नी के यहाँ से लौटकर आनेवाले नायक पर नायिका रुष्ट
हो रही है । यहाँ कदली से अभिप्राय नायिका की जंघाओं से है, बदरी सपत्नी
के 'टीले रोम हैं, चंपकली की स्थली नायिका की नासिका है, मलिन नलिनी
मुख है, नाग-लवंग आदि उसके मुख की बास है, छुहारा और दाख अधर-
रस ह, ऊँटकटारा सपत्नी के शरीर की तीखी गंध है ।
अथ हस्तिनी-लक्षण— ( दोहा )
(५७) थूल अंगुरी चरन मुख, अधर भृकुटि कटि बोल ।
मदन-सदन, रद कंधरा, मंद चालि चित लोल ।११।
शब्दार्थ— थल = मोटी । 'थूल' का अन्वय 'अंगुरी' से 'बोल' तक है ।
रद = दाँत । कंधरा = गर्दन । 'मंद' का अन्वय 'रद कंधरा, चालि' से
करें । 'मंद' का अर्थ 'रद' के साथ लघु, 'कंधरा' के साथ 'छोटी', 'चालि' के
साथ 'धीमी' । (अथवा 'कंदरा' का अर्थ गुफा या गड्ढा करके 'रदकंदरा' का
अर्थ 'विरलदंती' कर लें । तब 'मंद' का अन्वय 'चालि' से ही होगा । )
(५८) स्वेद मदन-जल द्विरद-मद-गंधित भूरे केस ।
अति तीछन बहु लोम तन, भनि हस्तिनि इभ-भेस । १२।
शब्दार्थ— मदन-जल = कामसलिल । द्विरद = हाथी । इभ = हाथी ।
हस्तिनी, यथा—( सवैया )
(५६) सब देह भई दुरगंधमई मतिअंध दई सुख पावत कैसे :
कछु साल तें लोम बिसाल से हैं सुतिताड़न केसव बोल अनैसे ।
अलि ज्यों मलिनी नलिनी तजिकै करिनी के कपोलनि मंडित तैसे ।
छिति छोड़िकै राजिसिरी बस पाप निरैपद राज बिराजत जैसे ।१३।
शब्दार्थ— मतिअंध = बुद्धिहीन । साल = ( शल्य ) काँटा । बिसाल =
बढ़कर । श्रुतिताड़न = कर्णकटु । अनैसे = ( अनिष्ट ) बुरे । करिनी =
हस्तिनी । छिति = (क्षिति) पृथ्वी । राजिसिरी = राज्यश्री । बस पाप = पाप
के कारण । निरै = ( निरय ) नरक । पद = स्थान ।
भावार्थ— ( नायिका की उक्ति सखी से ) हे सखी, भ्रमर अपने मन में
कमलिनी को मलिन समझकर त्याग देता है और बुद्धिहीन होकर दुर्गंधयुक्त
देहवाली, काँटे से भी बढ़कर कष्टप्रद रोमवाली और कर्णकटु एवम् अप्रिय
वचन बोलनेवाली हस्तिनी के गंडस्थल पर मड़राता है । उसका ऐसा करना
११-कटि-कठि; कटु । कंधरा-कंदरा । १२-इभ०-इहि बेस । १३-
भइ-मई । मई-गई ।
तृतीय प्रभाव ७५
बैसा ही है जैसे पाप के कारण कोई राजा पृथ्वी की राज्यश्री छोड़कर नरक-
लोक में निवास करे ।
अलंकार — उदाहरण, रूपकातिशयोक्ति और अन्योक्ति ।
सूचना — यहाँ नायिका के कहने का तात्पर्य है कि नायक मुझ जैसी
पद्मिनी (नायिका) को छोड़कर गंदी एवम् कर्कशा हस्तिनी (नायिका)
के पास जाता है। नलिनी और करिनी शब्दों के दुहरे अर्थ के कारण इस
सवैये का अर्थ हस्तिनी नायिका और नायक (भ्रमर) पर घटित होता है ।
(दोहा)
(६०) ता नायक की नायिका, ग्रंथनि तीनि प्रमान ।
स्वीया परकीया अवर, स्वीया-परकीया न ।१४।
शब्दार्थ — अवर = (अपर) और। स्वीया-परकीया न = स्वकीया
और परकीया नहीं अर्थात् सामान्या, गणिका ।
सूचना -नायिकाओं के ये भेद धर्मानुसार किए जाते हैं ।
अथ स्वकीया-लक्षण
(६१) संपति बिपति जो मरनहू, सदा एक अनुहारि ।
ताहि स्वकीया जानिये, मन-बच-कर्म बिचारि ।१५।
शब्दार्थ — अनुहारि = समान । बच=वचन ।
स्वकीया-भेद
(६२) मुग्धा, मध्या, प्रौढ़ गति, तिनकी तीनि बिचारि ।
एक एक की जानियहुँ, चारि चारि अनुहारि ।१६।
शब्दार्थ — गति = अवस्था ।
मुग्धा-भेद
(६३) नवलबधू नवजोबना, नवलअनंगा नाम ।
लज्जा लिये जु रति करै, लज्जाप्राय सु बाम ।१७।
शब्दार्थ — लज्जाप्राय = लज्जाप्राया । वाम = स्त्री ।
अथ नवलवधू-मुग्धा-लक्षण
(६४) तासों मुग्धा नवबधू, कहत सयाने लोइ ।
दिन दिन दुति दूनी बढ़ै, बरनि कहै कबि कोइ ।१८।
१४—प्रमान-बखान । स्वीया-स्वक्रिया । स्वीया०-सामान्या सु प्रमान ।
१५—ताहि-ताको । जानियै-जानिजहुँ । बच कर्म-क्रम बचन । १६—गति-
मति । की जानियहुँ-के जानिये । १७—जोबना-यौवना । बाम-धाम- ।
१८-तासों-जासों । कोइ-सोइ ।
७६ रसिकप्रिया
यथा—( सवैया )
(६५) मोहिबो मोहन की गति कों गतिही पढ़ी बैन कहा धौं पढ़ैगी।
ओप उरोजनि की उपजैं दिन, काइ मढ़ अँगिया न मढ़ैगी।
नैननि की गति गूढ़ चलाचल केसवदास अकास चढ़ैगी।
माई, कहाँ यह माइगी दीपति जौ दिन द्वै इहि भाँति बढ़ैगी ।१६।
शब्दार्थ—मोहन = श्रीकृष्ण और मोहन मंत्र। गति = मनोगति, मन
की चेतना। गति ही = चाल ही। बैन = ( वचन ) वाणी। ओप = कांति
( बाढ़ )। उपजैं = उत्पन्न होने पर। दिन = दिनदिन, नित्य। काइ =
काया। चलाचल = चंचल तथा स्थिर। अकास चढ़गी = (मुहावरा) सर्वोपरि
होगी। माइगी = अँटेगी।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे माई, जब 'चाल ही से यह
मोहन की चेतना को मोहित करना पढ़ चुकी है ( चाल से ही मोहन को
मोह लेती है ) तब वचनों से (बोलकर) न जाने क्या (मंत्रादि) पढ़ेगी (कैसा
जादू डाल देगी ) । कुचों में कांति ( बाढ़ ) उपजने पर काया तो स्थूल हो
जाएगी पर वे स्वयम् चोली में न अँट सकेंगे। नेत्रों की गूढ़, चंचल एवम्
अचंचल गति (यदि इसी प्रकार बढ़ती रही तो ) सर्वोपरि हो जायगी। यह
( शरीर की ) शोभा यदि दो ( कुछ ) दिनों तक इसी भाँति बढ़ती रही तो
कहाँ अँट सकेगी ? ( कहीं नहीं )।
अलंकार—अधिक ( आधेय से आधार के अधिक होने में )।
अथ नवयौवनभूषिता-मुग्धा-लक्षण— (दोहा )
(६६) सो नवजोबनभूषिता, मुग्धा को यह बेस।
बालदसा निकसै जहाँ, जोबन को परबेस ।२०।
शब्दार्थ—बेस = (वेश) रूप। बालदसा = शिशुता, लड़कपन। निकसै=
छुटे, हटे। परबेस = ( प्रवेश ) ।
यथा—( सवैया )
(६७) केसव फूलि नचीं भ्रुकुटीं कटि लूटि नितंब लई बहुकाली।
बैननि सोच सँकोच सु नैननि छूटि गई गति की चल चाली।
द्योसक धीर धरौ न धरौ अब लै तुमकों मिलिबो बनमाली।
वाको अयान निकारन कौं उर आए हैं जोबन के अखिताली ।२१।
शब्दार्थ—फूलि = प्रसन्न होकर। बहुकाली = बहुत दिनों की। संकोच =
लज्जा। चल = चंचल। द्योसक = थोड़े समय तक। बनमाली = श्रीकृष्ण
(संबोधन में)। वाकों = उस ( नायिका ) का। अयान = ( अज्ञान ) भोला-
पन। अखिताली = अख़ताली, प्रबंधक ( किसी स्थान पर पहले से जाकर
राजा के ठहरने का प्रबंध करनेवाल,,
१६—पढ़ी-पढ़ै। काइ-काहि ।
तृतीय प्रभाव :७७
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक से ) हे कृष्ण, थोड़े समय तक धैर्य
धरो अथवा न धरो अब मैं (उस नायिका को, लेकर तुमसे मिलूँगी । क्योंकि
उसके ( लड़कपन के ) भोलेपन को निकालने के लिए यौवन का अफताल
( प्रबंध ) उसके हृदय ( वक्षस्थल ) में हो चुका है। जिसके कारण हर्ष
से उसकी भौंहें नाच उठी हैं। बहुत दिनों की *( लड़कपन की पाली हुई )
उसकी कमर को नितंबों ने लूट लिया है ( कमर पतली और नितंब स्थूल
हो गए हैं)। वह सोच समझकर बोलने लगी है। नेत्रों में लज्जा आ गई है
तथा उसकी चाल से चंचलता दूर हो गई है ।
अलंकार—समाधि ( यौवनावस्था के आगमरूप कारण की प्राप्ति से
मिलाने का कार्य सुगम होने से )।
सूचना—(१) खंडित हस्तलिखित प्रति और लीथोवाली प्रति में इसके
अनंतर यह सवैया मिलता है—
धनु भ्रू धरि लोचन लोल अमोल सो बान कटाच्छ की कोर कढ़ी ।
मुख-माधुरी बानी बसी चतुराई सु केसव मोहिनी साथ पढ़ी ।
कुच तंबू तने तन लाज बिराजति बार गहे चहुँ ओर मढ़ी ।
न बढ़ो द्युति बालहिं बालकता हरि, अंग अनंग की फौज चढ़ी ।
(२) खंडित प्रति में एक और उदाहरण भी इसके आगे मिलता है । वही
लीथोवाली प्रति में नवलअनंगा के उदाहरण में दिया गया है । देखिए
आगे छंदसंख्या २३ की सूचना (२) ।
अथ नवलअनंगा-मुग्धा-लक्षण—( दोहा )
(६८) नवलअनंगा होइ सो, मुग्धा केसवदास ।
खेलै बोलै बालविधि, हँसै त्रसै सबिलास ।२२।
शब्दार्थ—बालविधि = लड़कपन की भाँति । त्रसै = डरै ।
यथा—( कबित्त )
(६६) चंचल न हूजै नाथ, अंचल न ऐंचो हाथ,
सोवैं नेक सारिकाहू सुक तौ सुवायौ जू ।
मंद करौ दीप-द्युति चंद-मुख देखियत,
दौरिकै दुराइ आऊँ द्वार त्यों दिखायौ जू ।
मृगज - मराल - बाल बाहिरे बिडारि देहुँ,
भायौ तुम्हें केसव सु मोहू मन भायौ जू।
२१—नचीं-नचैं । अयान-अपान । अबिताली-अबताली ।
[ पाठांतर—लोल०-लोलत मेल सु कांड । मोहिनी०-मोहनता सु । हरि-
हति । ]
२३—ऐंचो":
Is it "ऐंचो" or "ऐँचो"?
There is a dot on 'ऐ': "ऐंचो".
Then "खैंचो": dot on 'खै': "खैंचो".
Wait, could it be "ऐँचो"? In Devanagari typesetting, bindu is used over matras that go above the line.
"सारिका हू-सारिकाऊ । दौरिके-दौतिके । त्यौँ-ता ।"
Wait, look at "त्यौँ-ता":
Is it "त्यौँ" with candrabindu or "त्यौं"?
It looks like a candrabindu over 'त्यौ': "त्यौँ".
Then hyphen: "-".
Then "ता" or "तो"?
It says "ता" followed by a danda: "ता ।".
Wait, what is the next line in the footnote?
"चोगुनो-सोगुनो ।"
Wait, is it "चोगुनो" or "चौगुनो"?
Look at "चोगुनो":
It has ONE slant: "चोगुनो".
Then hyphen: "-".
Then "सोगुनो": ONE slant: "सोगुनो ।".
Let's double-check line 02-03:
छल के निवास ऐसे बचन - बिलास सुनि,
चौगुनो सुरतिहूँ
तृतीय प्रभाव ७६
अथ लज्जाप्रायारति-मुग्धा-लक्षण (दोहा)
(७०) मुग्धा लज्जाप्रायरति, बरनत कबि इहिं रीति ।
करै जु रति अति लाज सों, पतिहिं बढ़ावति प्रीति ।२४।
यथा—(सवैया)
(७१) बोली न हौं वे बुलाइ रहे हरि पाइ परे अरु ओलियौ ओड़ी ।
केसव भेंटिबे कौं भरि अंक छुड़ाइ रहे जक हौं नहिं छोड़ी ।
सूधैं चितैबै कौं केतौ कियो सिर चाँपि उठाइ अँगूठनि ठोढ़ी ।
मैं भरि चित्त तऊ चितयो न रही गड़ि नैननि लाज निगोड़ी ।२५।
शब्दार्थ—औलियौ ओड़ी = 'ओली ओड़ना' का अर्थ है—दुपट्टा या
अंचल पसारकर किसी वस्तु की भिक्षा माँगना, भीख चाहना । कैतो कियो=
अनेक उपाय किए । निगोड़ी = निरवंशी, एक प्रकार की गाली ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति सखी प्रति) हे सखी, नायक ने मुझे
बुलाना चाहा परंतु मैं (लज्जा के कारण) नहीं बोली । तब वे मेरे पैरों
पड़े और ओली ओड़ी । आलिंगन करने के लिए कहा, पर मैंने हठ नहीं
छोड़ा (अस्वीकार ही करती रही) । तब उन्होंने संमुख देखते रहने के लिए
अनेक उपाय किए । उन्होंने एक हाथ (के अँगूठे) से सिर दबाया और दूसरे
(दाहिने) हाथ के अँगूठे से ठोढ़ी दबाई (हाथ से सिर ऊपर किया पर) मैंने
उन्हें चित्त भर नहीं देखा । निगोड़ी लज्जा मेरे नेत्रों में कुछ ऐसी ही गाड़ी
बैठी थी ।
अलंकार—विशेषोक्ति ।
मुग्धाशयन-लक्षण—(दोहा)
(७२) मुग्धा सोइ रहै नहीं, पियसँग सुनहु सुजान ।
जौ क्यों हूँ सोवै सखी, सुख नहिं ताहि समान ।२६।
यथा—(सवैया)
(७३) पाइ परें मनुहारि कियें पलिका पर पाउँ धरयो भय-भीने ।
सोइ गई कहि केसव कैसहूँ कोरहिं कोरिक सौंहनि कीने ।
साहस कै मुख सों मुख छुवै छिन में हरि मानि सबै सुख लीने ।
एक उसाँसहिं के उससे सिगरेई सुगंध बिदा-करि दीने ।२७।
[ पाठान्तर—दंत०–कँ से । दाननि कौं–दांत मुख; नीको अति । हँसति–
लखति । अखरानि-आखरन । सकुचौ०-सकुचे से बैन नैन । केसोदास-केसोराइ ।
आजु-अब । देखी०–सुनी जैसी तैसो । ]
२४—कबि-हैं । बढ़ावति-बढ़ावै । २५—हौं नहिं-मैं पै न । गड़ि-गहि ।
२६—सुनहु-सुनो । २७—कियें-करें । कोरहिं०–कोरक रोर हूँ । सबै-महा ।
८० रसिकप्रिया
शब्दार्थ — मनुहारि कियें = चिरौरी करने पर । पलिका = पलंग । भय-
भीनै=भयभीत । कोरहिं=क्रोड़ में, गोद में । कोरिक=करोड़, बहुत अधिक ।
उससे=निकलने पर ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) हे सखी उस (नायिका) ने
(नायक द्वारा) पैरों पड़ने और चिरौरी करने पर (किसी प्रकार) भयभीत
होकर पलंग पर पर रखा । (पुनः) करोड़ों कसमें खाने पर (किसी प्रकार) गोद
में सो गई । तब साहस करके उन्होंने (नायक ने) मुख से मुख छुलाया । क्षण
मात्र के इस सुख में उन्होंने सभी सुख प्राप्त कर लिए । उस (नायिका) के
एक ही उच्छ्वास के निकलने से और सभी सुगंधें बिदा हो गईं । (दब गईं—
उसके मुख की सुवास के सर्वोत्कृष्ट होने के कारण ) ।
अलंकार—हेतु ।
मुग्धा के सुख-लक्षण—( दोहा )
(७४) मुग्धा सुरख करै नहीं, सपनेहूँ सिख मानि ।
छल-बल कीनें होति है, सुख-सोभा की हानि ! २८।
शब्दार्थ — कीनें = करने से ।
यथा—( कवित्त )
(७५) सुख दै सखीनि बीच दै कै सौंहैं चाइ कै,
खवाइ कछू स्वाइ बस कीनी बरबसु है ।
कोमल मृनालिका सी मल्लिका की मालिका सी,
बालिका जु डारी मीड़ि मानुसु कि पसु है ।
जानै न बिभात भयो केसव सुनै को बात,
देखौ आनि गात जात भयो किधौं असु है ।
चित्र सी जु राखी वह चित्रिनी बिचित्र यह,
देखौ धौं नए रसिक या में कौन रसु है । २६।
शब्दार्थ—सुख दै = सुख की सामग्रियां जुटाकर । बीच दै = मध्यस्थ
बनाकर । सौंह = शपथ । खवाइ कछू = कुछ मादक द्रव्य खिलाकर । बर-
बसु = बल से, जबरन । मृनालिका = कमलनाल । मल्लिका = बेला ।
मीड़ि = मसलकर । मानुसु = मनुष्य । बिभात=प्रभात, प्रातःकाल । आनि =
आकर । गात = ( गात्र ) शरीर । असु = प्राण । धौं = क्यों नहीं । रसु =
आनंद ।
२८—सिख-सुख । २६—चाइ-साइ । कि-के । वह-यह । यह-अति;
गति । देखौ-कहि; कहो ।
६ तृतीय प्रभाव ८१
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायक से) आपने बरबस उसे (नायिका को)
सुख देकर (सुख की सामग्रियाँ जुटाकर), सखियों को मध्यस्थ बनाकर, शपथ
खाकर, कुछ नशीली वस्तुएँ खिलाकर तथा सुलाकर अपने वश में किया ।
फिर कमलनाल सी कोमल एवम् बेले की माला की भाँति (सुकुमार एवम्
सुगंध ) वाला को मसल डाला । आप मनुष्य हैं या पशु ? (क्योंकि आपके
कर्म कठोर हैं, निर्दयतापूर्ण हैं) आपको अभी तक यही पता नहीं चला कि
प्रभात हो गया है (अभी तक आपने उसे मुक्त नहीं किया) । मेरी बात ही
नहीं सुन रहे हैं। जरा इसके शरीर को तो देखिए, जान पड़ता है प्राण निकल
से गए हैं। उस चित्रिनी (नायिका) को आपने विचित्र गति (ढंग) से
रखा है, वह तो चित्र-सी (स्थिर निर्जीव) हो गई है। हे नए रसिक, देखते
क्यों नहीं ? आपको ऐसा कृत्य करने में कौन-सा आनंद मिला ?
अलंकार—विषम ।
मुग्धा को मान— ( दोहा )
(७६) मुग्धा मान करै नहीं, करै तौ सुनहु सुजान ।
त्यों डरपाइ छुड़ाइयै, ज्यों डरपै अज्ञान ।३०।
शब्दार्थ—डरपाइ = भयभीत करक ।
यथा— ( सवैया )
(७७) बोलै न बाल बुलावतहूँ नख-रेख लिखै भुव प्रेम-परेखौ ।
आपनो हाथ बिलोकि-बिलोकि कह्यो तब केसव बुद्धिबिसेखौ ।
छोटी-बड़ी बिधि-रेख लिखी जुग आयु की रेख सुं कौन जु लेखौ ।
प्रेम तें बोल सह्यो न पर्यो अकुलाइ कह्यो पिय कैसी है देखौ ।३१।
शब्दार्थ—वाल = नायिका । भुव = भूमि । प्रेम-परेखौ = प्रेम की परीक्षा
में, प्रेम के मान में । बुद्धिबिसेखौ = विशेषबुद्धिवाले (नायक) ने । बिधि =
ब्रह्मा । जुग = दो । सु = वह । लेखै = समझी जाए । देखौ = देखा जाए ।
भावार्थ—(मुग्धा ने सखियों के कहने से मान किया है, नायक चतुराई
से उसे भयभीत करके मान छुड़ा रहा है) नायिका (नायक के) बुलाने पर
भी नहीं बोलती, प्रेम का मान ठानकर नखों से पृथ्वी पर रेखाएँ खींच रही
है। यह देखकर चतुर नायक ने अपना हाथ देख-देखकर यह कहना आरंभ
किया कि ब्रह्मा ने छोटी-बड़ी दो रेखाएँ बनाई हैं। इनमें आयु की रेखा कौन
सी मानी जाय ? प्रेम के कारण नायिका इन वचनों को सह न सकी (वह
डर गई कि कहीं आयु की रेखा छोटी ही न हो, नायक की आयु कम ही न
३०—करै-करहि । सुनहु०-सुनौ-निदान । त्यों-यों न्यों । ३१-परेखौ,
लेखौ आदि-परेखें, लेखें आदि ।
८२ रसिकप्रिया
हो ) ; उससे मौन नहीं रहा गया । उस (नायिका) ने व्याकुल होकर कहा—
'प्रियतम, कैसी रेखा है, देखें तो' ।
अलंकार—विशेषोक्ति ( बुलावतहूँ न बोलै ), पर्यायोक्ति (दूसरी) ।
(७८) अथ मध्या के चतुर्भेद—( दोहा )
मध्या आरुढ़जोबना, प्रगल्भवचना जानि ।
प्रादुर्भूतमनोभवा, सुरतिबिचित्रा आनि ।३२।
शब्दार्थ—आनि = अन्य ।
(७६) अथ मध्या-आरूढ़यौवना-लक्षण—(दोहा)
मध्या आरुढ़जोबना, पूरन जोबनवंत ।
भाग सुहाग भरी सदा, भावति है मन कंत ।३३।
यथा—( कवित्त )
(८०) चंद को सो भाग भाल, भ्रुकुटी कमान ऐसी,
मैन कैसे पैने सर नैननि बिलासु है ।
नासिका सरोज, गंधबाह से सुगंधबाह,
दारधौं से दसन केसौ बीजुरी सो हासु है ।
भाई ऐसी ग्रीव-भुज, पान सो उदर अरु,
पंकज से पाइ गति हंस की सी जासु है ।
देखी है गुपाल एक गोपिका मैं देवता सी,
सोने सो सरीर सब सोंधे की सी बासु है ।३४।
शब्दार्थ—चंद को भाग = चंद्र के भाग सा, आधे चंद के समान ।
भाल = ललाट । कमान = धनुष । मैन = मदन, कामदेव । पैने = तेज,
तीक्ष्ण । सर = बाण । बिलासु = खेल, नेत्रों की गति । गंधबाह = सुगंध को
वहन करनेवाली, सुगंधित वायु । सुगंधबाह = सुगंध का प्रवाह ( मुखवास ) ।
दारधों = अनार । दसन = दाँत । भाई = खराद पर से उतारी हुई (सुडौल) ।
पान = पत्ता ( पीपल का ) । पंकज = कमल । देवता = देवबाला । सोंधे =
सुगंध । बासु = वास, सुगंध ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक से ) हे गोपाल, मैंने एक देवबाला
सी ( अत्यंत रमणीय ) गोपिका देखी है । उसका भाल चंद्राधं के समान है,
भौंहें धनुषाकार हैं, नेत्रों का विलास काम के तीक्ष्ण बाणों के समान है ।
नासिका कमल सी, मुखवास सुगंधित पवन के समान है । दाँत अनार के दाने
के समान हैं और हास बिजली के समान है । ग्रीवा और भुजाएँ खराद पर से
उतारी हुई सी हैं । उदर (पीपल के) पत्र के समान है, चरण कमल की भाँति
३२ - जानि-जान । आनि-मान । ३४ - ऐसी-की सी । कीसो-कैसो ।
तृतीय प्रभाव ८३
हैं। चाल हंस की सी है। उसके सोने की भाँति (गौर) शरीर में समस्त सुगंधों
की सी सुगंध है (सोने में सुगंध नहीं होती परंतु इसके शरीर में सुगंध भी है) ।
अलंकार — धर्मलुप्तोपमा की माला ।
सूचना—( १ ) नायिका के सौंदर्य की अधिकता वस्तु से नायक क
मिलाना वस्तु व्यंग्य है । ( २ ) केशव ने 'देवता' शब्द को संस्कृत की ही
भाँति स्त्रीलिंग माना है। ( ३ ) 'बासु' शब्द स्त्रीलिंग है। उसमें उकारांत
रूप मिथ्यासादृश्य से और तुकांत के अनुरोध से है।
अथ प्रगल्भवचना-मध्या-लक्षण—( दोहा )
(८१) प्रगलभवचना जानि तिहि, बरनौ केसवदास ।
बचननि माँझ उराहनो, देइ दिखावै त्रास ।३५।
शब्दार्थ — तिहि = उसको । माँझ = में । उराहनो = उपालंभ ।
यथा—( सवैया )
(८२) कान्ह भलें जु भलें ढँग लागे भलें इन नैननि के रँग रागे ।
जानति हौं सबहीं तुम जानत आपु से केसब लालच लागे ।
जाहु नहीं, अहो जाहु चले, हरि जात जितै दिनहीं बनि बागे ।
देखि कहाँ रहे धोखें परे उबटौगे जू देखौ ब देखहु आगे ।३६।
शब्दार्थ—भलें ढँग लागे = अच्छा ढंग पकड़ा है । नैननि के रंग रागे=
नेत्रों के रंग में अनुरक्त होकर ( जिससे नेत्र मिल जाते हैं उसी के साथ प्रेम
कर बैठते हैं ) । लालच लागे = लोभ में लगे हुए । दिनहीं बनि बागे = जहाँ
प्रतिदिन वेशभूषा बनाकर जाते हैं । उबटौगे = चित्त से उतर जाओगे ।
देखौ ब देखहु आगे = अभी क्या है, आगे देखिए इस करतूत से आप दिन-दिन
चित्त से उतरते ही जाएँगे ।
भावार्थ—(·नायिका नायक की अन्यस्त्री-विषयक प्रीति को लक्षित करके
व्यंग्यपूर्वक उलाहना देती है ) हे कान्ह, आप बड़े भले हैं और आपने अच्छा
ढंग पकड़ा है । यह भी अच्छा ही किया कि नेत्रों के प्रेम में अनुरक्त हुए
(अन्य नायिकाओं से नेत्र मिलाकर उन पर आसक्त हुए), मैं (खूब ) सम-
झती हूँ । स्वयम् लोभ में पड़े हुए आप औरों को भी अपनी तरह (लालची)
समझते हैं । जाइए, जाते क्यों नहीं । जहाँ आप प्रतिदिन • वेशभूषा बनाकर
जाया करते हैं, वहीं जाइए न । आप धोखे में पड़े हुए मुझे क्या देख रहे हैं ।
ऐसी करतूतों से चित्त से उतर गए हैं और उतर जाइएगा । अभी क्या है,
आगे इस प्रकार की करनी से अधिकाधिक चित्त से उतरते ही जाएँगे ।
३५—बरनौं-बरनै । देइ-देखि । ३६—इन्ह-ह्वैहै, ह्रै हैं । जितै-जहाँ ।
दिन- नित । उबटोगे जू०-उभिटे किसे देखिबे ।
८४ रसिकप्रिया
विवेचन—'उबटोगे' का अर्थ सरदार कवि ने भिन्न किया है। उन्होंने
'उबटबो' का अर्थ माना है—किसी बात से जो अभिमान की वृद्धि हो जाए
उसके प्रदर्शन को 'उबटना' कहते हैं। 'हिंदी शब्दसागर' में दूसरा पाठ स्वी-
कृत किया गया है और 'उभिटना' का अर्थ 'ठिठकना, हिचकना, भिटकना'
किया गया है। प्रसंग से 'ठिठकना' ही समुचित हो सकता है। 'आप जिसे
देखने की घात लगाए रुके हैं' ऐसा अर्थ दूसरे पाठ का भासित होता है।
'शब्दसागर' में पाठ यों है—'उभिटे कैसे ! देखिबो देखहुँ आगे'।
अथ प्रादुर्भूतमनोभवा-मध्या-लक्षण—(दोहा)
(८३) प्रादुर्भूतमनोभवा मध्या कहौं बखानि।
तन मन भूषित सोभियै केसव कामकलानि।३७।
शब्दार्थ—सोभियै = शोभित होती है।
यथा—(सवैया)
(८४) आजु मैं देखी है गोपसुता इक, होइ न ऐसी अहीर की जाई।
देखतहीं रहियै दुति देह की देखे तें और न देखी सुहाई।
एक ही बंक बिलोकनि ऊपर वारैं बिलोकि त्रिलोक-निकाई।
केसवदास कलानिधि सो बर बूझियै काम कि मेरो कन्हाई।३८।
शब्दार्थ—जाई = पुत्री। कलानिधि = चंद्रमा। देखे तें = देखने से।
देखी—देखी हुई (सुंदरियाँ)। बर = पति। बूझियै=जान पड़ता है।
शब्दार्थ—(सखी की उक्ति सखी प्रति) हे सखी, आज मैंने एक अतीव
सुंदर गोपकन्या देखी है। अहीर की पुत्री (गोपिका) ऐसी सुंदर नहीं हुआ
करतीं। जिसके शरीर की कांति ऐसी है कि बराबर देखते रहने की ही इच्छा
होती है। अन्य ऐसी देखी हुई सुंदरियाँ उसे देख लेने पर अच्छी ही नहीं
लगतीं। मैं उसकी एक ही टेढ़ी चितवन देखकर, तीनो लोकों की सुंदरता उस
पर न्यौछावर कर देती हूँ। ऐसी सुंदरी का पति या तो चंद्रमा होगा या
कामदेव ? (इस पर सखी ने उत्तर दिया कि नहीं) मेरे श्रीकृष्ण।
सूचना—चौथी पंक्ति में 'कि' के स्थान पर 'की' पाठ मानकर यह अर्थ
भी लगाया जाता है—'संपूर्ण काम की कलाओं की निधि मेरे कन्हाई ही
इसके बर जान पड़ते हैं'।
अलंकार—उत्तर।
अथ सुरतविचित्रा मध्या-लक्षण—(दोहा)
(८५) अति बिचित्रसुरता सु तौ, जाको सुरत बिचित्र।
बरनत कविकुल कौं कठिन, सुनत सुहावै मित्र।३६।
३७—सोभियै-सोभिजै, सोहियै। ३८—देखे तें-देखतें। बारैं-बारौं।
बूझियै-बूझिहै। कि-की।