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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 286 में से

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पृष्ठ 69

द्वितीय प्रभाव ६६
ब्रजनाथ, तुम किसके हाथ बिके हो ? ( तुमने किस दूसरी नायिका से प्रेम
कर लिया है ? ) ।
अलंकार - एकावली ( चतुर्थ चरण में ) ।
सूचना - 'प्रौढ़िरूढ़' शब्द का प्रयोग अभी तक केवल केशव की ही
कविता में मिला है। इसका प्रयोग 'रामचंद्रचंद्रिका' में भी किया गया है -
प्रौढ़िरूढ़िकोस मूढ़ गूढ़ गेह में गयौ । - रामचंद्रचंद्रिका ( १६।२४ ) ।
अथ धृष्ट-लक्षण - ( दोहा )
(४२) लाज न गारिहु मार की, छाँडि दई सब त्रास ।
देख्यौ दोष न मानही, धृष्ट सु कहिये तास ।१४।
शब्दार्थ - लाज ० = गाली पाने और मार खाने की भी लज्जा नहीं है ।
त्रास = डर । देख्यौ ० = दोष करते हुए पाए जाने पर भी अपने दोष को
स्वीकार नहीं करता ।
अथ प्रच्छन्न धृष्ट, यथा - (दोहा)
(४३) नेह-भरे लै लै भाजत भाजन कौन गनै दधि दूध मठाए ।
गारि दिये तें हँसैं बरजें घर आवत हैं जनु बोलि पठाए ।
लाज की और कहा कहौं केसव जे सुनिये ते सबै गुन ठाए ।
मामी पियै इनकी मेरी माइ को हैं हरि आठहुँ गाँठ अठाए ।१५।
शब्दार्थ - नेह = स्नेह अर्थात् मक्खन, घी आदि । भाजन = पात्र ।
मठाए = मट्ठे वाले ( भाजन ) । बरजें = मना करने पर भी । बोलि पठाए =
बुला भेजे गए । जे सुनिये ते = जो गुण सुने जाते थे वे सब । ठाए = हैं ।
मामी पीना = (मुहावरा) जिम्मेदारी के साथ इनकार करना, मुकर जाना ।
मामी = पानी (किसी कार्य के संबंध में पवित्र पानी को हाथ में लेना या पीना
उस कार्य के अस्वीकार के लिए प्रमाण होता है) । आठहुँ गाँठ = सब प्रकार
से ( आगे छंद १६ में आठ गांठों का उल्लेख है । ), भली भाँति । अठाए =
शरारती । आठ गाँठ अठाई = छँटा हुआ धूर्त ।
भावार्थ - ( नायिका की उक्ति अंतरंग सखी से ) कृष्ण मेरे मक्खन,
घी आदि से भरे बर्तन ले लेकर भाग जाते हैं, दही, दूध और मट्ठे के बर्तनों
की तो गिनती ही नहीं । वे गाली देने पर हँसते हैं और मना करने पर भी
घर में इस प्रकार आते हैं, मानो बुला भेजे गए हों। लाज की और बातें क्या
कहूँ, इनके जितने गुण (अवगुण) सुने जाते थे वे सबके सब इनमें हैं। हे सखी,


१४-मानही-मानई । कहिये ०-केसवदास । १५- मठाए-मिठाए । ते
सबै ०-गुन ते सब ठाए । मामी-मीमी । अठाए-हठाए ।