रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक से ) हे कृष्ण, थोड़े समय तक धैर्य
धरो अथवा न धरो अब मैं (उस नायिका को, लेकर तुमसे मिलूँगी । क्योंकि
उसके ( लड़कपन के ) भोलेपन को निकालने के लिए यौवन का अफताल
( प्रबंध ) उसके हृदय ( वक्षस्थल ) में हो चुका है। जिसके कारण हर्ष
से उसकी भौंहें नाच उठी हैं। बहुत दिनों की *( लड़कपन की पाली हुई )
उसकी कमर को नितंबों ने लूट लिया है ( कमर पतली और नितंब स्थूल
हो गए हैं)। वह सोच समझकर बोलने लगी है। नेत्रों में लज्जा आ गई है
तथा उसकी चाल से चंचलता दूर हो गई है ।
अलंकार—समाधि ( यौवनावस्था के आगमरूप कारण की प्राप्ति से
मिलाने का कार्य सुगम होने से )।
सूचना—(१) खंडित हस्तलिखित प्रति और लीथोवाली प्रति में इसके
अनंतर यह सवैया मिलता है—
धनु भ्रू धरि लोचन लोल अमोल सो बान कटाच्छ की कोर कढ़ी ।
मुख-माधुरी बानी बसी चतुराई सु केसव मोहिनी साथ पढ़ी ।
कुच तंबू तने तन लाज बिराजति बार गहे चहुँ ओर मढ़ी ।
न बढ़ो द्युति बालहिं बालकता हरि, अंग अनंग की फौज चढ़ी ।
(२) खंडित प्रति में एक और उदाहरण भी इसके आगे मिलता है । वही
लीथोवाली प्रति में नवलअनंगा के उदाहरण में दिया गया है । देखिए
आगे छंदसंख्या २३ की सूचना (२) ।
अथ नवलअनंगा-मुग्धा-लक्षण—( दोहा )
(६८) नवलअनंगा होइ सो, मुग्धा केसवदास ।
खेलै बोलै बालविधि, हँसै त्रसै सबिलास ।२२।
शब्दार्थ—बालविधि = लड़कपन की भाँति । त्रसै = डरै ।
यथा—( कबित्त )
(६६) चंचल न हूजै नाथ, अंचल न ऐंचो हाथ,
सोवैं नेक सारिकाहू सुक तौ सुवायौ जू ।
मंद करौ दीप-द्युति चंद-मुख देखियत,
दौरिकै दुराइ आऊँ द्वार त्यों दिखायौ जू ।
मृगज - मराल - बाल बाहिरे बिडारि देहुँ,
भायौ तुम्हें केसव सु मोहू मन भायौ जू।
२१—नचीं-नचैं । अयान-अपान । अबिताली-अबताली ।
[ पाठांतर—लोल०-लोलत मेल सु कांड । मोहिनी०-मोहनता सु । हरि-
हति । ]