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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 286 में से

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पृष्ठ 67

द्वितीय प्रभाव ६७
नहीं होता कि श्रीकृष्ण ने किसी दूसरी स्त्री से प्रेम कर लिया है) ।
(३८) बहि-अंतर गूढ़-अगूढ़ निरंतर कामकला कुल कौन गनै ।
कहि केसव हास-बिलास सबै प्रतिद्यौस बढ़ें रसरीति सनै ।
जिनको जिय मेरेई जीव जियै सखि काय मनो बच प्रीति घनै ।
तिनकों कहैं आन बधू के अधीन हैं सो परतीक किधौं सपने ।१०।
शब्दार्थ—बहि = बहिः, बाहर । अंतर = भीतर ।
सूचना—सरदार इस सवैये को केशव का नहीं मानते ।
(३६) अथ शठ-लक्षण— (दोहा)
मुँह मीठी बातैं कहै, निपट कपट जिय जानि ।
जाहिन डरु अपराध को, सठ करि ताहि बखानि ।११।
शब्दार्थ—निपट = अत्यंत । जानि = जानो । सठ करि = 'शठ' नाम
से । बखानि = बखानो, कहो ।
(४०) अथ प्रच्छन्न शठ, यथा—(सवैया)
रुचि पंकज चंदन बंदन कंचन रंच न रोचनहू की बची ।
कहिये किहिं कारन को इते लायक का पर भामिनि भौंह नची ।
अनुमानत हौं अँखियाँ लखि लाल ये नाहिंनै राति के रोष रची ।
तन तेरे बियोग तप्यो तरुनी तिहिं मानहुँ मो हिय माँह तची ।१२।
शब्दार्थ—रुचि = छवि, शोभा । पंकज = ( यहाँ पर ) लाल कमल ।
चंदन = लाल चंदन । बंदन = सिंदूर । कंचन = सोना । रंच = थोड़ा ।
रोचन = रोली । कों इते लायक = इस योग्य कौन है, इसका पात्र कौन है ।
भामिनी = स्त्री (संबोधन में) । भौंह नची = भौंह चढ़ाई है । तची = तप्त हुई ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति मानिनी नायिका से ) तुम्हारे नेत्रों के
द्वारा लाल कमल, रक्त चंदन, सिंदूर, सोना और रोली की शोभा कुछ भी
बच न सकी ( उन्हीं की भाँति ये लाल हैं ) । इसका क्या कारण हैं ? कौन
इस ( क्रोध ) के योग्य है जिस पर तुमने भौंहें चढ़ाई हैं ? तुम्हारी लाल
आँखें देखकर अनुमान करता हूँ कि ये ( मेरी अनुपस्थिति के कारण ) रात
में किए गए रोष से लाल नहीं हैं । प्रत्युत मेरा शरीर ( रात में ) तुम्हारे
वियोग में तप रहा था इसी कारण मानो तुम्हारी आँखें मेरे हृदय ( की
वियोगाग्नि ) से तपकर लाल हो गई हैं । ( क्योंकि तुम मेरे हृदय में निवास
करती हो ) ।
अलंकार—सापह्नव हेतूत्प्रेक्षा ।
१०— तिनकों-तिनसौं । १२— रंचन-चंपक । बची-रची । अनुमानत-
नमडानत ।