रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय प्रभाव ७६
अथ लज्जाप्रायारति-मुग्धा-लक्षण (दोहा)
(७०) मुग्धा लज्जाप्रायरति, बरनत कबि इहिं रीति ।
करै जु रति अति लाज सों, पतिहिं बढ़ावति प्रीति ।२४।
यथा—(सवैया)
(७१) बोली न हौं वे बुलाइ रहे हरि पाइ परे अरु ओलियौ ओड़ी ।
केसव भेंटिबे कौं भरि अंक छुड़ाइ रहे जक हौं नहिं छोड़ी ।
सूधैं चितैबै कौं केतौ कियो सिर चाँपि उठाइ अँगूठनि ठोढ़ी ।
मैं भरि चित्त तऊ चितयो न रही गड़ि नैननि लाज निगोड़ी ।२५।
शब्दार्थ—औलियौ ओड़ी = 'ओली ओड़ना' का अर्थ है—दुपट्टा या
अंचल पसारकर किसी वस्तु की भिक्षा माँगना, भीख चाहना । कैतो कियो=
अनेक उपाय किए । निगोड़ी = निरवंशी, एक प्रकार की गाली ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति सखी प्रति) हे सखी, नायक ने मुझे
बुलाना चाहा परंतु मैं (लज्जा के कारण) नहीं बोली । तब वे मेरे पैरों
पड़े और ओली ओड़ी । आलिंगन करने के लिए कहा, पर मैंने हठ नहीं
छोड़ा (अस्वीकार ही करती रही) । तब उन्होंने संमुख देखते रहने के लिए
अनेक उपाय किए । उन्होंने एक हाथ (के अँगूठे) से सिर दबाया और दूसरे
(दाहिने) हाथ के अँगूठे से ठोढ़ी दबाई (हाथ से सिर ऊपर किया पर) मैंने
उन्हें चित्त भर नहीं देखा । निगोड़ी लज्जा मेरे नेत्रों में कुछ ऐसी ही गाड़ी
बैठी थी ।
अलंकार—विशेषोक्ति ।
मुग्धाशयन-लक्षण—(दोहा)
(७२) मुग्धा सोइ रहै नहीं, पियसँग सुनहु सुजान ।
जौ क्यों हूँ सोवै सखी, सुख नहिं ताहि समान ।२६।
यथा—(सवैया)
(७३) पाइ परें मनुहारि कियें पलिका पर पाउँ धरयो भय-भीने ।
सोइ गई कहि केसव कैसहूँ कोरहिं कोरिक सौंहनि कीने ।
साहस कै मुख सों मुख छुवै छिन में हरि मानि सबै सुख लीने ।
एक उसाँसहिं के उससे सिगरेई सुगंध बिदा-करि दीने ।२७।
[ पाठान्तर—दंत०–कँ से । दाननि कौं–दांत मुख; नीको अति । हँसति–
लखति । अखरानि-आखरन । सकुचौ०-सकुचे से बैन नैन । केसोदास-केसोराइ ।
आजु-अब । देखी०–सुनी जैसी तैसो । ]
२४—कबि-हैं । बढ़ावति-बढ़ावै । २५—हौं नहिं-मैं पै न । गड़ि-गहि ।
२६—सुनहु-सुनो । २७—कियें-करें । कोरहिं०–कोरक रोर हूँ । सबै-महा ।