सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

६६ रसिकप्रिया
गोकुल की कुलटा ये यौं हीं उलटावति हैं,
आजु लौं तौ वैसेई हैं कालि की न जानियै ।८।
शब्दार्थ—हातो कियें = दूर करने से । अलोक = निंदा, कलंक ।
नीकेहूँ = भले को भी । गीत = कथित वृत्तांत । दूत-गीत = (बहुव्रीहि) दूत
का कहा (धोबी ने सीताजी पर अपयश लगाया था जिसे ‘दुर्मुख’ नामक
दूत ने राम को सुनाया था) । कैसे उर आनियै = कैसे विश्वास किया जाय ।
कुलटा = व्यभिचारिणी । उलटावति हैं = उलटा-पलटा करती रहती हैं, कुछ
का कुछ कह देती हैं ।
भावार्थ—(अंतरंग सखी की उक्ति नायिका से) तू श्रीकृष्ण सरीखे प्रेमी
के संबंध में भ्रम भूलकर भी मत कर । यदि तू उन्हें अपने हृदय से दूर करती
है तो भी प्रेम की हानि होती है । संसार में लोग भले को भी अपयश लगा
देते हैं । भला दूत ने सीताजी के संबंध में जो (कलंकवाली धोबी की) बात
कही थी उस पर कैसे विश्वास किया जा सकता है ? जो आँखों से देखी जाय
उसी को सत्य मानना चाहिए । कान से सुनी (बात) को कभी सत्य न समझना
चाहिए । ये गोकुल की कुलटाएँ इसी प्रकार बातें पलट दिया करती हैं ।
आज तक तो कृष्ण पूर्ववत् ही (निरपराध) हैं, कल की कौन (राम) जाने ।
अलंकार—काव्यलिंग, दृष्टांत ।
( ३७ ) अथ प्रकाश दक्षिण, यथा—( सवैया )
चित चोप चितैबे की तैसियै है अरु तैसियै भाँति डरात घनै ।
अरु तैसोई कोमल बोल गुपाल के मोहत हैं तिहिं भाँति मनै ।
गुन तैसोई, हास-बिलास सबै हुते तैसोई केसव कौन गनै ।
सखि तू कहै आन बधू के अधीन हैं सो परतीक किधौं सपनै । ६ ।
शब्दार्थ—चोप = चाव, इच्छा । घनै = अत्यंत । मनै = मन को ।
हुते = थे । आन = ( अन्य ) दूसरी । बधू = स्त्री । परतीक = ( प्रत्यक् )
प्रत्यक्ष, वास्तव में । सपनै = स्वप्न अर्थात् झूठ ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति बहिरंग सखी से ) हे सखी, श्रीकृष्ण में
पहले ही जैसा मुझे देखने का चित्त में चाव है और वैसे ही वे मुझसे अब भी
अत्यंत डरा करते हैं । उनकी वाणी भी वैसी ही (पूर्ववत्) कोमल है और वे
वैसे ही मेरे मन को मोहते भी हैं । उनमें वैसे ही गुण अब भी हैं और वैसे
ही (पहले के से) सब हास-विलास भी वर्तमान हैं। इन सब (बातों) को
कौन गिनाए । इसलिए तू जो यह कह रही है कि वे अब दूसरी स्त्री के वश
में हो गए हैं, यह प्रत्यक्ष सत्य है अथवा स्वप्न (झूठ) है । ( मुझे विश्वास
१—परतीक-परतीत ।