रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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तृतीय प्रभाव
अथ नायिका-जाति-वर्णन—( दोहा )
( ४७ ) प्रथम पद्मिनी चित्रिनी, जुवती जाति प्रमान ।
बहुरि संखिनी हस्तिनी, केसवदास बखान ।१।
अथ पद्मिनी-लक्षण—( दोहा )
( ४८ ) सहज सुगंध सरूप सुभ, पुन्यप्रेम सुखदानि ।
तनु तनु भोजन रोष रति, निद्रा मान बखानि ।२।
शब्दार्थ—सहज = स्वाभाविक । पुन्यप्रेम = पवित्र प्रेम । सुखदानि =
सुखदायक । तनु = दुबला, थोड़ा, सूक्ष्म । तनु = शरीर ।
( ४६ ) सलज सुबुद्धि उदार मृदु, हास बास सुचि अंग ।
अमल अलोम अनंग-भुव, पद्मिनी हाटक-रंग ।३।
शब्दार्थ—सलज = लज्जावती । वास=वस्त्र । अलोम=लोमरहित ।
अनंगभुव=काम-क्रीड़ा की भूमि । हाटक-रंग = सुवर्ण ।
पद्मिनी, यथा—( कवित्त )
( ५० ) हँसत कहत बात फूल से झरत जात,
गूढ़ भूरि हाव-भाव कोक की सी कारिका ।
पन्नगी नगी-कुमारि आसुरी सुरी निहारि,
डारौं वारि किन्नरी नरी गँवारि नारिका ।
तापै हौं कहा है जाउँ बलि जाउँ केसौदास,
रची बिधि एक ब्रजलोचन की तारिका ।
भौर से भँवत अभिलाष लाख भाँति दिब्य,
चंपे की सी कली बृषभान की कुमारिका ।४।
शब्दार्थ—भूरि = बहुत । कोक = कोकशास्त्र के रचयिता कोकदेव ।
की सी = समान । कारिका = ( कोकशास्त्र के ) नियमों के श्लोक । गूढ़० =
गूढ़ हाव-भावों के निमित्त कोक की कारिका के समान है ( कोक के सूत्रों में
जिन हाव-भावों का वर्णन है उनका मूर्तिमान् रूप है ) । पन्नगी = सर्पिणी ।
१—केसव०—केसवराइ सुजान । ३ — सलज-सहज । भुव-भू । ४—
डारौं०-वारि डारौं, डारौं नारि । गँवारि-गमारि । केसौ०-केसोराइ ।
भँवत-भ्रमत ।