रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ रसिकप्रिया
यथा—( सवैया )
(६५) मोहिबो मोहन की गति कों गतिही पढ़ी बैन कहा धौं पढ़ैगी।
ओप उरोजनि की उपजैं दिन, काइ मढ़ अँगिया न मढ़ैगी।
नैननि की गति गूढ़ चलाचल केसवदास अकास चढ़ैगी।
माई, कहाँ यह माइगी दीपति जौ दिन द्वै इहि भाँति बढ़ैगी ।१६।
शब्दार्थ—मोहन = श्रीकृष्ण और मोहन मंत्र। गति = मनोगति, मन
की चेतना। गति ही = चाल ही। बैन = ( वचन ) वाणी। ओप = कांति
( बाढ़ )। उपजैं = उत्पन्न होने पर। दिन = दिनदिन, नित्य। काइ =
काया। चलाचल = चंचल तथा स्थिर। अकास चढ़गी = (मुहावरा) सर्वोपरि
होगी। माइगी = अँटेगी।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे माई, जब 'चाल ही से यह
मोहन की चेतना को मोहित करना पढ़ चुकी है ( चाल से ही मोहन को
मोह लेती है ) तब वचनों से (बोलकर) न जाने क्या (मंत्रादि) पढ़ेगी (कैसा
जादू डाल देगी ) । कुचों में कांति ( बाढ़ ) उपजने पर काया तो स्थूल हो
जाएगी पर वे स्वयम् चोली में न अँट सकेंगे। नेत्रों की गूढ़, चंचल एवम्
अचंचल गति (यदि इसी प्रकार बढ़ती रही तो ) सर्वोपरि हो जायगी। यह
( शरीर की ) शोभा यदि दो ( कुछ ) दिनों तक इसी भाँति बढ़ती रही तो
कहाँ अँट सकेगी ? ( कहीं नहीं )।
अलंकार—अधिक ( आधेय से आधार के अधिक होने में )।
अथ नवयौवनभूषिता-मुग्धा-लक्षण— (दोहा )
(६६) सो नवजोबनभूषिता, मुग्धा को यह बेस।
बालदसा निकसै जहाँ, जोबन को परबेस ।२०।
शब्दार्थ—बेस = (वेश) रूप। बालदसा = शिशुता, लड़कपन। निकसै=
छुटे, हटे। परबेस = ( प्रवेश ) ।
यथा—( सवैया )
(६७) केसव फूलि नचीं भ्रुकुटीं कटि लूटि नितंब लई बहुकाली।
बैननि सोच सँकोच सु नैननि छूटि गई गति की चल चाली।
द्योसक धीर धरौ न धरौ अब लै तुमकों मिलिबो बनमाली।
वाको अयान निकारन कौं उर आए हैं जोबन के अखिताली ।२१।
शब्दार्थ—फूलि = प्रसन्न होकर। बहुकाली = बहुत दिनों की। संकोच =
लज्जा। चल = चंचल। द्योसक = थोड़े समय तक। बनमाली = श्रीकृष्ण
(संबोधन में)। वाकों = उस ( नायिका ) का। अयान = ( अज्ञान ) भोला-
पन। अखिताली = अख़ताली, प्रबंधक ( किसी स्थान पर पहले से जाकर
राजा के ठहरने का प्रबंध करनेवाल,,
१६—पढ़ी-पढ़ै। काइ-काहि ।