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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 286 में से

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पृष्ठ 64

६४ रसिकप्रिया
निर्वाह हो सके और जिसका कहीं किसी को कुछ पता भी न चल सके । (आपने
मेरे प्रेम के कारण जो ) आसन, वस्त्र, सुगंध और गहने छोड़ दिए हैं, यहाँ
तक तो किसी प्रकार बात बनी है पर आप जो मेरे (खिलाए ) बिना पान
नहीं खाते, हे कन्हैया यह आप मेरे साथ प्रीति कर रहे हैं या वैर ? क्योंकि
सखियाँ मेरी खिल्ली उड़ाती हैं जिससे मुझे क्लेश होता है ) ।
सूचना — इस सवैये में नायक के अनुकूलत्व वस्तु से लेशालंकार व्यंग्य है ।
(३३) अथ प्रकाश अनुकूल, यथा — ( सवैया )
केसव सूधे बिलोचन सूधी बिलोकनि कों अवलोकें सदाई ।
सूधियै बात सुनें समुझें कहि आवति सूधियै बात सुहाई ।
सूधी सी हाँसी सुधा निधि सो मुख सोधि लई बसुधा की सुधाई ।
सूधे सुभाइ सबै सजनी बस कैसैं किये अति टेढ़े कन्हाई ।५।
शब्दार्थ -- बिलोचन = ( द्विलोचन ) दोनों नेत्र । बिलोकनि = दृष्टि,
नजर । सदाई = सदैव । सुधानिधि = चंद्रमा, श्लेष से सिधाई ( सुधाई ) का
भांडार, अत्यंत सीधा । सोधि लई = खोज कर एकत्र कर ली । बसुधा =
पृथ्वी । सुधाई = सीधापन; अमृतत्व ।
भावार्थ — ( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, तेरे नेत्र सीधे हैं
और तू सीधी नजर से सदा देखती भी है । तू सीधी ही बात सुनती-समझती
है और सदैव सीधी ही बात कहती भी है । तेरी हँसी भी सीधी है और तेरा
मुख भी सुधाकर के समान है । तूने वसुधा का साग सुधातव (अमृतत्व और
स धापन) ढूँढ़-ढूँढ़कर एकत्र कर लिया है । इस प्रकार सब तरह के सीधे
स्वभाव की होकर तूने अत्यंत टेढ़े श्रीकृष्ण को कैसे अपने वश में कर लिया ?
अलंकार — श्रीकृष्ण जो सबसे टेढ़े रहते हैं वे नायिका के वश में हैं, यही
अनुकूलता है । नायक को वश में कर लेने की बात सब लोग जान गए इससे
'प्रकाश अनुकूल' है ।
(३४) अन्यच्च (सवैया)
मेरे तो नाहिन चंचल लोचन नाहिन केसव बानी सुधाई ।
जानौं न भूषन-भेद के भावनि भूलिहू मैं नहिं भौंह चढ़ाई ।
भोरेहूँ ना चितयो हरि ओर त्यों घूँरु करूँ इहिं भाँति लुगाई ।
रंचक तौ चतुराई न चित्तहि कान्ह भए बस काहे तें माई ।६।
शब्दार्थ - बानी (वाणी) = बोली । सुधाई = अमृत की भाँति, मीठी ।
५-कों-सों । सुधानिधि सो-सुधाकर से। सुभाइ-स्वभाव ।
६-नाहिन-नाहिनैं। बानी०-बानि सुहाई। भावनि०-भाव के भेदनि ।
मैं नहिं-नेनहिं; नैनन । चतुराई०-चतुराइ चित्त न । काहे०-कासु कें ।