रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ रसिकप्रिया
अथ प्रकाश शठ, यथा—( कवित्त )
(४१) काननि के रँगे रंग नैननि के डोलो संग,
नासा-अंग रसना के रसहीं समाने हौ ।
और गूढ़ कहा कहौँ मूढ़ हौ जू ? जानि जाहु,
प्रौढ़िरूढ़ केसवदास नीके करि जाने हौ ।
तन आन, मन आन, कपट-निधान कान्ह,
साँची कहौ मेरी आन काहे कौं डराने हौ ।
वे तो हैं बिकानी हाथ मेरें, हौं तिहारें हाथ,
तुम ब्रजनाथ हाथ कौन के बिकाने हौ ? ।१३।
शब्दार्थ—काननि के रँगे रंग = कानों के रंग में रँगे हुए हो अर्थात्
जिसकी प्रशंसा अपने कानों से सुनते हो उसी को देखने के लिए उतावले हो
जाते हो । नासा-अंग = नासिका के अंग में । नासा० = नासिका के अंग में या
रसना के रस में ही डूबे रहते हो । नासिका जिस नायिका की गंध की ओर
खींचती है उधर को जाते हो । जीभ जो कहने को कहती है वही कहते हो ।
गूढ़ = भेद की बात । प्रौढ़ि = ढिठाई । रूढ़ = विचार में दृढ़ । नीकें करि = भली
भाँति । आन = ( अन्य ) दूसरी बात । निधान = खजाना । आन = सौगंध,
कसम । हौं = मैं ।
भावार्थ— ( बहिरंग सखी की उक्ति नायक से ) तुम कानों के रंग में
रँगे हुए हो ( कान से जिसकी प्रशंसा सुन पाते हो उसी को देखने के लिए
उत्सुक हो जाते हो ) । तुम अपने नेत्रों के संग-संग घूमते फिरते हो ( नेत्र
जिसके रूप पर मुग्ध होते हैं, उसे देखने के लिए नेत्रों के इशारे पर घूमते
रहते हो ) । यही नहीं, नासिका जिस गंध की ओर ले जाती है उधर ही
जाते हो, जीभ जो कहलाती है वही कहते हो (नाक में जिस किसी की सुगंध
पहुँचती है, वाणी द्वारा उसी से बात करने के लिए उत्कंठित हो उठते हो)।
अधिक गूढ़ बातें और क्या कहूँ तुम नादान तो हो नहीं ( कि समझाने की
आवश्यकता पड़े, बस इतने से ही ) समझ लो कि तुम ढिठाई के रंग-ढंग में
निपुण हो और इसे लोग भली भाँति जानते भी हैं । तुम्हारे शरीर (मुख)
में कुछ और मन में कुछ (और बात) रहा करती है । कृष्ण, तुम बड़े कपटी
हो । तुमको मेरी सौगंध है, सच बताओ तुम क्यों डर रहे हो ? वे (नायिका)
तो मेरे हाथ बिकी हैं (मेरे वश में हैं) और मैं तुम्हारे हाथ बिकी हूँ (तुम्हारे
इच्छानुकूल कार्य करने को तत्पर रहती हूँ ) । पर यह तो बताओ कि हे
१३—काननि०-कान रंग रँगे नैन तिनही के डोलें संग । सयाने-सों
साने । प्रौढ़िरूढ़-प्रौढ़ि रूढ़ि ।