रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० रसिकप्रिया
इनकी शरारत के लिए कहाँ तक इनकार किया जा सकता है ये तो सब
प्रकार से छँटे हुए उपद्रवी हैं ।
अलंकार—लोकोक्ति (चतुर्थ चरण में) ।
अथ प्रकाश धृष्ट-लक्षण—(दोहा)
(४४) मनसा बाचा कर्मना, बिहँसनि चितवनि लेखि ।
चलनि चातुरी आतुरी, आठौ गाँठ बिसेषि ।१६।
शब्दार्थ—लेखि = लेखो, समझो । चलनि = चाल ।
अथ प्रकाश, धृष्ट यथा—(सवैया)
(४५) सौंह को सोचु सकोचु न पाँच को डोलत साहु भए करि चोरी ।
बैननि बंचकताई रची रति नैनन के सँग डोलत डोरी ।
लाज करै न डरै हित-हानि तें आनि अरे जिय जानिकै भोरी ।
नाहिनै केसव साख जिन्हैं बकिकै तिनसों दुखवै मुख को री ।१७।
शब्दार्थ—सौंह = सौगंध । पाँच = पंच । साहु = (साधु) सच्चे, ईमान-
दार । बैन = (वचन) वाणी । बंचकताई = धूर्तता । रति = प्रीति, अनुराग ।
डोरी = डोरियाई हुई, संग लगी हुई । आनि = आकर । अरे = अड़ गए ।
जिय जानि कै भोरी = यह जानकर कि भोली भाली हूँ (मूर्ख हूँ) । साख =
प्रमाण, एतबार । बकिकै = बकवाद करके । दुखवै = पीड़ित करे, कष्ट दे ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति बहिरंग सखी से) हे सखी, श्रीकृष्ण को
न तो सौगंध की ही परवा है और न पंच का ही कोई संकोच है । वे चोरी
करके भी साह बने फिरते हैं (दूसरी स्त्री के साथ प्रेम करके भी अपने को
निर्दोष बतलाते हैं) । उनकी बातों में धूर्तता भरी है और अनुराग नेत्रों के
साथ डोलता है (उनके नेत्रों में दूसरी स्त्रियों की प्रीति समाई हुई है) उन्हें
न तो लज्जा ही आती है न वे अपने हित की हानि से ही डरते हैं । वे मुझे
भोली भाली समझकर यहाँ पर आ डटे हैं । जिनकी बातों का कोई एतबार
नहीं उनके साथ बकवाद करके अपने मुख को कौन पीड़ा दे (उनसे बात भी
नहीं करना चाहती) ।
अलंकार—विशेषोक्ति (प्रथम चरण में) ।
(दोहा)
(४६) बरने कबि-नायक सबै, नायक इहि अनुसार ।
सब-गुन-लायक नायिका, सुनि अब बहुत प्रकार ।१८।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां
चतुर्विधनायकप्रच्छन्नप्रकाशवर्णनं नामद्वितीयः प्रभावः ।२।
१७—डोलति—डोरति । जानिकै—जानि कि । कै तिन—ऐसेनि ।
१८—बरने—बरनेहूँ ।