रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
रंगनाथ रामायण
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बालकाण्ड एवं अयोध्याकाण्ड (दक्षिण भारतीय प्रसंग सहित)
श्रीरंगनाथ रामायण
(बालकांड)
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१. देव-स्तुति
चरित रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तर ।
एकैकमक्षर प्रोक्त महापातकनाशनम् ॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे,
रघुनाथाय नाथाय सीताया पतये नम ॥
श्रीलक्ष्मीनाथ, दैत्य-विजयी, लोक-रक्षक, नित्य, सदानंद, मोक्षदायक, कर्म-रहित, सृष्टि
के स्वयंभूत आधार, हृदय-कमल में स्थित भक्ति-रूपी आनन्द को व्यक्त करने के साधन-क्रम में
तत्पर भूमर-रूपी भगवान्, गजराज को मोक्ष प्रदान करनेवाले, अपने आश्रित-लोक के वंधु,
मसार के बंधनो से मुक्ति देनेवाले, वलि को बाँधने का दृढ़ सकल्प करनेवाले, प्रणव-रूप,
गोपिकाओ के हृदय में विहार करनेवाले, अबोध-गम्य आकारवाले, निराकार, योगियो के
हृदय में ओंकार-रूप में वर्त्तमान, योगिसदर्शित, मोक्ष-प्रचारक, श्रुतियो के शिरोमणि, विशुद्ध-चैतन्य
स्वरूप, अतिलोकवासी, समस्त लोको का आश्रय, ब्रह्माण्डरूपी मुक्ता का आयतन, नित्याधार,
अखिल तत्त्वातीत, आदि-अन्त-रहित, पवित्रात्मा, अविनाशी, वेद-रूपी कमल के लिए सूर्य,
अक्षीण कल्याणो का आधार, निश्शंक मन से सद्भक्ति तथा सेवा करनेवाले भक्तो के लिए
दया-सिंधु, करुणा-सिंधु, बोधक, बोध्य तथा बोध—इन तीनो में व्यक्त होनेवाले पूर्ण-रूप,
४ रंगनाथ रामायण
आदितत्त्व, 'तत्त्वमसि' आदि कथनानुसार भेदातीत, अभेद, प्रतापी परमेश्वर का (भक्ति-युक्त
ध्यान करने के निमित्त) मैने अत्यंत धैर्य के साथ नियमो का पालन किया, कर्म के बंधनो
को ठुकराया, एकांत में रहते हुए इन्द्रिय-व्यापारो को भुला दिया, सुस्थिर होकर सुलभ-
साध्य तथा परिचित आसन (सुखासन) पर उपविष्ट हुआ, मन को भक्ति-रस-परिपूर्ण
बनाया, (शरीर के भीतर रहनेवाली) बहत्तर नाडियो का विचार करके उनका परिमार्जन किया,
एकचित्त तथा निर्मल मन से नाडियो में अत्यंत सूक्ष्म रूप से व्याप्त पवन को रोका,
मन को निश्चल बनाकर निरुद्ध प्राण-वायु को मूलाधार-चक्र में प्रविष्ट कराया और उसे
क्रमशः छह कमलो को पार कराते हुए चंद्रमंडल में पहुँचाया । वहाँ योगीन्द्रो के हृदय का
भेद परखने के लिए परम-व्योम के रूप में स्थित अनादि ब्रह्म-स्वरूपा, अत्यंत सूक्ष्म तथा
निर्मल नाडी को यूप, अविचल मन को यज्ञ-पशु, निष्ठानुरक्ति को वेदी, समस्त इन्द्रियो को
काष्ठ, ज्ञान को अखंड अग्नि तथा आनंद-योग को यज्ञ-फल के रूप में मानते हुए इच्छित-
आनंद-प्राप्ति के हेतु, कर्म के द्वारा प्राप्त होनेवाले मोक्ष रूपी परमेश्वर, अगोचर, कर्म-रहित,
हमारे देव, कमलनेत्रवाले, हमारे पालनहार, आदि नारायण तथा अखिल लोकार्थेश की
भक्ति, स्तुति, प्रार्थना एवं वंदना की । अपने मन की इच्छा पूर्ण करने के निमित्त हार,
कर्पूर, नीहार, गोक्षीर तथा तारको के सदृश उज्ज्वल शारदा देवी की उपासना की; चारु
रामायण-रूपी चंद्र के जन्म-स्थान के रूप में विलसित होनेवाले वाल्मीकि का स्मरण किया,
भारत-रूपी मंजरी के पारिजात, तत्त्ववेत्ता पराशर-पुत्र का स्मरण किया और उनके पुत्र
शुकदेव की बडी भक्ति से स्तुति करने के पश्चात् मैं अपने मन में एक ऐसे ग्रन्थ की रचना
करने का विचार करने लगा, जिसकी कथा के कथन से सभी सज्जन मेरा कीर्त्ति-गान करेंगे,
जिसकी कथा का वर्णन करने से मेरे इह-लोक और पर-लोक दोनो सफल होगे और जिस
कथा के कथन से ईप्सितार्थ सिद्ध होगे और साथ-ही-साथ पुण्य की प्राप्ति होगी ।
२. ग्रन्थ-रचना का कारण
सृष्टि के समस्त प्राणी, जिस पुण्यात्मा की प्रशंसा बडे आदर से करते हैं, जो सदा-
चार के पुण्य-फलस्वरूप सूर्य के समान उदित होकर कलिकाल का अंधकार दूर करते थे,
जो श्रेष्ठ धर्म-पथ का महत्त्व जानते थे, जिनके पवित्र तेज के समान शत्रु-रूपी नक्षत्रों के
प्रकाश मंद पड जाते थे, जिन्होंने अपने खड्ग की दीप्ति-रूपी गंगा-प्रवाह में अन्य राजाओ
के ललाट में लगे गर्व-पंक को धो दिया था, असमान बलशाली, सत्यनिष्ठ, शरणार्थी
राजा-रूपी भ्रमरो के लिए (जिनका कर-कमल) आधार था, ऐसे कोनकाट भूपति के वंश
की कीर्त्ति बढाने हुए नय, विनय, दया के आगार महाराजा के पुत्र गोनरुद्र नरेन्द्र महान
प्रतापी तथा पवित्रात्मा थे । उनके पौत्र बुद्ध भूपाल अभंग, अप्रतिम विक्रमी, कुल-गोत्र के
संवर्द्धक, देवेन्द्र के समान वैभवशाली, वीर और विख्यात थे । उनके पुत्र अक्षीण दाक्षिण्य-
वनी (अर्थात् अक्षीण कृपावाले), धन-धान्य में कुवेर, मर्म में धर्मराज (युधिष्ठिर) के समान
अति-पुण्य सौजन्य-शील, शत्रुओ के लिए अति शौर्यवान् वामदेव कार्त्तिकेय, शुभजन्मा,
कामिनियों के लिए कामदेव, अखंड विक्रमी और रण-विशारद थे । वे चंदन, मदार-चंद्रिका-
हार, कदली, कुंद, इंदु सम उज्ज्वल कीर्तिमान्, गोनवंश-रूपी पारिजात के फल-स्वरूप
[बालकांड] [५]
दीखनेवाले, गोनवंश-रूपी उदयाद्रि पर भानु-सम दीप्त होनेवाले, गोनवंश-रूपी क्षीरसागर
के (उत्पन्न) चंद्र सम सुशोभित, अपनी कीर्त्ति को दिग्-दिगंतों में व्याप्त करनेवाले, अपने
दान-धर्म के द्वारा सबकी प्रशंसा प्राप्त करनेवाले, अपने असमान पौरुष से बड़ी आसानी से
शत्रुओं का नाश करनेवाले, महा बलशाली एवं प्रतापी राजाओं के लिए वज्रपाणि सम
दीखनेवाले, (शत्रु) नृप-वन के लिए साक्षात् अग्निदेव, सत्यनिष्ठ, महाबलशाली शत्रु-सेनाओं
को मथने में मयर पर्वत की भाँति प्रचंड रूप धारण करनेवाले, अपने खड्ग-रूपी सूर्य-बिम्ब
की प्रभा से प्रतापी राजा-रूपी अंधकार का नाश करके अमर-वधुओं के मुख-कमलों को
वीर-भ्रमरों से अलंकृत करनेवाले, शत्रुओं के प्राण-रूपी अनिल का सेवन करनेवाले श्रेष्ठ
भुज-भुजंगों (सर्प-रूपी भुजाओं) पर राज्य-भार वहन करनेवाले थे, वे कुरु, केरल, अवंती,
कुंतल, द्रविड़, मरु, मत्स्य, करुष, मगध, पुलिंद, सरस, पाण्ड्य, कोसल और बर्बर की राज-
सभाओं में प्रशंसा प्राप्त करनेवाले, साम-दाम-भेद आदि नीतियों में निपुण, प्राचीन राजाओं
के समान समस्त वैभवों से युक्त तथा नय, विनय आदि उपायों से सुस्थिर विजय
प्राप्त किये हुए, यशस्वी विट्ठलनरेश, राजाओं में सर्वज्ञ, नरेशों से पूजित, सफल जगद्धित-
चातुर्य-धुरी, एक दिन अपनी राज-सभा में बैठे हुए थे। उस समय पुराणवेत्ता, शास्त्रज्ञ,
काव्य-नाटक-शिरोमणि, मित्र, मंत्री, पुरोहित, आश्रित, पुत्र, सामंत राजा और बहुश्रुत उनकी
सेवा में उपस्थित थे। राजा भूलोक के देवेन्द्र के समान बड़े उत्साह से रसिकजनों द्वारा
भारत, रामायण आदि का पाठ सुनकर बहुत प्रसन्न हुए।
तत्पश्चात् वे रसिक-शेखर (राजा) राम-कथा-सुधा से अनुरक्त हो, सभा में यों बोले—
'तेलुगु में रामायण को सुंदर ढंग से कहने की कविता-शक्ति रखनेवाले कवि इस संसार
में कौन हैं?' तब पंडितों ने उस उदात्त, यशस्वी विट्ठलनरेश से कहा--
(महाराज) आपके सुपुत्र, निपुण, पापरहित, नीति-निष्ठ, सर्वज्ञ, अनघ, शिष्ट-संपन्न,
सर्वपुराणवेत्ता, सुंदर कलाओं के मर्मज्ञ, सज्जनों को आश्रय देने में ही सुख का अनुभव
करनेवाले, कविसार्वभौम, कवि-कल्पतरु, कवि-कुल-भोज, कवीन्द्र, शत्रु-राजाओं के लिए वज्र-
पाणि, शत्रु राजा-रूपी वन के लिए प्रचण्ड पावक के समान दीखनेवाले, जिनके भयंकर
खड्ग में स्वर्गलोक तक प्रतिबिंबित है, त्रिलोक-दुर्दम, श्रेष्ठ-साधु-जन-रूपी कमलों के लिए
सूर्य, पुरुषश्रेष्ठ, आपके परम भक्त, निखिल शब्द, अर्थ, गुण आदि के ज्ञाता, महापंडित,
रामायण के मर्मज्ञ बुद्ध-नरेश (रामायण की कथा तेलुगु में कहने की) कविता-शक्ति
रखते हैं। (काव्य रचने के लिए) आप उन्हें आदेश दें।"
यह सुनकर उदात्त चरित्रवाले मेरे जनक ने मुझे बड़े स्नेह से बुलाकर यह आदेश
दिया—'रामायण की कथा पुराणों के ढंग पर तेलुगु भाषा में मेरे नाम पर लिखो कि
संसार के कवि और पंडित उसकी प्रशंसा करें।' उनके मृदु वचनों से अत्यंत हर्षित होकर
उनकी आज्ञा का पालन करने के हेतु शत्रुओं के लिए भयंकर मूर्ति, महान्, ललितसद्गुणा-
लंकारवाले, निश्चल दयालु, धन्यात्मा तथा पुण्यात्मा मेरे पिता विट्ठलनरेश के नाम पर
श्रीरामचन्द्र का चरित्र, इस ढंग से लिखूँगा कि राजा, पंडित, रसिक, सुकवि श्रेष्ठ,
गोष्ठियों में (उसे सुनकर) हर्षित होकर उसकी प्रशंसा करेंगे और जिसमें, शब्द, अर्थ, भाव,
६ रंगनाथ रामायण
गति, पद, शय्या, अर्थ-गौरव, यति, रस, कल्पना, प्रास, असमान रीतियाँ आदि होंगे और
आदि कवि वाल्मीकि की कृपा से सभी सज्जन मेरी प्रशंसा करेंगे । कथा का प्रारंभ यो है—
३. कथा का प्रारंभ
एक दिन श्रेष्ठ तपस्स्वाध्याय-निरत, महान् शीलवान् मुनिश्रेष्ठ नारद से अनघ,
तपोनिधि वाल्मीकि ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया—“हे मुने, आप कृपया बतलाइए कि इस
संसार में, श्रीमान्, क्षमाशील, पुण्यात्मा, उन्नत, नीतिज्ञ, प्राज्ञ, दुर्दम, उत्तम, जितकाय, अजेय,
ईर्ष्याहीन, संपन्न, सुव्रती, उदार और चरित्रवान् कौन है ? जिनके क्रोध से इंद्रादि देवता
डरते रहते हैं ? ऐसा व्यक्ति क्या, कभी हुआ है या आगे चलकर इस पृथ्वी पर जन्म
लेनेवाला है ?”
यह सुनकर लोकज्ञाता नारद मुनि ने अपने मन में बहुत देर तक सोच-विचार कर
कहा—“इस पृथ्वी पर श्रीविष्णु, महाराज दशरथ के यहाँ जन्मे हैं । वे नियतात्मा, अति-
शौर्यनिधि, कृपानिधि, जयी और स्वजनों की रक्षा में विचक्षण हैं । वे कम्बु-कंधर, सुदराकार,
बिम्बारुण ओष्ठ, पीन वक्ष, विशाल-नेत्र, विशाल अवतंस और आजानुबाहु हैं । वे नियतात्मा,
वेदवेदांग-कोविद वेदविद्, विवेकभूषण, सूर्य के समान तेजस्वी, समुद्र के समान गंभीर,
अमराद्रि के समान धीर और पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं । उनकी मूर्त्ति (लोगों को)
अपनी ओर आकृष्ट करती है । वे कौसल्या के आनंद-दाता, श्रीकर, दीप्तिमान्, त्रिलोक-
पावन मूर्त्ति, राम के नाम से अवतरित हुए हैं ।
राजर्षि (विश्वामित्र) के (रामचन्द्र को) माँगने तथा राजा के भेजने पर वे मुनि
के साथ गये । (उन्होंने) यज्ञ की रक्षा की, दानवी का नाश किया, राक्षसों का संहार
किया, शिला को स्त्री बनाया, शिव-धनुष को तोड़ा और सीताजी से विवाह करके बड़ी
ख्याति पाई । सीताजी के साथ अयोध्या जाते समय बड़े क्रोध से विप्र (परशुराम) ने
आकर उन्हें रोका, तो वे उनसे जूझ पड़े और उनका धनुष छीनकर उसे तोड़ डाला ।
उनके बाद सब लोगों के हृदयों को आनंद से भरते हुए वे अयोध्या पहुँचे ।
जब पिता '(राम को) युवराज बनाऊँगा'—ऐसा कहकर अयोध्या का राज देने को
उद्यत हुए, तब ढीठ मंथरा ने कैकेयी के कान भरे । कैकेयी पहले ही युद्ध में दो वर प्राप्त
कर चुकी थी । (राजा ने) राघव को कानन में भेज दिया । पिता के वचन से बँधकर,
वे सीता और लक्ष्मण के साथ वन में गये, जहाँ उन्होंने बड़े उत्साह से वनों में तपस्या
करनेवाले संयमी मुनियों की रक्षा की, खर-दूषणादि राक्षसों के सर धरों से काट डाले,
ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव से मित्रता की, एक ही बाण से वालि का संहार किया, (सीता
को पुन प्राप्त करने का) दृढ़ निश्चय करके सेतु को बाँधा तथा पापी दशकंठ के दसों
सिर काट डाले ।
उसके पश्चात् आश्रितों के कल्पवृक्ष रामचंद्र, सीता के साथ, वनचर-समूह तथा
इंद्रादि देवताओं द्वारा स्तुति किये जाते हुए और सेवा प्राप्त करते हुए, (अयोध्या) आये
और अपनी पूज्य साम्राज्य-लक्ष्मी का पालन करते हुए तथा प्रजा को सुख पहुँचाते हुए कृत-
कृत्य हुए हैं ।”
बालकांड ७
ईस प्रकार श्रीराम का चरित्र अथ से इति तक कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को
चले गये । मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि अत्यत हर्ष से अपने शिष्य भरद्वाज के साथ सज्जनता की
मूर्त्ति, अकलुष जीवन-युक्त, तमसा नदी के तट पर गये और उस नदी के जल से अपने
अनुष्ठान का पालन करते रहे । उस नदी के किनारे (पेड पर) क्रौंच पक्षियो का एक
जोडा बडे प्रेम से मिलकर बैठा था । एक व्याध ने जब उनमें से एक को मार गिराया,
तब क्रौंची शोक से विलाप करने लगी । यह देखकर न्याय और धर्म का विचार करके
मुनि उस व्याध पर क्रोध करते हुए बोले-“हे निषाद, हे पापी, इन्होने तुम्हारा क्या
बिगाडा था ? जब ये क्रौंच बडे प्रेम से मिले, तब तुमने इस प्रकार एक को क्यो मार
गिराया ? इस पाप के कारण तुम बहुत दुख प्राप्त करते हुए अनेक वर्षों तक भटकते
रहोगे ।”
इस प्रकार व्याध को शाप देकर वाल्मीकि ने अपने शिष्य भरद्वाज से छन्दोबद्ध शब्दो
में कहा-“मेरे द्वारा कहे हुए वचनो पर बार-बार विचार करने पर मालूम होता है कि
इन चार समवर्ण पक्तियो में छन्दोबद्धता है । यह बडे आश्चर्य की बात है कि ये शाप के
वाक्य अपने आप एक पद्य के रूप में प्रकट हुए है ।” तब भरद्वाज आदि शिष्य बडी भक्ति
से उस पद्य को (दुहराने) पढने लगे । अनघ वाल्मीकि अपने आश्रम को लौट आये ।
एक दिन ब्रह्मा उनके आश्रम में आये । वाल्मीकि ने उनकी अगवानी की, चरणो
पर झुककर नमस्कार किया, कुशासन पर बिठाकर उनकी पूजा की और हाथ जोडकर अपने
मुँह से निकले छन्दोबद्ध शाप-वचन उन्हें सुनाया । तब ब्रह्मा ने मुस्कुराकर कहा--“हे अनघ,
यह वाणी पद्य के रूप में आपके मुख से व्यक्त हुई है । नारद ने सारा राम-चरित मुझे
सक्षेप में कह सुनाया है । आप उसको विस्तार के साथ सुनाइए । अपने आप वह चरित्र
आपको सूझ जायेगा ।” यो कहकर ब्रह्मा चले गये ।
इस प्रकार बडी कृपापूर्वक कमलासन के वर देकर चले जाने के पश्चात् मुनि ने
निर्मल मति से ध्यान लगाकर सोचा और रघुचरित, दशरथ की कथा, रघुराम का जन्म,
राम का आचरण, ताडका-वध, उद्दण्ड राक्षसो का गर्व-भग, यज्ञ-रक्षा, गगा का महत्त्व,
गौतम की स्त्री का शाप-मोचन, धनुर्भंग, सीता-विवाह, अयोध्या जाते समय परशुराम का
क्रोध, राम के युवराज्याभिषेक की तैयारी, दुष्ट स्त्री कैकेयी के कटुवचन, अभिषेक में विघ्न,
राम-वन-गमन, राजा का शोक, दशरथ की मृत्यु, दाशरथि से गुह की भेंट, गगा पार
करना, तपोनिधि भरद्वाज से (राम की) भेंट, चित्रकूट पर्वत पर पहुँचना, भरत और राम
की भेंट और उनका पादुका प्राप्त करके लौट जाना, दण्डकवन-गमन, प्रचड विराध का वध,
पुण्यात्मा शरभग के दर्शन, मुनियो को वचन देना, अगस्त्याश्रम में पहुँचना दिव्य अस्त्रो की
प्राप्ति, मुनि के आदेशानुसार पर्ण-कुटी बनाकर निवास करना, (राम पर) मुग्ध होकर
राक्षसी (शूर्पणखा) का आना, उसके साथ वार्त्तालाप, रामानुज के द्वारा उसका नाश, उधर
रावण का बुद्धि-भ्रष्ट होना, कुटिल मारीच की मृत्यु, राक्षसराज (रावण) के द्वारा सीता-
पहरण, राम का विलाप, जटायु की मृत्यु, कबंध से भेंट, पपासरोवर को गमन, ऋष्यमूक पर्वत पर
सुग्रीव से भेंट, उससे मित्रता, वालि-सुग्रीव के वैर का कारण जानना, श्रीराम का एक साथ
८ रंगनाथ रामायण
सातो ताड़ के पेड़ो को काट देना, वालि का वध, दारा का विलाप, रविपुत्र (अंगद) का
राज्याभिषेक, माल्यवत में उस पुरुषोत्तम का वर्षा-काल बिताना, काकुत्स्थ (राम) का कोप,
कपियो का आना, अगूठी देकर (उन्हें) भेजना, वानरो के द्वारा सीता का अथक अन्वेषण,
विल का दर्शन, महेन्द्रगिरि का आरोहण, सपाती से भेंट, समुद्र को लाँघते समय बीच में
मैनाक के दर्शन, सिंहिका की वायुपुत्र से मुठभेड़ और उसकी मृत्यु, लका राक्षसी को तग
करना, उस स्त्री से लका का मार्ग जानकर लका में प्रवेश करना, अत पुर में सीता की
खोज, अशोकवन का अवलोकन, वहाँ सीताजी का संदर्शन, विश्वास दिलाने के लिए अगूठी
देकर उन्हें सान्त्वना देना, अशोकवन को उजाडना, उस समय हनुमान् का अक्षयकुमार को
मार डालना, पवनसुत का वधन में पडना, लका नगर को जलाना, मानिनी सीता का चूडा-
मणि देकर श्रीराम तथा हनुमान को उत्साहित करना, सूर्यकुलाधिप (श्रीराम) का लका
पर
बालकाण्ड ६
४. कुश-लव का रामायण-गान
कोसल-देश में सरयू नदी के किनारे, पृथिवी के ऊरु-भाग के समान अयोध्या नगर
सुशोभित था। वह बारह योजन लंबा, पाँच योजन चौड़ा था और शिल्प-निपुण मय द्वारा
निर्मित था। वह शत्रु-राजाओ की आँखो में खटकनेवाला नगर सूर्यवंशी राजाओ की राज-
धानी था। वह रत्नमय गोपुर, मणिमय तोरण, मणिमय कुट्टिम (फर्श), गवाक्ष, क्रीडा-
गृह, कृत्रक शैल (बनावटी पर्वत), पटह-नाद (नगाडे की आवाज), विशालकाय हाथी,
उत्तम घोडे, नाना प्रकार के रथ-समूह, सेना, स्वच्छ सौध, बाजार, कमनीय उपवन, सरोवर,
तालाब, बावडी ऊख के खेत, धान के खेत, गहरी खाई तथा महलों से भरा हुआ संसार-
भर में विख्यात था। उस नगर में दशरथ नामक राजा राज्य करते थे, जो धनुर्विद्या में
निपुण, साम, दाम, भेद आदि चार उपायो के ज्ञाता, (भगवान् के ऐश्वर्य आदि) षड्गुणों के
आगार, (इच्छा, ज्ञान एव क्रिया) शक्तित्रय-संधानकर्त्ता, धर्मनिरत, कृताध्वर (जिसने
यज्ञ किया है), श्रीसपन्न, धर्मशास्त्र, पुराणादि के ज्ञाता, अजनंदन, बाल्यावस्था से, नियमानुकूल
प्रजा का पालन करते रहनेवाले परमपवित्र व्यक्ति, इन्द्र के निमित्त शंबरासुर का गर्व भंग
कर इंद्र से मंदार-पुष्पों को प्राप्त करनेवाले, इन्दुमती के पुत्र और सूर्यवंश में श्रेष्ठ राजा थे ।
वे तेज, कांति, त्याग, चातुर्य, उदारता, साहस, आदि सद्गुणो के भाडार थे ।
वे उदित होते हुए सूर्य की भाँति अपने उग्र तेज से सप्त द्वीपो को दीप्त करते हुए शासन
करते थे। उस नरनाथ के तीन सौ पचास रानियाँ थीं, जिनमें विशेष कर अचल शील-
वाली कौसल्या, कुचकुभ-निर्जित परिधानवाली कैकेयी, पुण्यशीला सुमित्रा त्रयी विद्याओ
के समान थीं। इस पृथिवी पर उनके हितैषी पुरोहित वसिष्ठ आदि पुण्य संयमी थे। पुण्यात्मा
धृष्टि, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, जयंत, नीतिवेत्ता अशोक, धीमान् मंत्री सुमंत्र आदि
उनके आठ सचिव थे। सभी सचिव परस्पर मित्र और स्वामिकार्य में विचक्षण और चतुर थे।
वे परम मर्मों के उद्घाटन में निपुण थे और विचार-पूर्वक प्रजा की रक्षा करते थे।
समस्त कार्यों को सँभालनेवाले ऐसे आठ मंत्रियो से युक्त राजा दशरथ अष्टाक्षर और अष्ट-
भुजाओ से समन्वित नारायण की तरह सुशोभित थे। उनके राज्य में निर्बल, चुगलखोर,
रोगी, दरिद्र, व्यभिचारी, अनाचारी, पापी, क्रूर, नीच, जड, मूर्ख, मद, एक भी व्यक्ति नहीं था।
सारी प्रजा मणि-कुडल आदि से अलकृत, धर्मपरायण, कुलाचार-निरत, सकलशास्त्र-
पारंगत तथा विष्णु-भक्त थीं। इस प्रकार बडी कुशलता से राज्य का पालन करते और
राज्य-सुख भोगते हुए राजा दशरथ एक दिन अपने मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे।
५. पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने के लिए दशरथ का मंत्रियों से परामर्श
राजा दशरथ अपनी निस्संतान अवस्था का तथा अपनी ढलती आयु का विचार
करते हुए बहुत दुःखी हुए। उन्होंने अपने सभी श्रेष्ठ मंत्रियो को बुला भेजा और उन्हें
उचित आसन पर बैठने का आदेश देकर स्वयं भी आसन पर बैठ गये। और, उनसे इस
प्रकार कहने लगे- "मैंने बहुत दान दिये, अनेक धर्म-कार्य किये, कई यज्ञ किये और बहुत
१० रंगनाथ रामायण
सालों से जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। मैंने बड़ी कीर्त्ति पाई है। तुम्हारे जैसे स्नेही मंत्रियों
के रहते हुए मुझे किसी बात का अभाव नहीं है। पुत्र-हीन होने का एकमात्र दुःख ही
मुझे है। कुल का उद्धार करनेवाले पुत्रों के बिना कोई भी व्यक्ति पुण्य और स्वर्गलोक
की प्राप्ति नहीं कर सकता। इसलिए मेरे भी पुत्र उत्पन्न होने चाहिए। समस्त संसार
मेरी प्रशंसा करे, एतदर्थ मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा और उसके बाद पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करूँगा।
इन यज्ञों के कारण मेरा हित होगा और मैं जरूर पुत्र प्राप्त करूँगा। राजा के यों कहने
पर वे सब बड़े संभ्रमचित्त होकर मन में हर्षित हुए। उन्हें प्रसन्न देखकर राजा मन में
विचारकर बोले—
मैं अनुपम रीति से, बड़े विनय के साथ अश्वमेध यज्ञ करूँगा, जिसकी प्रशंसा देवता
भी करेंगे और पुत्रों के लिए पुत्रकामेष्टि-यज्ञ नेत्र-पर्व रीति (दर्शकों की आँखों को तृप्ति
देनेवाली रीति) से करूँगा। ऐसा कहकर उन्होंने आवश्यक प्रबन्ध करने के लिए सब लोगों
को भेजा। उसी समय अनघ वसिष्ठ आदि मुनि वहाँ आये। (राजा ने) दण्डवत की और
बड़ी श्रद्धा से उन्हें लिवा लाये और उनसे बोले—हे महान् संयमी तथा पुण्यवान् वसिष्ठ !
यथाशीघ्र आप मुझसे श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ करवाइए, जिससे मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हो।'
इस पर (मुनि बोले)—'तुम्हारे द्वारा संपन्न होनेवाले अश्वमेध यज्ञ का निर्वाह हम करेंगे।
उस श्रेष्ठ यज्ञ की महिमा का वर्णन करना क्या सहज है ? इसके अतिरिक्त पुत्र-कामेष्टि
करने से तुम धन्यात्मा पुत्रों को प्राप्त करोगे।' यह सुनकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ।
उन्होंने सबको विदा किया और रनवास में पहुँचकर सभी रानियों को यह शुभ संवाद
सुनाया। तब से वे प्रसन्नचित्त रहने लगे। एक दिन अनघ सूत (सुमंत्र) राजा के पास
आकर एकान्त में यों कहने लगे—
६. ऋष्यशृंग का वृत्तांत
सुमंत्र ने कहा—“हे महाराज, इसके पहले आपको संतान-प्राप्ति कैसे होगी, इस
सम्बन्ध में मैंने एक कथा सुनी थी। आप उसे सुनें। अंगराज के पुत्र गुणवान् रोमपाद के
राज्य में न जाने उनके किस अपराध से वर्षा नहीं हुई। अपने राज्य में कहीं भी वर्षा
न होते देख राजा बहुत दुःखी हुए। उन्होंने श्रेष्ठ मुनियों से वर्षा के निमित्त बहुत हवन
करवाये, फिर भी वर्षा नहीं हुई। तब राजा को अत्यंत दुःख से पीड़ित देखकर मुनियों ने
कहा—“हे महीपाल ! हे राजचन्द्र ! इस पृथ्वी पर वर्षा होने के लिए हम शुद्ध मन से आपको
एक उपाय बतायेंगे। हे पर्वत के समान वीर ! परहितनिरत विभांडक के पुत्र पुण्यनिधि
ऋष्यशृंग जन्म से नगर-ग्राम के सम्बन्ध में कोई ज्ञान न रखने के कारण स्त्रियों के नाम
तक से अनभिज्ञ हैं। वे तपस्वी की वृत्ति में जंगलों में रहते हैं। हे वसुधेश ! उनके यहाँ
आते ही अनावृष्टि-दोष तुरन्त दूर हो जायगा। इसपर राजा अपन मन में सोचने लगे कि
उन मुनिश्रेष्ठ को नगर में कैसे ले आ सकूँगा। उन्होंने बुद्धिमान् मंत्रियों तथा मुनियों को
बुलाकर बड़े प्रसन्न चित्त से पूछा। मुनियों तथा मंत्रियों ने भी बड़ी प्रसन्नता से उपाय
बताये, तो राजा मन ही मन बहुत हर्षित हुए। मुनियों ने कहा—“महाराज, अभी
आप कई (प्रकार के) मिष्टान्न तथा सुन्दर वस्तुएँ देकर वेश्याओं को वन में भेजिए।
बालकांड ११
वे प्रौढ कामिनियाँ सीधे वहाँ जाकर, अच्छी तरह उस मुनि के दर्शन करेंगी, उनकी महिमा
देखेंगी, उन्हें मिष्टान्न देंगी और बडे प्रेम से उनके मन को विचलित करेंगी । वे कामिनियाँ
अपनी विलास-चेष्टाओ से उनके मन को रसार्द्र बना देंगी और अपने मोहक रूप की माया
का प्रभाव डालकर यहाँ वापस आयेंगी । तब वे भी उनके पीछे-पीछे यहाँ आयेंगे ।
यो कहकर सभी मुनि चले गये । उस दिन रात्रि को राजा बहुत प्रसन्नचित्त रहे ।
सवेरे उठते ही राजा ने मुनियो का स्मरण करते हुए बडी अनुरक्ति के साथ अनुपम यौवन-
रूप-सपन्न, कामदेव के मोहन मत्र के सदृश सुन्दर तथा चतुर वेश्याओ को वन में भेजा ।
वे युवतियाँ उस मुनि के वन में गईं और उनके आश्रम के पास जा पहुँचीं । उन्होने अपनी
नाट्य-कला तथा सगीत-कला का परिचय मुनि को दिया । वे पुण्यनिधि यह न जान सके
कि वे स्त्रियाँ है, और मगीत आदि का रसास्वादन न कर सकने के कारण सोचने लगे कि
ये इस वन में रहनेवाली मदगामिनी कोई अनोखी मृगी है । एक दिन वे रमणियाँ उनके
पास पहुँच गईं । उन्होने कामिनियो को अच्छी तरह देखा, उनके कुचो का नाम पूछा, कुचो
पर डोलनेवाले हारो का उद्देश्य पूछा और कहने लगे—“मेरे सिर पर तो एक ही शृग है,
लेकिन आपके उर पर दो शृग निकल आये हैं । आपके ये वल्कल वस्त्र बडे ही कोमल हैं ।
ये अनुपम दल्कल किस पेड से प्राप्त होते है ? आपके जटाजूट मेरी जटाओ के
समान नही है, वे चमक रहे है । आपके शरीर पर मली हुई राख सुगध दे रही है ।
आपके ये वेद-नाद श्रुतिमधुर है । मैने इस वन में ऐसा दृश्य अबतक नही देखा है,
न सुना है । कही मुनियो की भी ऐसी वेष-भूषा होती है ? आप कहाँ के मुनि है ?”
उस महान् व्यक्ति को अपने जाल में फँसते देख उन स्त्रियो ने हँसते हुए कहा—
“हे मुनि, कर्ण-मधुर साम-गान करते हुए, उसके अनुसार शुद्ध रीति से पदन्यास करके
दिखाना हम जानती है । इस पृथ्वी पर हमारा कौशल जानना आपके लिए कहाँ सभव है ?”
इस तरह अपनी वचन-चातुरी से उस मुनिनाथ को भुलावा देकर उन सुदरियो ने
पूछा:-‘आप कौन है ? किनके पुत्र है ? क्यो इस वन में रहते है, बताइए ।' तब उन्होने
कहा—“मै शुद्ध कीर्त्तिमान्, पुण्यात्मा विभाडक का पुत्र हूँ । मेरा नाम ऋष्यशृग है । तप
में महान् निष्ठा रखते हुए तपस्या करने के लिए ही मै यहाँ रहता हूँ । मेरे पिताजी
भागीरथी में स्नान करने की इच्छा से योगिपुगवो के साथ गये हुए है । वे अन्य देशो में
न जाकर बडी तपस्याएँ करने हुए अमल तथा भक्तियुक्त चित्त से यही पर रहते हैं ।
आप लोगो के यहाँ आने से मै पापरहित हुआ, कृतार्थ हुआ । अपने पिताजी की कृपा से
बहुन अधिक तपश्चर्या में लीन मैं भी यही रहता हूँ । इन वनो में आप जैसे नागर लोगो
को, देखकर मुझे आश्चर्य हुआ । क्या अब हम सब आश्रम में चलें ? ”
यो कहकर उन मुनियो को (उन वार-वनिताओ को) अपने आश्रम में ले जाकर
ऋष्यशृग ने उनका आदर-सत्कार किया । उन युवतियो ने प्रसन्नता मे उन मुनि का आतिथ्य
ग्रहण करने के बाद कहा—‘हे मुनिवर, यह लीजिए, हम अपने वन मे श्रेष्ठ फल लाये हैं ।'
यो कहकर उन्होने स्वादिष्ट एव मनोहर लड्डू, पूडी और तरह-तरह के स्वादिष्ट
मिष्टान्न उन्हें दिये । मुनि उन्हें खाते जाते थे और बीच-बीच में उनके स्वाद की प्रशसा
१२ रंगनाथ रामायण
करते जाते थे । उन युवतियो की ओर देखकर बार-बार मिठाई माँगते, परवश-से होकर
हाथ फैलाते और कहते—'हे मुनिवर, मैं ने अब तक ऐसे फल कभी नहीं देखे । आपका
ही तप श्रेष्ठ तप है ।'
यह सुनकर उन युवतियो ने मुस्कुराते हुए अपनी तनुलताओ को उनके शरीर से
छुलाकर, अपने सौरभमय उच्छ्वासो से उनके धैर्य को डिगाने हुए हौले-हौले अपने
मुख-कमलो को उनके मुख से सटाया और मीठे वचन, हाव भाव, मधुर संगीत तथा मादक
दृष्टियो से उन्हें मोहित कर उनके हृदय को रसार्द्र करते हुए, अपने कुचो से कसकर
आलिंगन पाश में उन्हें परवश बनाया और फिर कहने लगी—'हे अनघ, अब हमें आज्ञा
दें कि अपने आश्रम को वापस जायँ ।' यो कहते हुए विभाडक के आगमन के भय से
पीडितं वे वहाँ मे रवाना हो गईं और उस वन के निकट ही रहने लगी । उन कमल-
लोचन रमणियो के जाने के पश्चात्, ऋष्यश्रृंग ने यह सोचते हुए कि न जाने वे फिर कब
लौट आयेंगी, सारी रात जागकर ही व्यतीत कर दी और दूसरे दिन वे उस जगह पर जा
पहुँचे, जहाँ पहले दिन उन्होने उन रमणियो को देखा था ।
७. वेश्याओं के साथ ऋष्यशृंग का रोमपाद के घर आना
पायलो का झकार करती हुई, राजहंसो की गति से वे युवतियाँ मुनि के पास आईं
और प्रफुल्ल वदन हो चारो ओर से उन्हें घेरकर कहने लगी—'हे मुनिवर, आप हमारे
वन में पधारें ।' जब उन्होने स्वीकार कर लिया, तब वे उस श्रेष्ठ मुनि के चित्त कोद्रवित
करनेवाली बातें करते हुए, अपने उपायो तथा हाव-भावो से उनको मोह-मुग्ध कर लिया
और उन्हें अग-देश में इस प्रकार ले आई, जैसे शिकारी पक्षी किसी नये शिकार को पकड-
कर ले जाते समय विस्तृत पथ के भय से उसे बचाने के लिए अपने हस्तपल्लव-रूपी
पालकी में (चंगुल में) ले जाता है । उस ऋष्यशृंग के आने ही अग-राज्य में घोर वर्षा
होने लगी और सस्य बढने लगे । राजा सकल सौभाग्य से युक्त हो सतुष्ट हुए । उन्होने
बडी भक्ति मे उस मुनि की पूजा की और अपनी पुत्री शान्ता का विवाह उनके साथ
कर दिया । वे मुनि उसी राजा के यहाँ रहते हैं । यदि दशरथ उस मुनि को अपने यहाँ
ले आकर उनसे पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करायें, तो वे (दशरथ) चार बहुश्रुत तथा महान् पुत्र
तथा समृद्धि प्राप्त करेंगे । इस प्रकार मुझमे पहले सनत्कुमार ने कहा था । इसलिए आप
उस ऋष्यशृंग मे भक्तियुक्त प्रार्थना कर उन्हें यहाँ ले आयें ।"
इस प्रकार कहकर सूत चले गये । उनके जाने के वाट मन में हर्ष तथा भक्ति
का अनुभव करते हुए चतुर दशरथ उस राजा रोमपाद के यहाँ गये और मुनिश्रेष्ठ ऋष्यशृंग
को प्रणाम करके कहा—'हे पवित्र आत्मा मुनिराज, आप मेरी विनती सुनें । मैं अपने, मन
में पुत्र प्राप्ति की इच्छा लेकर आपके यहाँ आया हूँ । आप मुझे अपनाइए ।' राजा ने
उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए इस प्रकार उनकी स्तुति की और उनसे यज्ञ का ऋत्विक्
बनने की प्रार्थना की । फिर अनुपम पालकी में उन्हें बिठाकर अयोध्या के लिए
रवाना हुए । उन्होने दूतो के द्वारा अपने नगरनिवासियो को यह आदेश भेज दिया कि नगर
इन्द्रपुरी के समान सुन्दर सजाकर रखा जाय । दूतो ने नगरनिवासियो को यह आदेश
सुनाया । उन्होंने नाना प्रकार से नगर को सजाया और जहाँ-तहाँ दुंदुभि, शंख, आदि का
तुमुल नाद करने लगे । उसी समय राजा ने भी नगर में प्रवेश किया और मंगलवाद्यों के
बजते हुए, विघ्ननाशक (ऋष्यशृंग) को शांता देवी के साथ, बड़ी चतुरता से अयोध्या में लाये ।
राजा ने ऋष्यशृंग को लाकर अन्तःपुर में ठहराया । अर्घ्य-पाद्यादि देकर विधिवत्
उनकी पूजा की और अपने को कृतार्थ मानकर प्रसन्न हुए । उसी समय कौसल्या आदि
रानियों ने राजा की आज्ञा लेकर बड़े हर्ष से शान्ता देवी को श्रेष्ठ भूषण, वस्त्र, माला
आदि देकर बहुविधि से उनका सत्कार किया ।
कुछ दिन के पश्चात् संसार के प्राणियों को आनंदित करने हुए वसन्त ऋतु आई ।
तब राजा बड़े उत्साह से ऋष्यशृंग के पास गये और बड़ी भक्ति से प्रणाम करके विनय
किया—‘हे संयमीप्रवर ! आप मुझसे यज्ञ कराके मेरा उद्धार कीजिए ।’ तब उन्होंने—
‘ऐसा ही हो,’ कहकर रविकुलोत्तम राजा दशरथ से आगे कहा—‘हे राजन्, यज्ञ के लिए
विधिवत् आवश्यक सामग्री शीघ्र मँगवाइए ।’ तब राजा ने योग्य व्यक्तियों को उन सब
वस्तुओं का संचय करने के लिए भेजा और सब सामग्री मँगवाई । (उन्होंने) सुमंत्र को
भेजकर कीर्तिमान् केकयराज, अप्रतिहत तेजस्वी काशिराज, जनक महाराज, अंगराज आदि
पुण्यचरित्र नरेशों को यज्ञ देखने के लिए सविनय आमंत्रित किया । (इसके पश्चात्)
उन्होंने सुमंत्र से कहा—‘तुम शीघ्र जाकर पुण्यवान् वेदवेदांग-पारंगत, गृहस्थ, निपुण एवं
महिमा-समन्वित ब्राह्मणों को तथा सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, महात्मा वसिष्ठ तथा वामदेव
आदि (पुरोहितों) को लिवा लाओ ।’
सुमंत्र बड़ी प्रसन्नता से गया और बड़ी श्रद्धा से उन सबको लिवा लाया । (राजा ने)
उन्हें अर्घ्य, पाद्य आदि देकर (उनका स्वागत-सत्कार किया) । वे अपने निर्मल व्रत
की निष्ठा के अनुकूल धर्मसम्मत तथा उचित वचन यों बोले—“हे मुनिश्रेष्ठ, पुत्रहीन होने
से अत्यन्त दुःखी हूँ, पुत्र-प्राप्ति की इच्छा बलवती होने के कारण मित्रों के परामर्श से
अश्वमेध यज्ञ, तथा पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करने के लिए इन ऋष्यशृंगजी
को आमंत्रित किया है । (अब) आपके अनुग्रह का प्रार्थी हूँ ।”
राजा की बातों से प्रसन्न होकर वसिष्ठ आदि तपोधन मुनियों ने कहा—“हे रवि-
कुलोत्तम, लोकहितार्थ पुत्रों को प्राप्त करने की आपकी इच्छा सर्वथा संगत है । अब अश्व
को छोड़िए । इस अश्वमेध से आपके विश्वरक्षक एवं उज्ज्वल पराक्रमी चार पुत्र होंगे ।”
इससे बहुत सन्तुष्ट होकर राजा ने यज्ञ के लिए योग्य जवनाश्व (तेज जानेवाला
घोड़ा) को चुनकर, भुवनपावन मूर्ति की पूजा करके, उस घोड़े के ललाट पर अपना
नामांकित एक पट्ट बाँधकर, एक साल तक उसे अपनी इच्छा से घूमने के लिए
छोड़ दिया । उस अश्व की रक्षा के लिए पराक्रमी सेना तथा सामंत नरेश भी भेजे । उसके
बाद वसिष्ठ आदि मुनियों की अनुमति से अनुपम शिल्पकारों को बुलाकर सरयू नदी की
उत्तर दिशा में वेद-विधि के अनुसार एक यज्ञ-शाला का निर्माण करने के लिए भेजा
और सभी देश के राजाओं तथा उन देशों में निवास करनेवाले विप्र, क्षत्रिय, वैश्य तथा
शूद्रों को भी आमंत्रित किया ।
१४ रंगनाथ रामायण
इतने में एक वर्ष पूरा हुआ और मधुमास आया। तब राजा ने चिर तपोनिधि
ऋष्यशृंग की अनुमति तथा गुरु की आज्ञा लेकर एक अच्छे मुहूर्त में बड़े उत्साह से शान्ता
तथा ऋष्यशृंग के साथ, यज्ञोपकरणों तथा हवन-कुंड से युक्त, इक्कीस सुन्दर यूपों से
शोभायमान, श्रौतधर्म-क्रियाचार-विहित, मायाप्रवीण, राक्षसों से रहित तथा समस्त पाप-
रहित यज्ञ-शाला में प्रवेश किया।
८. दशरथ का यज्ञ-दीक्षा लेना
यज्ञाश्व के आने ही, यज्ञ-दीक्षा ग्रहण कर, यतिबुद्धि प्राप्त करके, वसिष्ठ आदि
श्रेष्ठ मुनिजनों को ऋत्विकों के रूप में वरण कर, अपनी इच्छा से सवनत्रय को पूरा करके,
विमल यूपकाष्ठों में बँधे हुए जलचर, वनचर, विहग, उरग आदि तीन सौ पशुओं तथा
प्रख्यात यज्ञाश्व का वध करके श्रुतियों में जिन-जिन मंत्रों के साथ, जिन-जिन आहुतियों को
देने की विधि बताई गई है, उन मंत्रों के साथ ऋत्विकों ने उन आहुतियों का हवन
किया। अग्निदेव सप्त-जिह्वाओं से प्रज्वलित हुए। देवता उन आहुतियों से तृप्त हुए।
उस यज्ञ के दिनों में न कोई भूखा रहा, न कोई संतप्त रह गया। सभी मिष्टान्न, वस्त्र
स्वर्ण, मणिभूषण आदि से संतृप्त किये गये।
जब किसी भी विघ्न के बिना यज्ञ समाप्त हुआ, तब ज्योतिष्टोम, विश्वजित् आदि
महान् यज्ञ-क्रियाओं को सांग रूप से पूरा किया और यज्ञ-दक्षिणा के रूप में अध्वर्यु (यज्ञ-
करानेवाले चार ऋत्विकों में से एक) को (अपने राज्य का) दक्षिण का भाग, होता को
पश्चिम का भाग तथा उद्गाता को उत्तर का भाग दिया। अयोध्या को छोड़ बाक़ी सभी
देशों को (दान में) दे दिया, जिससे ऋत्विक् प्रसन्न होकर कहने लगे—"कब हम आपके
दिये हुए राज्य का शासन करें और कब अपने अनुष्ठान का पालन करें। हम कहाँ और
देश का शासन कहाँ ? हे राजन्, आप हमें इस राज्य का मूल्य दे दें।" तब राजा ने
दस करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ, सोने की चौगुनी चाँदी और एक लाख गायें उन्हें दीं। ऋष्यशृंग
आदि ऋत्विक् उस धन को आपस में बाँटकर संतुष्ट हुए। उस विमल यज्ञ-कर्म में
प्रवृत्त परिचारकों को राजा ने एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ दीं। माँगनेवालों को श्रेष्ठ आभूषण दिये।
जिसने जो कुछ माँगा, राजा ने प्रेम से उसे वह दे दिया। उन्होंने सभी ब्राह्मणों
को भक्ति से प्रणाम किया और क्रमशः उनके आशीर्वाद पाते हुए उन्हें दिव्य वस्त्राभरण
देकर अकलंक चित्त से यज्ञांत स्नान किया। (उधर) ऋष्यशृंग के द्वारा कराये गये पुत्र-
कामेष्टि यज्ञ में आकर क्रमशः अपने-अपने यज्ञ-भाग प्राप्त करनेवाले देवता रावण के सम्बन्ध
में अपने मन में विचार करने लगे।
९. रावण के अत्याचारों के बारे में ब्रह्मा से देवताओं की शिकायत
ब्रह्मा के पास पहुँचकर (देवताओं ने) उनको प्रणाम किया और यों विनती की—
"हे प्रभो ! आपके वर की शक्ति से दशकन्धर, पुण्यात्मा आचार्यों ब्रह्मर्षियों, देवताओं तथा
मुनियों को दुःख दे रहा है। हे कमलासन ! हमारा खयाल है कि आपके वर की प्रचण्ड
शक्ति के कारण ही हम उसको जीत नहीं सकते। वह देवताओं के साथ इन्द्र को भी
पकड़कर उनका अपमान करता है और उन्हें दुःख देता रहता है। (अपने) भुजबल के दर्प से
बालकांड १५
वह गंधर्व, यक्ष आदि देवगणो, मुनियो तथा साधुओ को पकड़कर कष्ट दे रहा है ।
सभी कुल-पर्वत उसके नाम से डरते है । सूर्य भी ताप फैलाने से डरता है । वह जिस
नगर में रहता है, वहाँ पवन भी अपनी पूरी शक्ति के साथ चलने से डरता है । उसके
अतिशय प्रताप से डरकर समुद्र अच्छी तरह गर्जन नही कर पाता है । दीख पड़ने पर हमें
भी दुख देता है । ऐसे पापी दशकंधर का अन्त करने का उपाय आपको सोचना चाहिए ।"
तब ब्रह्मा ने उन सारी बातो को हृदयगम करके देवताओ से कहा--" (रावण)
अमरो के हाथ नही मरेगा, राक्षसो से नष्ट नही होगा, गधर्वो से मिटेगा नही, रजनीचरो
से समाप्त नही होगा, भुजगो से मारा नही जायगा, यक्षो से हत नही होगा, पक्षिसमूह से
पराजित नही होगा । मेरे वर देते समय उसने नरो का नाम नही लिया था, इसलिए
वह नरो से ही मरेगा । स्पष्ट सुनो, हिरण्यकशिपु जब सारे संसार को दुख देता था, तब
नारायण ने स्वय नरसिंह का रूप धारण कर उसे चीर डाला था । उसी ने अब विश्रवसु
के यहाँ जन्म लिया है । इसलिए नारायण ही अब इसका नाश करेंगे । अब हमें उस विष्णु
से अभयदान के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।"
ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर सभी लोग तुरन्त क्षीर समुद्र के निकट गये और
अच्युत को देखकर पवित्र हृदय से उनकी स्तुति की । हाथ जोडकर बड़ी भक्ति से प्रणाम
किया और विष्णु से इस प्रकार विनती की ।
१०. देवताओं का विष्णु की स्तुति करना
हे त्रिलोकीनाथ, कमलालय-वक्ष, वसुमत्तिरक्षक, वनजाक्ष, आपके अतिरिक्त हमारा
कोई (सहायक) नही, यह सत्य हे । हे गोविन्द, परिपूर्णगुण चिदानन्द, हे देव, जगन्मय,
देवाधिदेव, देवो के रक्षक, दिव्यावतार, अमृतसागर में पहले आपकी शरण में आये हुए हमें
(आपने) अपना अभयदान दिया था । हे दानवदलन, आपके भुजवल-विक्रम से ही समस्त
लोको की रक्षा होती है । हे भक्तवत्सल, भक्तियोग को छोड़ अन्य उपायो से आपको
पहचानना असंभव है । हे मधुसूदन, मन में आपका ध्यान करनेवालो को क्या कभी कोई
विपदा सता सकती है ? जगत् की सृष्टि, स्थिति, लय आदि आपकी लीलामात्र है ।
समस्त लोक आपकी माया का आधार लेकर ही आपका महनीय तनु धारण करते है ।
हे शेषशायी, आपका वैभव तथा आपकी महिमा अवाङ्मानसगोचर है । हे शरणागत
रक्षक, हे लोकेश, हम आपकी शरण में आये है । हम शरणार्थियो की रक्षा आपको करनी
ही चाहिए । आप त्रिलोक-कटक रावण का वध करके हमारी रक्षा कीजिए । हे लोकैक-
स्तुत्य, बिना विलंब हमारा कार्य सपन्न कीजिए और यश पाइए । निर्मलचित्त, निश्चलव्रती,
धर्मात्मा, उत्तमगुण-समन्वित, राजा दशरथ अश्वमेध यज्ञ पूरा करके पवित्र मन से युक्त
हुए है । उस काकुत्स्थ-वंशी (राजा दशरथ) की स्त्रियो का विचार करें, तो कोई भी स्त्री
उनकी बराबरी नही कर सकती । हे कमलगर्भ, आप अपने चारो अंशो के साथ नर के
रूप में जन्म लीजिए । वर के प्रताप से जो देवताओ के लिए अवध्य है, जो लोकत्रासक है
जिस पापी ने गंधर्व एव किन्नरो का वध किया है, हे पुण्डरीक, ऐसे दशकंधर का वध
करके यज्ञ-संपादन कराइए और संयम-धनी पुरुषो की तथा संसार की रक्षा कीजिए ।"
१६ रंगनाथ रामायण
इस प्रकार विनती करनेवाले देवताओ को देखकर वनजाक्ष (विष्णु) ने घन-गर्जन
के समान गंभीर ध्वनि में कहा—"हे देवताओ, तुम लोग सुखी होओ। मैं मर्त्यलोक में
अवतार लूँगा और उसके पश्चात् दशकंधर का बंधु, मित्र, अमात्य, पौत्र तथा बहुओ के
साथ नाश करके, ग्यारह हजार वर्ष तक नियमानुकूल इस पृथ्वी का पालन करूँगा। ब्रह्मा
के वर से ही राक्षसेन्द्र इस अवनीतल पर जीवित है।" यों कहते हुए असुरारि (विष्णु)
ब्रह्मा तथा देवताओ को विदा करके चले गये।
११. दशरथ को यज्ञ-पुरुष का पायस देना
उधर विमल हवनाग्नि से नीले अंगवाले, अरुणावरधारी, सूर्य के समान तेजस्वी,
महान् विक्रमी तथा पुण्यात्मा एक दिव्य मूर्ति अपने हाथ में पायस (खीर) से भरे एक
स्वर्ण-पात्र को लिये बाहर आये। उन्हें देख राजा अद्भुत आश्चर्य में पड गये और विनय
के साथ उठकर खडे हो गये। राजा को देखकर (यज्ञ-पुरुष ने) कहा—"राजन्, मैं यज्ञ-
पुरुष हूँ। तुम्हें पुत्र-दान देने की इच्छा से आया हूँ। इस पायस को ग्रहण कर भक्ति के
के साथ अपनी रानियो को दो।" इसपर राजा ने बड़ी भक्ति के साथ उनकी पूजा की
और पायस यों ग्रहण किया, जैसे शचीपति ने सुधा-कलश ग्रहण किया था। अग्निदेव
के अन्तर्द्धान होने के बाद राजा अन्त पुर में गये, तो रानियो ने बड़े आनन्द से उनका
स्वागत किया। (राजा ने) देवताओ से बनाये गये उस पायस का आधा भाग कौसल्या
को दिया, शेष आधे का आधा सुमित्रा को दिया, बचे हुए भाग का आधा कैकेयी को और
शेष पुनः प्रसन्नता से सुमित्रा को दिया।
उस पायस को भक्ति से ग्रहण करने के बाद रानियाँ गर्भवती हुईं। उन्हें देखकर
राजा आनन्द-मग्न दिखाई देने लगे। निदान, राजा ने ऋष्यशृंग आदि मुनियो तथा अन्य
राजाओ को बड़े आदर-सत्कार के साथ विदा किया और रानियों के साथ परम अनुरागयुक्त
हो नगर में लौट आये।
१२. देवताओं को वानरों के रूप में जन्म लेने के लिए ब्रह्मा की सलाह
अपना-अपना यज्ञ-भाग लेकर जब देवता अपने लोक को जाने लगे, तब ब्रह्मा ने
इन्द्रादि देवताओ को देखकर कहा—"लोकरक्षणार्थ विष्णु इस पृथ्वी पर अवतार ले रहे हैं।
इसलिए तुम्हें भी उनकी सहायता के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इसलिए तुम लोग
लोकहितार्थी शक्तिमान्, पराक्रमी, बल तथा पराक्रम में अपने समान शक्तिमान् कई वानरों को,
किन्नर, गंधर्व, खेचर, यक्ष, पन्नग, अमर, तथा सिद्ध स्त्रियो (के गर्भ) से उत्पन्न करो।
मैं अत्यन्त बलनिधि जाम्बवान् को पहले ही जन्म दे चुका हूँ। मेरे जँभाई लेने समय उसने
जन्म लिया है। वह चिरजीवी है।"
इस तरह ब्रह्मा का आदेश पाकर देवता लोग प्रसन्न हुए। इन्द्र ने वालि को,
अग्नि ने नील को, सूर्य ने सुग्रीव को, बृहस्पति ने तार को, वरुण ने सुषेण को, कुवेर ने
गंधमादन को, विश्वकर्मा ने नल को, अश्विनीकुमारो ने द्विविद-मैंद को, पर्जन्य ने शरभ
को और वायुदेव ने हनुमान् को इस पृथ्वी पर जन्म दिया। अन्य देवताओ ने भी अपने-
अपने तेज से अमित पराक्रमी तथा श्रेष्ठ वानरों को जन्म दिया। वे (सभी) वानर जगत् के
बालकांड ९७
ओप्त वपु, दावाग्नि-तुल्य विक्रमी, आकार तथा शक्ति में पर्वत की समानता करनेवाले,
बड़े साहसी, कामरूपी, समुद्रो को भी पार करनेवाले, पहाड़ो को भी उखाड़ फेंकनेवाले,
नख और दाँतो में अमित शक्ति रखनेवाले, अलौकिक शक्तिवाली तथा पृथ्वी को भी चीर
डालनेवाली क्षमता रखनेवाले थे । ऐसे होने पर भी, आश्चर्य ! उनमें कुछ लोग सुग्रीव
की, कुछ हनुमान् की, कुछ नील की, और कुछ मेदकुमुद की सेवा करते थे । वे सर्वत्र
सिद्ध होते हुए अपना शौर्य प्रकट करते हुए, मलय, दर्दुर, गंधमादन, तथा विंध्य पर्वत एव
काननो और बहुत-से जल-नद-नदी प्रान्तो में बड़े आनन्द के साथ विचरण करते थे ।
उस महिमायुक्त पायस के प्रभाव से राजा की कुलवधुओ ने गर्भ धारण किया ।
गर्भधारण के समय से (उनकी) क्षीण कटियाँ पुष्ट होने लगी । अमृतमय भोजन की रुचि
लगातार कम होने लगी । सुन्दर देह की कान्ति पाँडु रंग धारण करने लगी, मानो ये
सभी रावण की साम्राज्य-लक्ष्मी की नाक में कालिख लगानेवाले चिह्न हो । उनके कुचाग्र
(इस प्रकार) काले होने लगे, मानो अनपत्यता-दोष (शरीर से) बाहर निकल रहा हो ।
कपोल पतले हो गये । दोहद (मचली आदि) दीखने लगे । नाभियाँ उभरने लगी,
त्रिवलियो की रेखाएँ मिट गई और (अनेक प्रकार की चीजो को पाने की) इच्छाएँ उत्पन्न
होने लगी । धीरे-धीरे नौ महीने पूरे हुए ।
१३. श्रीराम आदि का जन्म
प्रशंसनीय मधुमास के श्रेष्ठ शुक्ल पक्ष में, पूर्ण नवमी तिथि, बुधवार, पुनर्वसु नक्षत्र
में मध्याह्न के समय ग्रह-पंचको के उच्च स्थिति में रहते समय, गुरु और चन्द्र का योग
रहते हुए, ललित कर्क लग्न में, सर्वलोकाधार, जगदेकवीर, इंद्रादि देवताओ से स्तुत्य, दिव्य
लक्षणो से देदीप्यमान, अव्यय, असमान, आर्त्त-त्राण-परायण, भव्य, चिदानन्द, परम कल्याण-
मूर्त्ति, देवताओ के रक्षक, दीनात्तिर्हरण, गुणो से अलंकृत, महान् कीर्त्तिवान्, शेषशायी, श्रीपति,
हृषीकेश, उस कमल-गर्भ (विष्णु) के अद्धांश के रूप में, काकुत्स्थवणी श्रीराम कौसल्या
के गर्भ से उत्पन्न हुए । जिस प्रकार अदिति ने इन्द्र को और प्राच्य-मती ने चन्द्र को जन्म
दिया था, वैसे ही पुण्य-नक्षत्र युक्त मीन लग्न में कैकेयी ने भरत को जन्म दिया । स्तुत्य
आश्लेषा नक्षत्र-युक्त कर्क लग्न में कमलदललोचनी सुमित्रा ने समान-चरित्रवाले लक्ष्मण
तथा शत्रुघ्न को जन्म दिया । देव-दुंदुभियो से सारा आकाश गूंजने लगा, देवस्त्रियाँ नृत्य
करने लगी, पुष्पो की अत्यधिक वृष्टि होने लगी, ब्रह्मादि देवता परितुष्ट हुए, अयोध्या में
छोटे-बड़े सभी निवासी उत्सव मनाने लगे ।
तब दशरथ ने पुण्यात्मा वसिष्ठ को बुलाकर (बालको का) जातकर्म आदि करवाया।
फिर, पुत्र-जन्मोत्सव ऐसा मनाया कि देवताओ तथा पुरजनो का नेत्रोत्सव हो गया । जात-
शौच समाप्त होने के पश्चात् एक पुण्य दिन को राजा ने उन वंशोद्धारक पुत्रो का नाम-
करण-संस्कार करने की प्रार्थना वसिष्ठ से की । उन्होने अपने मन में विचार करके कहा
कि 'रम्', अर्थात् 'क्रीडा' नामक धातु से 'रमयति' अर्थ देनेवाला 'राम' नाम से कौसल्या-
सुत अभिहित होगा । कैकेयी का पुत्र महान् बलशाली, सुकुमार शरीरवाला तथा सुकीर्त्ति-
वान् है, इसलिए वह भरत के नाम से विख्यात होगा । विचार करके देखने से सुमित्रा के
३
१८ रंगनाथ रामायण
पुत्र सुन्दर तथा श्रेष्ठ गुणो से युक्त है, इसलिए उनके लिए लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न नाम
उचित होगे । (राजा ने) उन लक्ष्मी-समन्वित (राजकुमारो को) राम, भरत, लक्ष्मण तथा
शत्रुघ्न जैसे सुन्दर नाम देकर नामकरण-सस्कार सम्पन्न किया और अपरिमित धन
दान में दिया ।
१४. श्रीरामादि का वचपन
वे (वालक) माताओ तथा धाइयो के स्नेह तथा ममता-युक्त पालन-पोषण में
(फलस्वरूप) बढने लगे । (वे) भोली-भाली हँसी के साथ आँखें खोलने लगे । धीरे-धीरे
अटपटाकर चलते हुए अपनी तोतली बोली से सबको आनन्द पहुँचाने लगे । उनकी लटो में
(पिरोई गई) मोती तथा मणियों की लड़ियाँ कपोलो तक फैली थी । उनके भाल (रूपी)
इन्दु पर अशोक के पत्ते के समान एक माँगटीका डोल रहा था । मणिखचित बहुत सुन्दर
बघनखा की श्रेष्ठ कान्ति उनके हृदय पर विराज रही थी । शरीर पर जहाँ-तहाँ मरकत
मणियो के आभरण शोभा दे रहे थे, कटि को करधनी से घूँघरू के शब्द हो रहे थे तथा
घुँघरूदार नूपुर पैरो में ध्वनि कर रहे थे । वे राजा के सामने हँसते हुए अपनी वालक्रीडाएँ
करते और उन्हें अपनी मोहनाकृति से मुग्ध कर देते थे । वे चारो (कुमार) धीरे-धीरे
वढने लगे और समान रूप से उनका मानसिक विकास होने लगा ।
वे दशरथात्मज आपस में जोड़ियाँ बना लेते । रमणीय आकृतिवाले राम और लक्ष्मण
की एक जोडी बनती और भरत-शत्रुघ्न की दूसरी जोड़ी बनती । उनके चूड़ाकरण
तथा यज्ञोपवीत-सस्कार कराये गये और वे सुन्दर (राजकुमार) तरह-तरह के खेलो में
मग्न रहने लगे ।
एक वार रघुराम अपने मित्रो के साथ वडे प्रेम से (अपने-अपने) गुइयाँ चुनकर,
गेंद तथा डडा लिये फुर्ती से खेल रहे थे । उसी समय कैकेयी की दासी मथरा वेग से
वहाँ आई और कौतुक से गेंद को रोक लिया । इस पर राम ने वडे क्रोध से डडे से
उसपर प्रहार किया, जिससे तुरन्त उसकी टाँग टूट गई । (इसके पश्चात् भी) श्रीराम
को अधिक उत्साह से खेलते हुए देखकर उनपर क्रुद्ध हो, लँगडी टाँग से वह कैकेयी के
महल में गई और सारा वृत्तान्त कह सुनाया । कैकेयी ने तुरन्त यह समाचार दशरथ को
सुनाया । सारी बातें जानकर राजा ने वसिष्ठजी को अयोध्या में बुलवाकर उन्हें भक्ति से
प्रणाम किया और कहा—'हे श्रेष्ठ मुनिचन्द्र, आप इन बालको को वेदादि समस्त विद्याएँ
सिखायें ।' यह कहकर राजा ने वालको को वसिष्ठ को सौंप दिया । उस मुनीश्वर ने भी
वैसा ही किया । राजकुमारो ने उस सयमी मुनि की कृपा से हाथी-घोडे की सवारी, रथ-
सचालन आदि की क्रियाएँ सीख लीं । समस्त वेदो, शास्त्रो और शस्त्रास्त्रो के प्रयोग भी
सीख लिये । उनमें श्रीराम तो विष्णुदेव ही थे । इसलिए अपार शौर्य, विवेक तथा सद्-
गुणो में सबसे श्रेष्ठ थे ।
१५. विश्वामित्र का आगमन
(राजा) अपने पुत्रो के विवाह की बात सोच रहे थे कि (एक दिन) विश्वामित्र
मुनि आ पहुँचे । द्वारपाल ने आकर महाराज दशरथ से निवेदन किया—'देव, विश्वामित्र