सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

वृहत् संगठन 89
को डाकू बताकर फाँसी और काले पानी की सज़ाएँ दी गई हैं। किन्तु हम
समझते हैं कि वकील और डाक्टर हमसे कहीं बड़े डाकू हैं। वकील-डॉक्टर दिन
दहाड़े बड़े-बड़े ताल्लुकेदारों की जायदादें लूटकर खा गए। वकीलों के चाटे हुए
अवध के ताल्लुकेदारों को ढूँढे रास्ता भी दिखाई नहीं देता और वकीलों की ऊँची
अट्टालिकाएँ (भवन) उन पर खिलखिला कर हँस रही हैं। इसी प्रकार लखनऊ में
डॉक्टरों के भी ऊँचे-ऊँचे महल बन गए। किंतु राज्य में दिन के डाकुओं की
प्रतिष्ठा है। अन्यथा रात के साधारण डाकुओं और दिन के इन डाकुओं (वकीलों
तथा डॉक्टरों) में कोई भेद नहीं, दोनों अपने-अपने मतलब के लिए बुद्धि की
कुशलता से प्रजा का धन लूटते हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से हम लोगों के कार्य का बहुत बड़ा मूल्य है। जिस प्रकार
भी हो, यह तो मानना ही पड़ेगा कि गिरी हुई अवस्था (दशा) में भी, भारतवासी
युवकों के हृदय में स्वाधीन होने के भाव विराजमान हैं। वे स्वतंत्र होने की
यथाशक्ति चेष्टा भी करते हैं। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल होतीं तो यही इने-गिने
नवयुवक अपने प्रयत्नों से संसार को चकित कर देते। उस समय भारतवासियों को
भी फ्रांसीसियों की भाँति कहने का सौभाग्य प्राप्त होता जोकि उस जाति के
नवयुवकों ने फ्रांसीसी प्रजातंत्र की स्थापना करते हुए कहा था: The monument
so raised, may serve as a lesson to the oppressors and an instance
to the oppressed. '
अर्थात स्वाधीनता का जो स्मारक निर्माण किया गया है वह अत्याचारियों के
लिए सबक का कार्य करे और अत्याचार-पीड़ितों के लिए उदाहरण बने।
भारत के इतिहास में हमारे प्रयत्नों का उल्लेख करना ही पड़ेगा, किन्तु इसमें भी
कोई संदेह नहीं है कि भारत की राजनैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक किसी प्रकार
की परिस्थिति इस क्रांतिकारी आंदोलन के पक्ष में नहीं है। इसका कारण यही है कि
भारतवासियों में शिक्षा का अभाव है। वे साधारण से साधारण सामाजिक उन्नति
करने में भी असमर्थ हैं। फिर राजनैतिक क्रांति की बात कौन कहे? राजनैतिक क्रांति

90 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
के लिए सर्वप्रथम क्रांतिकारियों का संगठन ऐसा होना चाहिए कि अनेक विघ्न तथा
बाधाओं के उपस्थित होने पर भी संगठन में किसी प्रकार की त्रुटि न आए। सब
कार्य यथावत चलते रहें। कार्यकर्त्ता इतने योग्य तथा पर्याप्त संख्या में होने चाहिए
कि एक की अनुपस्थिति में दूसरा स्थान-पूर्ति के लिए सदा उद्यत रहे। भारत में कई
बार कितने ही षड्यंत्रों का भंडा फूट गया और सब किया कराया काम चौपट हो
गया। जब क्रांतिकारी दलों की यह अवस्था है तो फिर क्रांति के लिए उद्योग कौन
करे? देशवासी इतने शिक्षित हों कि वे वर्तमान सरकार की नीति को समझकर अपने
हानि-लाभ को जानने में समर्थ हो सकें। वे यह भी पूर्णतया समझते हों कि वर्तमान
सरकार को हटाना आवश्यक है या नहीं। साथ-ही-साथ उनमें इतनी बुद्धि भी होनी
चाहिए कि किस रीति से सरकार को हटाया जा सकता है। क्रांतिकारी दल क्या है?
वह क्या करना चाहता है? क्यों करना चाहता है? इन सारी बातों को जनता की
अधिक संख्या समझ सके, क्रांतिकारियों के साथ जनता की पूर्ण सहानुभूति हो, तब
कहीं क्रांतिकारी दल को देश में पैर रखने का स्थान मिल सकता है। यह तो
क्रांतिकारी दल की स्थापना की प्रारंभिक बातें हैं। रह गई क्रांति, सो वह तो बहुत दूर
की बात है।
क्रांति का नाम ही बड़ा भयंकर है। प्रत्येक प्रकार की क्रांति विपक्षियों को
भयभीत कर देती है। जहाँ पर रात्रि होती है तो दिन का आगमन जान
निशिचरों को दुख होता है। ठंडे जलवायु में रहने वाले पशु-पक्षी गर्मी के आने पर
उस देश को भी त्याग देते हैं। फिर राजनैतिक क्रांति तो बड़ी भयावनी होती है।
मनुष्य अभ्यासों का समूह है। अभ्यासों के अनुसार ही उसकी प्रकृति बन जाती
है। उसके विपरीत जिस समय कोई बाधा उपस्थित होती है, तो उनको भय प्रतीत
होता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक सरकार के सहायक अमीर और जमींदार होते हैं
ये लोग कभी नहीं चाहते कि उनके ऐशो-आराम में किसी प्रकार की बाधा
पड़े। इसलिए वे हमेशा क्रांतिकारी आंदोलन को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं।
यदि किसी प्रकार दूसरे देशों की सहायता लेकर, समय पाकर क्रांतिकारी दल

बृहत् संगठन 91
क्रांति के उद्योग में सफल हो जाए, देश में क्रांति हो जाए तो भी योग्य नेता न
होने से अराजकता फैलकर व्यर्थ की नरहत्या होती है, और उस प्रयत्न में अनेक
सुयोग्य वीरों तथा विद्वानों का नाश हो जाता है।
इसका ज्वलंत उदाहरण सन् 1857 ई. का गदर है। यदि फ्रांस तथा
अमरीका की भाँति क्रांति द्वारा राजतंत्र को पलटकर प्रजातंत्र स्थापित भी कर
लिया जाए तो बड़े-बड़े धनी पुरुष अपने धन, बल से सब प्रकार के अधिकारों
को दबा बैठते हैं। कार्यकारिणी समितियों में बड़े-बड़े अधिकार धनियों को होते
हैं। देश के शासन में धनियों का मत ही उच्च आदर पाता है। धन-बल से देश
के समाचार-पत्रों, कल-कारखानों तथा खानों पर उनका ही अधिकार हो जाता
है। मजबूरन जनता की अधिक संख्या धनिकों का समर्थन करने को बाध्य हो
जाती है। जो दिमाग वाले होते हैं, वे भी समय पाकर बुद्धिबल से जनता की खरी
कमाई से प्राप्त किए अधिकारों को हड़प कर बैठते हैं। स्वार्थ के वशीभूत होकर
वे श्रमजीवियों तथा कृषकों को उन्नति का अवसर नहीं देते। अंत में ये लोग भी
धनिकों के पक्षपाती होकर राजतंत्र के स्थान में धनिकतंत्र की ही स्थापना करते
हैं। रूसी क्रांति के पश्चात यही हुआ था। रूस के क्रांतिकारी इस बात को
पहले से ही जानते थे। अतएव उन्होंने राज्य-सत्ता के विरुद्ध युद्ध करके
राजतंत्र की समाप्ति की। इसके बाद जैसे ही धनी तथा बुद्धिजीवियों ने रोड़ा
अटकाना चाहा कि उसी समय उनसे भी युद्ध करके उन्होंने वास्तविक प्रजातंत्र
की स्थापना की।
अब विचारने की बात यह है कि भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के
समर्थक कौन-कौन से साधन मौजूद हैं? पूर्व पृष्ठों में मैंने अपने अनुभवों का
उल्लेख करके दिखला दिया है कि समिति के सदस्यों की उदर-पूर्ति तक के लिए
कितना कष्ट उठाना पड़ा। प्राणार्पण से चेष्टा करने पर भी असहयोग आंदोलन के
पश्चात कुछ थोड़े-से ही गिने-चुने युवक युक्त प्रांत में ऐसे मिल सके, जो
क्रांतिकारी आंदोलन का समर्थन करके सहायता देने को उद्यत हुए। इन गिने-चुने

92 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
व्यक्तियों में भी हार्दिक सहानुभूति रखने वाले, अपनी जान पर खेल जाने वाले,
कितने थे, उसका कहना ही क्या है। कैसी बड़ी-बड़ी आशाएँ बँधाकर इन
व्यक्तियों को क्रांतिकारी समिति का सदस्य बनाया गया था, और इस अवस्था में,
जबकि असहयोगियों ने सरकार की ओर से घृणा उत्पन्न कराने में कोई कसर न
छोड़ी थी, खुले रूप में राज्यद्रोही बातों का पूर्ण प्रचार किया था। इस पर भी
बोल्शेविक सहायता की आशाएँ बँधा-बँधा कर तथा क्रांतिकारियों के ऊँचे-ऊँचे
आदर्शों तथा बलिदानों का उदाहरण दे-देकर प्रोत्साहन दिया जाता था। नवयुवकों
के हृदय में क्रांतिकारियों के प्रति बड़ा प्रेम तथा श्रद्धा होती है। उनकी अस्त्र-शस्त्र
रखने की स्वाभाविक इच्छा तथा रिवाल्वर या पिस्तौल से प्राकृतिक प्रेम उन्हें
क्रांतिकारी दल से सहानुभूति उत्पन्न कर देता है।
मैंने अपने क्रांतिकारी जीवन में एक भी युवक ऐसा न देखा, जो एक
रिवाल्वर या पिस्तौल अपने पास रखने की इच्छा न रखता हो। जिस समय उन्हें
रिवाल्वर के दर्शन होते हैं, वे समझते हैं कि इष्ट देव के दर्शन प्राप्त हुए, आधा
जीवन सफल हो गया। उसी समय से वे समझते हैं कि क्रांतिकारी दल के पास
इस प्रकार के सहस्रों अस्त्र होंगे, तभी तो इतनी बड़ी सरकार से युद्ध करने का
प्रयत्न कर रहे हैं। सोचते हैं कि धन की भी कोई कमी न होगी। अब क्या, अब
समिति के व्यय से देश-भ्रमण का अवसर भी प्राप्त होगा, बड़े-बड़े त्यागी महात्माओं
के दर्शन होंगे; सरकारी गुप्तचर विभाग का भी हाल मालूम हो सकेगा, सरकार
द्वारा जब्त किताबें कुछ तो पहले ही पढ़ा दी जाती हैं, रही-सही की भी आशा
रहती है कि बड़ा उच्च साहित्य देखने को मिलेगा, जो यों कभी प्राप्त नहीं हो
सकता। साथ-ही-साथ ख्याल होता है कि क्रांतिकारियों ने देश के राजा-महाराजाओं
को तो अपने पक्ष में कर ही लिया होगा। अब क्या, थोड़े दिन की ही कसर है,
लौट दिया सरकार का राज्य। बम बनाना सीख ही जाएँगे। अमर बूटी प्राप्त हो
जाएगी, आदि। परंतु जैसे ही एक युवक क्रांतिकारी दल का सदस्य बनकर
हार्दिक प्रेम से समिति के कार्यों में योग देता है, थोड़े दिनों में ही उसे विशेष

बृहत् संगठन 93
सदस्य होने के अधिकार प्राप्त होते हैं, वह एक्टिव (कार्यशील) मेम्बर बनता है,
उसे संस्था का कुछ असली भेद मालूम होता है, तब समझ में आता है कि कैसे
भीषण कार्य में उसने हाथ डाला है। फिर तो वही दशा हो जाती है, जो "नकटा
पंथ" के सदस्यों की थी।•
जब चारों ओर से असफलता तथा अविश्वास की घटाएँ दिखाई देती हैं,
तब यही विचार होता है कि ऐसे दुर्गम पथ में ये परिणाम तो होते ही हैं। दूसरे
देश के क्रांतिकारियों के मार्ग में भी ऐसी ही बाधाएँ उपस्थित हुई होंगी। वीर
वही कहलाता है जो अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ता, इसी प्रकार की बातों से मन
को शांत किया जाता है। भारत के जनसाधारण की तो कोई बात ही नहीं।
अधिकांश शिक्षित समुदाय भी यह नहीं जानता कि क्रांतिकारी दल क्या चीज है,
फिर उनसे सहानुभूति कौन रखे ? बिना देशवासियों की सहानुभूति के अथवा
बिना जनता की आवाज के सरकार भी किसी बात की कुछ चिंता नहीं करती।
दो-चार पढ़े-लिखे एक-दो अँग्रेजी अखबार में दबे हुए शब्दों में यदि दो-एक लेख
लिख दें, तो वे अरण्यरोदन के समान निष्फल सिद्ध होते हैं। उनकी ध्वनि व्यर्थ
में ही आकाश में विलीन हो जाती है। तमाम बातों को देखकर अब तो मैं इस
निर्णय पर पहुँचा हूँ कि अच्छा हुआ जो मैं गिरफ्तार हो गया और भोग नहीं
भोगने की मुझे सुविधाएं थीं। गिरफ्तारी से पहले ही मुझे अपनी गिरफ्तारी का
पूरा पता चल गया था। गिरफ्तारी के पूर्व भी यदि इच्छा करती तो पुलिस वालों
को मेरी हवा भी न मिलती, किन्तु मुझे तो अपनी शक्ति की परीक्षा करनी थी।
गिरफ्तारी के बाद सड़क पर आधे घंटे तक बिना किसी बंधन के घूमता रहा।
पुलिस वाले शांतिपूर्वक बैठे हुए थे। जब पुलिस कोतवाली में पहुँचा, दोपहर के
समय पुलिस कोतवाली के दफ्तर में बिना किसी बंधन के खुला बैठा हुआ था।
केवल एक सिपाही निगरानी के लिए पास बैठा हुआ था, जो रातभर का जागा
था। सब पुलिस अफसर भी रातभर के जगे हुए थे, क्योंकि गिरफ्तारियों में लगे
रहे थे। सब आराम करने चले गए थे। निगरानी वाला सिपाही भी घोर निद्रा में

94 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
सो गया। दफ्तर में केवल एक मुंशी लिखा-पढ़ी कर रहे थे। वह भी श्री
रोशनसिंह अभियुक्त के फूफीजात भाई थे। यदि मैं चाहता तो धीरे से उठकर
चल देता। पर मैंने विचारा कि मुंशी जी महाशय बुरे फँसेंगे। मैंने मुंशी जी को
बुलाकर कहा यदि भावी आपत्ति के लिए तैयार हो तो मैं जाऊँ। वे मुझे पहले
से जानते थे। पैरों पड़ गए कि गिरफ्तार हो जाऊँगा, बाल-बच्चे भूखों मर जाएँगे।
मुझे दया आ गई। एक घंटे बाद श्री अशफाकउल्ला खाँ के मकान की तलाशी
लेकर पुलिस वाले लौटे। श्री अशफाकउल्ला खाँ के भाई की कारतूसी बंदूक और
कारतूसों की भरी हुई पेटी लाकर उन्हीं मुंशी जी के पास रख दी गई, और मैं
पास ही कुर्सी पर खुला हुआ बैठा था। केवल एक सिपाही खाली हाथ पास में
खड़ा था। इच्छा हुई कि बंदूक उठाकर कारतूसों की पेटी गले में डाल लूँ, फिर
कौन सामने आता है। पर फिर सोचा कि मुंशी जी पर आपत्ति आएगी, विश्वासघात
करना ठीक नहीं। उस समय खुफिया पुलिस के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट सामने छत पर
आए। उन्होंने देखा कि मेरे एक ओर कारतूस तथा बंदूक पड़ी है,दूसरी ओर श्री
प्रेमकृष्ण का माउजर पिस्तौल तथा कारतूस रखे हैं, क्योंकि सब चीजें मुंशी जी के
पास आकर जमा होती थीं और मैं बिना किसी बंधन के बीच में खुला हुआ बैठा
हूँ। डि.सु. को तुरंत संदेह हुआ, उन्होंने बंदूक तथा पिस्तौल को वहाँ से हटवाकर
मालखाने में बंद करवाया। निश्चय किया कि अब 'भाग चलूँ।' पाखाने के बहाने
से बाहर निकाला गया। एक सिपाही कोतवाली से बाहर दूसरे स्थान में शौच के
निमित्त लिवा गया। दूसरे सिपाहियों ने उससे बहुत कुछ कहा कि रस्सी डाल लो।
उसने कहा मुझे विश्वास है यह भागेंगे नहीं। पाखाना नितांत निर्जन स्थान में था।
मुझे पाखाने भेजकर वह सिपाही खड़ा होकर सामने कुश्ती देखने लगा। मैंने दीवार
पर पैर रखा और चढ़कर देखा कि सिपाही महोदय कुश्ती देखने में मस्त हैं। हाथ
बढ़ाते ही दीवार के ऊपर और एक क्षण में बाहर हो जाता, फिर मुझे कौन
पाता? किन्तु तुरंत विचार आया कि जिस सिपाही ने विश्वास करके तुम्हें इतनी
स्वतंत्रता दी, उसके साथ विश्वासघात करके भागकर उसको जेल में डालोगे? क्या

वृहत् संगठन 95
यह अच्छा होगा? उसके बाल-बच्चे क्या कहेंगे? इस भाव ने हृदय पर एक ठोकर
लगाई। एक ठंडी साँस भरी, दीवार से उतर कर बाहर आया, सिपाही महोदय को
साथ लेकर कोतवाली की हवालात में आकर बंद हो गया।
लखनऊ जेल में काकोरी के अभियुक्तों को बड़ी आज़ादी थी। राय
साहब पं. चंपालाल जेलर की कृपा से हम कभी न समझ सके कि जेल में हैं या
किसी रिश्तेदार के यहाँ मेहमानी कर रहे हैं। जैसे माता-पिता से छोटे-छोटे लड़के
बात-बात पर ऐंठ जाते। पं. चंपालालजी का ऐसा हृदय था कि वे हम लोगों से
अपनी संतान से भी अधिक प्रेम करते थे। हममें से किसी को ज़रा-सा कष्ट होता
था, तो उन्हें बड़ा दुःख होता था। हमारे तनिक-से कष्ट को भी वह स्वयं न देख
सकते थे। और हम लोग ही क्यों, उनके जेल में किसी कैदी या सिपाही, जमादार
या मुंशी—किसी को भी कोई कष्ट नहीं। सब बड़े प्रसन्न रहते थे। इसके
अतिरिक्त मेरी दिनचर्या तथा नियमों का पालन देखकर पहरे के सिपाही अपने
गुरू से भी अधिक मेरा सम्मान करते थे। मैं यथानियम जाड़े, गर्मी तथा बरसात
में प्रातः काल तीन बजे से उठकर संध्यादि से निवृत्त हो नित्य हवन भी करता
था। यदि किसी के बाल-बच्चे को कष्ट होता था, तो वह हवन की भभूत ले
जाता था। कोई जंत्र माँगता था। उनके विश्वास के कारण उन्हें आराम भी होता
था तथा उनकी श्रद्धा और भी बढ़ जाती थी। परिणामस्वरूप जेल से निकल जाने
का पूरा प्रबंध कर लिया। जिस समय चाहता चुपचाप निकल जाता। एक रात्रि
को तैयार होकर उठ खड़ा हुआ। बैरक के नंबरदार तो मेरे सहारे पहरा देते थे
जब जी में आता सोते, जब इच्छा होती बैठ जाते, क्योंकि वे जानते थे कि यदि
सिपाही या जमादार सुपरिंटेंडेंट जेल के सामने पेश करना चाहेंगे, तो मैं बचा
लूँगा। सिपाही तो कोई चिंता ही न करते थे। चारों ओर शांति थी। केवल इतना
प्रयत्न करना था कि लोहे की कटी हुई सलाखों को उठाकर बाहर हो जाऊँ। चार
महीने पहले से लोहे की सलाखें काट ली थीं। काटकर वे ऐसे ढंग से जमा दी
थीं कि सलाखें धोई गईं, रंगत लगवाई गई, तीसरे दिन झाड़ी जातीं, आठवें दिन

96 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
हथौड़े से ठोंकी जातीं और जेल के अधिकारी नित्य प्रति सायंकाल घूमकर सब
ओर दृष्टि डाल जाते थे, पर किसी को कोई पता न चला। जैसे ही मैं जेल से
भागने का विचार करके उठा थां, ध्यान आया कि जिन पं. चंपालाल की कृपा से
सब प्रकार के आनंद भोगने की स्वतंत्रता जेल में प्राप्त हुई उनके बुढ़ापे में
जबकि थोड़ा-सा समय ही उनकी पेंशन के लिए बाकी है, क्या उन्हीं के साथ
विश्वासघात करके निकल भागूँ? सोचा जीवन-भर किसी के साथ विश्वासघात न
किया। अब भी विश्वासघात न करूँगा। उस समय मुझे यह भली-भाँति मालूम हो
चुका था कि मुझे फाँसी की सज़ा होगी, पर उपरोक्त बात सोचकर भागना
स्थगित ही कर दिया। ये सब बातें चाहे प्रलाप ही क्यों न मालूम हों, किंतु सब
अक्षरशः सत्य हैं, सबके प्रमाण विद्यमान हैं।
मैं इस समय इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि यदि हम लोगों ने प्राणपण
(पूरी कोशिश से) से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो
हमारा उद्योग क्रांतिकारी आंदोलन से कहीं अधिक लाभदायक होता, जिसका
परिणाम स्थायी होता। अति उत्तम होगा यदि भारत की भावी संतान तथा
नवयुवकवृन्द क्रांतिकारी संगठन करने की अपेक्षा जनता की प्रवृत्ति को देश-सेवा
की ओर लगाने का प्रयत्न करें और श्रमजीवी तथा कृषकों का संगठन करके
उनको जमींदारों तथा रईसों के अत्याचारों से बचाएँ। भारतवर्ष के रईस तथा
जमींदार सरकार के पक्षपाती हैं। मध्य श्रेणी के लोग किसी-न-किसी प्रकार इन्हीं
तीनों के आश्रित हैं। कोई तो नौकरीपेशा हैं और जो कोई व्यवसाय भी करते हैं,
उन्हें भी इन्हीं का मुँह ताकना पड़ता है। रह गए श्रमजीवी तथा कृषक सो उनको
उदर-पूर्ति (पेट पालने) के कार्य से ही समय नहीं मिलता, जो धर्म, समाज तथा
राजनीति की ओर कुछ ध्यान दे सकें। मद्यपानादि दुर्व्यसनों के कारण उनका
आचरण भी ठीक नहीं रह सकता। व्यभिचार, संतान-वृद्धि, अल्पायु में मृत्यु तथा
अनेक प्रकार के रोगों से जीवनभर उनकी मुक्ति नहीं हो सकती। कृषकों में
उद्योग का तो नाम भी नहीं पाया जाता। यदि एक किसान को जमींदार की

वृहत संगठन [Page 97]

मजदूरी करने या हल चलाने की नौकरी पर गाँव में आज से बीस वर्ष पूर्व दो
आने रोज या चार रूपये मासिक मिलते थे, तो आज भी वही वेतन बँधा चला
आ रहा है। बीस वर्ष पूर्व वह अकेला था, अब उसकी स्त्री तथा चार संतान भी
हैं। पर उसी वेतन में उसे निर्वाह करना पड़ता है। उसे उसी पर संतोष करना
पड़ता है। सारे दिन जेठ की लू तथा धूप में गन्ने के खेत में पानी देते-देते
उसको रतौंधी आने लगती है। अँधेरा होते ही आँख से दिखाई नहीं देता, पर
उसके बदले में आधा सेर सड़े हुए शीरे का शरबत या आधा सेर चना तथा छः पैसे रोज
मजदूरी मिलती है, जिसमें ही उसे अपने परिवार का पेट पालना पड़ता है।
जिसके हृदय में भारत की सेवा के भाव हों, या जो भारतभूमि को स्वतंत्र
देखने या स्वाधीन बनाने की इच्छा रखता हो, उसे उचित है कि ग्रामीण संगठन
करके कृषकों की दशा सुधारकर, उनके हृदय से भाग्य-निर्भरता को हटाकर उद्योगी
बनने की शिक्षा दें। कल-कारखाने, रेलवे, जहाज तथा खानों में जहाँ कहीं
श्रमजीवी हों, उनकी दशा को सुधारने के लिए श्रमजीवियों के संघ की स्थापना
की जाए, ताकि उनको अपनी अवस्था का ज्ञान हो सके और कारखानों के
मालिक मनमाने अत्याचार न कर सकें और अछूतों को, जिनकी संख्या इस देश
में लगभग छः करोड़ है, पर्याप्त शिक्षा प्राप्त कराने का प्रबंध हो तथा उनको
सामाजिक अधिकारों में समानता मिले। जिस देश में छः करोड़ मनुष्य अछूत
समझे जाते हों, उस देश के वासियों को स्वाधीन बनने का अधिकार ही क्या है?
इसी के साथ ही साथ स्त्रियों की दशा भी सुधारी जाए कि वे अपने आपको
मनुष्य जाति का अंग समझने लगें। वे पैर की जूती तथा घर की गुड़िया न
समझी जाएँ। इतने कार्य हो जाने के बाद जब भारत की जनता का अधिकांश
शिक्षित हो जाएगा, वे अपनी भलाई-बुराई समझने के योग्य हो जाएँगे, उस समय
प्रत्येक आंदोलन जिसका शिक्षित जनता समर्थन करेगी, अवश्य सफल होगा।
संसार की बड़ी-से-बड़ी शक्ति भी उसको दबाने में समर्थ न हो सकेगी। रूस में
जब तक किसान संगठन नहीं हुआ, रूस सरकार की ओर से देश-सेवकों पर

98 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
मनमाने अत्याचार होते रहे। जिस समय से “केथोराइन” ने ग्रामीण-संगठन का
कार्य अपने हाथ में लिया, स्थान-स्थान पर कृषक-सुधारक संघों की स्थापना की,
घूम-घूमकर रूस के युवक तथा युवतियों ने जारशाही के विरुद्ध प्रचार आरंभ
किया, तभी से किसानों को अपनी वास्तविक अवस्था का ज्ञान होने लगा और वे
अपने मित्र तथा शत्रु को समझने लगे, उसी समय से जारशाही की नींव हिलने
लगी। श्रमजीवियों के संघ भी स्थापित हुए। रूस में हड़तालों का आरंभ हुआ
उसी समय से जनता की प्रवृत्ति को देखकर मदांधों के नेत्र खुल गए।
भारत में सबसे बड़ी कमी यही है कि इस देश के युवकों में शहरी जीवन
व्यतीत करने की बान पड़ गई है। युवक-वृंद साफ-सुथरे कपड़े पहनने, पक्की
सड़कों पर चलने, मीठा, खट्टा तथा चटपटा भोजन करने, विदेशी सामग्री से
सुसज्जित बाजारों में घूमने, मेज-कुर्सी पर बैठने तथा विलासिता में फँसे रहने के
आदी हो गए हैं। ग्रामीण जीवन को वे नितांत नीरस तथा शुष्क समझते हैं।
उनकी समझ में गाँवों में अर्ध-सभ्य या जंगली लोग निवास करते हैं। यदि कभी
किसी अंग्रेजी स्कूल या कालेज में पढ़ने वाला विद्यार्थी किसी कार्यवश अपने
किसी संबंधी के यहाँ गाँव में पहुँच जाता है, तो उसे वहाँ दो-चार दिन काटना
बड़ा कठिन हो जाता है। वह या तो कोई उपन्यास साथ ले जाता है, जिसे अलग
बैठे पढ़ा करता है या पड़े-पड़े सोया करता है। किसी गाँववासी से बातचीत करने
से उसका दिमाग थक जाता है, या उससे बातचीत करना वह अपनी शान के
खिलाफ समझता है। गाँववासी जमींदार या रईस जो अपने लड़कों को अंग्रेजी
पढ़ाते हैं, उनकी भी यही इच्छा रहती है कि जिस प्रकार हो सके उनके लड़के
कोई सरकारी नौकरी पा जाएँ। ग्रामीण बालक जिस समय शहर में पहुँचकर शहरी
शान को देखते हैं, इतनी बुरी तरह से उन पर फैशन का भूत सवार हो जाता
है कि उनके मुकाबले फैशन बनाने की चिंता किसी को भी नहीं। थोड़े दिनों में
उनके आचरण पर भी इसका प्रभाव पड़ता है और वे स्कूल के गंदे लड़कों के
हाथ में पड़कर बड़ी बुरी-बुरी कुटैवों के घर बन जाते हैं। उनसे जीवन-पर्यन्त अपना

बृहत् संगठन 99
ही सुधार नहीं हो पाता। फिर वे गाँववासियों का सुधार क्या खाक कर सकेंगे?
असहयोग आंदोलन में कार्यकर्ताओं की इतनी अधिक संख्या होने पर भी
सबके सब शहर के प्लेटफार्मों पर लेक्चरवाजी करना ही अपना कर्त्तव्य समझते
थे। ऐसे बहुत थोड़े कार्यकर्त्ता थे, जिन्होंने गाँवों में कुछ कार्य किया। उनमें भी
अधिकतर ऐसे थे, जो केवल हुल्लड़ कराने में ही देशोद्धार समझते थे। परिणाम
यह हुआ कि आंदोलन में थोड़ी-सी शिथिलता आते ही सब कार्य अस्त-व्यस्त हो
गया। इसी कारण महामना देशबंधु चितरंजनदास ने अंतिम समय में गाँव-संगठन
को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया था। मेरे विचार से गाँव संगठन की सबसे
सुगम रीति यही हो सकती है कि युवकों में शहरी जीवन छोड़कर ग्रामीण-जीवन
के प्रति प्रीति उत्पन्न हो। जो युवक मिडिल, एंट्रेंस, एम. ए., बी. ए. पास करने
में हजारों रुपये नष्ट करके दस, पंद्रह, बीस या तीस रुपये की नौकरी के लिए
ठोकरें खाते फिरते हैं उन्हें नौकरी का आसरा छोड़कर कोई उद्योग जैसे-
बढ़ईगीरी, लुहारगीरी, दर्जी का काम, धोबी का काम, जूते बनाना, कपड़ा बुनना,
मकान बनाना, राजगीरी आदि सीख लेना चाहिए। यदि जरा साफ सुथरे रहना हो
तो वैद्यक सीखें। किसी बड़े गाँव या कस्बे में जाकर काम शुरू करें। उपरोक्त
कामों में से कोई काम भी ऐसा नहीं है, जिसमें चार या पाँच घंटा मेहनत करके
तीस रुपये मासिक की आय न हो जाए। गाँव में तीस रुपये मासिक शहर के
साठ रुपये से अधिक हैं, क्योंकि गाँव में लकड़ी या कपड़ों का मूल्य बहुत कम
होता है और यदि किसी जमींदार की कृपा हो गई और एक सूखा हुआ वृक्ष
कटवा दिया तो छः महीने के लिए ईंधन की छुट्टी हो गई। शुद्ध घी, दूध सस्ते
दामों में मिल जाता है और स्वयं एक या दो गाय या भैंस पाल ली, तब तो
आम के आम गुठलियों के दाम ही मिल गए। चारा सस्ता मिलता है। घी-दूध
बाल-बच्चे खाते हैं। कंडों का ईंधन होता है और यदि किसी की कृपा हो गई तो
फसल पर एक या दो भुस की गाड़ी बिना मूल्य ही मिल जाती है। अधिकतर
काम-काजियों को गाँव में चारा, लकड़ी के लिए पैसा खर्च नहीं करना पड़ता।

100 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा

हजारों अच्छे-अच्छे गाँव हैं, जिनमें वैद्य, दर्जी, धोबी निवास ही नहीं करते।
उन गाँवों के लोगों को दस, बीस कोस दूर दौड़ना पड़ता है। वे इतने दुखी होते
हैं कि जिसका अनुमान करना कठिन है। विवाह आदि के अवसरों पर यथासमय
कपड़े नहीं मिलते। काष्ठादिक औषधियाँ बड़े-बड़े कस्बों में नहीं मिलतीं। यदि
मामूली अत्तार बनकर ही कस्बे में बैठ जाएँ, और दो-चार किताबें देखकर औषधि
दिया करें तो भी तीस-चालीस रुपये मासिक की आय तो कहीं गई ही नहीं। इस
प्रकार उदर-निर्वाह तथा परिवार का प्रबंध हो जाता है। गाँवों की अधिक
जनसंख्या से परिचय हो जाता है। परिचय ही नहीं, जिसका एक समय जरूरत पर
काम निकल गया, वह आभारी हो जाता है। उसकी आँखें नीची रहती हैं।
आवश्यकता पड़ने पर वह तुरंत सहायक होता है। गाँव में कौन ऐसा पुरुष है
जिसका लुहार, बढ़ई, धोबी, दर्जी, कुम्हार या वैद्य से काम नहीं पड़ता? मेरा पूर्ण
अनुभव है कि इन लोगों की भले-भले गाँववासी खुशामद करते रहते हैं।
रोजाना काम पड़ते रहने से और संबंध होने से यदि थोड़ी-सी चेष्टा की
जाए और गाँववासियों को थोड़ा-सा उपदेश देकर उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न
किया जाए तो बड़ी जल्दी काम बने। अल्प समय में ही वे सच्चे स्वदेश भक्त
खद्दरधारी बन जाएँ। यदि उनमें एक दो शिक्षित हों तो उत्साहित करके उसके
पास एक समाचार पत्र मँगाने का प्रबंध कर दिया जाए। देश की दशा का भी
उन्हें कुछ ज्ञान होता रहे। इसी तरह सरल-सरल पुस्तकों की कथाएँ सुनाकर उनमें
से कुप्रथाओं को भी छुड़ाया जा सकता है। कभी-कभी स्वयं रामायण या भागवत
की कथा भी सुनाया करें। यदि नियमित रूप से भागवत की कथा कहें तो पर्याप्त
धन भी चढ़ावे में आ सकता है, जिससे एक पुस्तकालय स्थापित कर दें। कथा
कहने के अवसर पर बीच-बीच में चाहे कितनी राजनीति का समावेश कर जाएँ,
कोई खुफिया पुलिस का रिपोर्टर बैठा हो जो रिपोर्ट करे। वैसे यदि कोई
खद्दरधारी गाँव में उपदेश करना चाहे तो तुरंत ही जमींदार पुलिस में खबर कर
दे और यदि कस्बे के वैद्य, लड़के पढ़ाने वाले अथवा कथा कहने वाले पंडित कोई

वृहत् संगठन १०१
बात कहें तो सब चुपचाप सुनकर उस पर अमल करने की कोशिश करते हैं और
उन्हें कोई पूछता भी नहीं। इसी प्रकार अनेक सुविधाएँ मिल सकती हैं, जिनके
सहारे ग्रामीणों की सामाजिक दशा सुधारी जा सकती है। रात्रि-पाठशालाएँ खोलकर
निर्धन तथा अछूत जातियों के बालकों को शिक्षा दे सकते हैं। श्रमजीवी संघ
स्थापित करने में शहरी जीवन तो व्यतीत हो सकता है, किन्तु इसके लिए उनके
साथ अधिक समय खर्च करना पड़ेगा। जिस समय वे अपने-अपने काम से छुट्टी
पाकर आराम करते हैं, उस समय उनके साथ वार्तालाप करके मनोहर उपदेशों
द्वारा उनको उनकी दशा का दिग्दर्शन कराने का अवसर मिल सकता है। इन
लोगों के पास समय बहुत कम होता है। इसलिए बेहतर यही होगा कि चित्ताकर्षक
साधनों द्वारा किसी उपदेश करने की रीति से, जैसे लालटेन द्वारा तस्वीरें दिखाकर
या किसी दूसरे उपाय से उनको एक स्थान पर एकत्रित किया जाए, तथा रात्रि
पाठशालाएँ खोलकर उन्हें तथा उनके बच्चों को शिक्षा देने का भी प्रबंध किया
जाए। जितने युवक उच्च शिक्षा प्राप्त करके व्यर्थ में धन व्यय करने की इच्छा
रखते हैं उनके लिए उचित है कि वे अधिक-से-अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जे तक
की योग्यता प्राप्त कर किसी कला-कौशल के सीखने का प्रयत्न करें और उस
कला-कौशल द्वारा ही अपना जीवन निर्वाह करें।
जो धनी-मानी स्वदेश-सेवार्थ बड़े-बड़े विद्यालयों तथा पाठशालाओं की स्थापना
करते हैं, उनको चाहिए कि विद्यापीठों के साथ-साथ उद्योग-पीठ, शिल्प-विद्यालय
तथा कला-कौशल भवनों की स्थापना भी करें। इन विद्यालयों के विद्यार्थियों को
नेतागीरी के लोभ से बचाया जाए। विद्यार्थियों का जीवन सादा हो और विचार
उच्च हों। इन्हीं विद्यालयों में एक-एक उपदेशक विभाग भी हों, जिसमें विद्यार्थी
प्रचार करने का ढंग सीख सकें। जिन युवकों के हृदय में स्वदेश सेवा के भाव हों,
उनमें कष्ट सहन करने की आदत डालकर सुसंगठित रूप से ऐसा कार्य करना
चाहिए, जिसका परिणाम स्थायी हो। केथोराइन* ने इसी प्रकार कार्य किया था।

  • रूस की क्रांतिकारी नेता

102 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
उदर-पूर्ति के निमित्त केथोराइन के अनुयायी गाँवों में जाकर कपड़े सीते या जूते
बनाते और रात्रि के समय किसानों को उपदेश देते थे। जिस समय केथोराइन की
जीवनी (The Grandmother of the Russian Revolution) का अंग्रेजी भाषा
में अध्ययन किया, मुझ पर उसका प्रभाव हुआ। मैंने तुरंत उसकी जीवनी
"केथोराइन" नाम से हिन्दी में प्रकाशित कराई। मैं भी उसी प्रकार काम करना
चाहता था, पर बीच में ही क्रांतिकारी दल में फँस गया। मेरा तो अब यह
निश्चय हो गया है कि अभी पचास वर्ष तक क्रांतिकारी दल को भारत में
सफलता नहीं मिल सकती, क्योंकि यहाँ की स्थिति उसके उपयुक्त नहीं। अतएव
क्रांतिकारी दल का संगठन करके व्यर्थ में नवयुवकों के जीवन को नष्ट करना
और शक्ति का दुरुपयोग करना आदि बड़ी भारी भूलें हैं। इससे लाभ के स्थान
में हानि की संभावना बहुत अधिक है। नवयुवकों को मेरा अंतिम संदेश यही है
कि वे रिवाल्वर या पिस्तौल को अपने पास रखने की इच्छा को त्याग कर सच्चे
देश-सेवक बनें। पूर्ण स्वाधीनता उनका ध्येय हो और वे वास्तविक साम्यवादी
बनने का प्रयत्न करते रहें। फल की इच्छा छोड़ कर सच्चे प्रेम से कार्य करें,
परमात्मा सदैव ही उनका भला करेगा।
यदि देश-हित मरना पड़े मुझको सहस्रों-44 बार भी,
तो भी न मैं इस कष्ट को निज-45 ध्यान में लाऊँ कभी।
हे ईश-46 भारतवर्ष में-47 शत बार मेरा जन्म हो,
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक-48 कर्म हो।।
अंतिम समय की बातें
आज 16 दिसंबर, 1927 ई. को निम्नलिखित पंक्तियों का उल्लेख कर रहा
हूँ, जबकि 19 सितंबर, 1927 ई. सोमवार (पौष कृष्ण 11 सम्वत, 1984 वि.) को
साढ़े छः बजे प्रातःकाल इस शरीर को फाँसी पर लटका देने की तिथि निश्चित
हो चुकी है। अतएव नियत समय पर इहलीला संवरण करनी होगी। यह सर्वशक्तिमान

वृहत् संगठन 103
प्रभु की लीला है। सब कार्य उसकी इच्छानुसार ही होते हैं। यह परमपिता
परमात्मा के नियमों का परिणाम है कि किस प्रकार किसको शरीर त्यागना होता
है। मृत्यु के सकल उपक्रम सारे निमित्त मात्र हैं। जब तक कर्म क्षय नहीं होता
आत्मा को जन्म मरण के बंधन में पड़ना ही होता है, यह शास्त्रों का निश्चय है।
यद्यपि यह बात वह परब्रह्म ही जानता है कि किन कर्मों के परिणामस्वरूप
कौन-सा शरीर इस आत्मा को ग्रहण करना होगा किंतु अपने लिए यह मेरा दृढ़
निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अति शीघ्र ही
पुन: भारत में ही किसी निकटवर्ती संबंधी या इष्ट मित्र के गृह में जन्म ग्रहण
करूँगा, क्योंकि मेरा जन्म-जन्मांतर उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्रकृति
पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्त हो। कोई किसी पर हुकूमत न करे। सारे संसार में
जनतंत्र की स्थापना हो। वर्तमान समय में भारत की अवस्था (दशा) बड़ी
शोचनीय है। अतएव लगातार कई जन्म इसी देश में ग्रहण करने होंगे और जब
तक कि भारत के नर-नारी पूर्णतया सर्वरूपेण (हर तरह से) स्वतंत्र न हो जाएँ,
परमात्मा से मेरी यह प्रार्थना होगी कि वह मुझे इसी देश में जन्म दें, ताकि
उसकी पवित्र वाणी- "वेद वाणी" का अनुपम घोष मनुष्य मात्र के कानों तक
पहुँचाने में समर्थ हो सकूँ। सम्भव है कि मैं मार्ग-निर्धारण में भूल करूँ, पर इसमें
मेरा विशेष दोष नहीं, क्योंकि मैं भी तो अल्पज्ञ (कम जानकारी रखने वाला)
जीव मात्र हूँ। भूल न करना केवल सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाले ईश्वर) से ही
संभव है। हमें परिस्थितियों के अनुसार ही सब कार्य करने पड़ें और करने होंगे।
परमात्मा अगले जन्म में सुबुद्धि प्रदान करे ताकि मैं जिस मार्ग का अनुसरण करूँ,
वह त्रुटि रहित ही हो।
अब मैं उन बातों का भी उल्लेख कर देना उचित समझता हूँ, जो काकोरी
षड्यंत्र के अभियुक्तों के संबंध में सेशन जज के फैसला सुनाने के बाद घटित
हुईं। 6 अप्रैल सन् 1927 ई. को सेशन जज ने फैसला सुनाया था। 18 जुलाई
सन् 1927 ई. को अवध चीफ़ कोर्ट में अपील हुई। इसमें सज़ाएँ कुछ बढ़ीं और

104 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
एकाध की कमी भी हुई। अपील होने की तारीख से पहले मैंने संयुक्त प्रांत के
गवर्नर की सेवा में एक मेमोरियल (ज्ञापन) भेजा था, जिसमें प्रतिज्ञा की थी कि
अब भविष्य में क्रांतिकारी दल से कोई संबंध न रखूँगा। इस मेमोरियल का जिक्र
मैंने अपनी अंतिम दया-प्रार्थना पत्र में, जो मैंने चीफ कोर्ट के जजों को दिया था,
कर दिया था, किन्तु चीफ कोर्ट के जजों ने मेरी किसी प्रकार की प्रार्थना स्वीकार
न की। मैंने स्वयं ही जेल से अपने मुकदमे की बहस लिखकर भेजी जो छापी
गई। जब यह बहस चीफ कोर्ट के जजों ने सुनी उन्हें बड़ा संदेह हुआ कि बहस
मेरी लिखी हुई न थी। इन तमाम बातों का नतीजा यह निकला कि चीफ कोर्ट
अवध द्वारा मुझे महाभयंकर षड्यंत्रकारी की पदवी दी गई। मेरे पश्चाताप पर
जजों को विश्वास न हुआ और उन्होंने अपनी धारणा को इस प्रकार प्रकट किया
कि यदि यह (रामप्रसाद) छूट गया तो फिर वही कार्य करेगा। बुद्धि की प्रखरता
तथा समझ पर प्रकाश डालते हुए मुझे “निर्दयी हत्यारे” के नाम से विभूषित
किया गया। लेखनी उनके हाथ में थी, जो चाहे सो लिखते, किन्तु ‘काकोरी
षड्यंत्र का चीफ कोर्ट का आद्योपांत फैसला पढ़ने से भली-भाँति विदित होता है
कि मुझे मृत्यु-दंड किस ख्याल से दिया गया। यह निश्चय किया गया कि
रामप्रसाद ने सेशन जज के विरुद्ध अपशब्द कहे हैं, खुफिया विभाग के कार्यकर्त्ताओं
पर लांछन लगाए हैं अर्थात अभियोग के समय जो अन्याय होता था, उसके
विरुद्ध आवाज़ उठाई है, अतएव रामप्रसाद सब से बड़ा गुस्ताख मुलजिम है। अब
माफी चाहे वह किसी रूप में माँगे, नहीं दी जा सकती।
चीफ कोर्ट से अपील खारिज हो जाने के बाद यथानियम प्रांतीय गवर्नर
तथा फिर वाइसराय के पास दया-प्रार्थना की गई। रामप्रसाद “बिस्मिल”, राजेन्द्रनाथ
लाहिड़ी, रोशनसिंह तथा अशफाकउल्ला खाँ के मृत्यु-दंड को बदलकर अन्य दूसरी
सज़ा देने की सिफारिश करते हुए संयुक्त प्रांत की कौंसिल के लगभग सभी
निर्वाचित मेंबरों ने हस्ताक्षर करके निवेदन-पत्र दिया। मेरे पिता ने ढाई सौ रईस,
आनरेरी मजिस्ट्रेट तथा जमींदारों के हस्ताक्षर से एक अलग प्रार्थना-पत्र भेजा किन्तु

बृहत् संगठन 105
श्रीमान सर विलियम मेरिस की सरकार ने एक न सुनी। उसी समय लेजिस्लेटिव
असेंबली तथा कौंसिल ऑफ स्टेट के 78 सदस्यों ने हस्ताक्षर करके वाइसराय के
पास प्रार्थना-पत्र भेजा कि “काकोरी षड्यंत्र के मृत्यु-दंड पाए हुए लोगों को
मृत्यु-दंड की सज़ा बदलकर दूसरी सज़ा कर दी जाए, क्योंकि दौरा जज ने
सिफारिश की है कि यदि ये लोग पश्चाताप करें तो सरकार दंड कम कर दे।
चारों अभियुक्तों ने पश्चाताप प्रकट कर दिया है।” किन्तु वाइसराय महोदय ने भी
एक न सुनी।
इस विषय में माननीय पं. मदनमोहन मालवीय जी ने तथा असेंबली के कुछ
अन्य सदस्यों ने वाइसराय से मिलकर भी प्रयत्न किया था कि मृत्यु-दंड न दिया
जाए। इतना होने पर सबको आशा थी कि वाइसराय महोदय अवश्यमेव मृत्यु-दंड की
आज्ञा रद्द कर देंगे। इसी हालत में चुपचाप विजयादशमी से दो दिन पहले जेलों को
तार भेज दिए गए कि दया नहीं होगी। सबकी फांसी की तारीख मुकर्रर हो गई। जब
मुझे सुपरिंटेंडेंट जेल ने तार सुनाया, तो मैंने भी कह दिया कि आप अपना काम
कीजिए। किंतु सुपरिंटेंडेंट जेल के अधिक कहने पर कि एक तार दया-प्रार्थना का
सम्राट के पास भेज दो, क्योंकि यह उन्होंने एक नियम-सा बना रखा है कि प्रत्येक
फाँसी के कैदी की ओर से जिसकी दया-भिक्षा की अर्जी वाइसराय के यहाँ से खारिज
हो जाती है, वह एक तार सम्राट के नाम से प्रांतीय सरकार के पास अवश्य भेजते
हैं। कोई दूसरा जेल सुपरिंटेंडेंट ऐसा नहीं करता। उपरोक्त तार लिखते समय मेरा
कुछ विचार हुआ कि प्रिवी-कौंसिल (सर्वोच्च न्यायालय) इंग्लैंड में अपील की जाए।
मैंने श्री मोहनलाल सक्सेना वकील लखनऊ को सूचना दी। बाहर किसी को वाइसराय
द्वारा अपील खारिज करने की बात पर विश्वास भी न हुआ। जैसे तैसे करके श्री
मोहनलाल द्वारा प्रिवी-कौंसिल में अपील कराई गई। नतीजा जो पहले से मालूम था।
वहाँ से भी अपील खारिज हुई। यह जानते हुए कि अंग्रेज सरकार कुछ भी न सुनेगी
मैंने सरकार को प्रतिज्ञा-पत्र क्यों लिखा? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया-प्रार्थनाएँ
कीं? इस प्रकार से प्रश्न उठ सकते हैं।

106 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा.
मेरी समझ में सदैव यही आया कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान
है। शतरंज के खेलने वाले भली-भाँति जानते हैं कि आवश्यकता होने पर किस
प्रकार अपने मोहरे मरवा देने पड़ते हैं। बंगाल आर्डिनेंस के कैदियों के छोड़ने या
उन पर खुली अदालत में मुकदमा चलाने के प्रस्ताव जब असेम्बली में पेश किए
गए, तो सरकार की ओर से बड़े जोरदार शब्दों में कहा गया कि, सरकार के पास
पूरा सबूत है। खुली अदालत में अभियोग चलाने से गवाहों पर आपत्ति आ
सकती है। यदि आर्डिनेंस के कैदी लेखबद्ध प्रतिज्ञा-पत्र दें कि वे भविष्य में
क्रांतिकारी आंदोलन से कोई संबंध न रखेंगे, तो सरकार उन्हें रिहाई देने के विषय
' में विचार कर सकती है। बंगाल में दक्षिणेश्वर तथा शोभा बाजार बम केस
आर्डिनेंस के बाद चले खुफिया विभाग के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट के कत्ल का मुकदमा
भी खुली अदालत में हुआ। और भी कुछ हथियारों के मुकदमे खुली अदालत में
चलाए गए, किन्तु कोई एक भी दुर्घटना या हत्या की सूचना पुलिस न दे सकी।
काकोरी षड्यंत्र केस पूरे डेढ़ साल तक खुली अदालतों में चलता रहा। सबूत की
ओर से लगभग तीन सौ गवाह पेश किए गए। कई मुखबिर तथा इकबाली
(पुलिस को सूचना देने वाले और अपना अपराध स्वीकार करने वाले) खुले तौर
से घूमते रहे, पर कहीं कोई दुर्घटना या किसी को धमकी देने की कोई सूचना
पुलिस ने न दी। सरकार की इन बातों की पोल खोलने की गरज से मैंने
लेखबद्ध प्रतिज्ञा सरकार को दी। सरकार के कथनानुसार जिस प्रकार बंगाल
आर्डिनेंस के कैदियों के संबंध में सरकार के पास पूरा सबूत था और सरकार
उनमें से अनेक को भयंकर षड्यंत्रकारी दल का सदस्य तथा हत्याओं का
जिम्मेदार समझती तथा कहती थी, तो इसी प्रकार काकोरी के षड्यंत्रकारियों के
लेखबद्ध-प्रतिज्ञा करने पर कोई गौर क्यों नहीं किया गया? बात यह है कि जबरा
मारे रोने न देय। मुझे तो भली-भाँति मालूम था कि संयुक्त प्रांत में जितने
राजनैतिक अभियोग चलाए जाते हैं, उनके फैसले खुफिया पुलिस की इच्छानुसार
लिखे जाते हैं। बरेली पुलिस कांस्टेबिलों की हत्या के अभियोग में नितांत निर्दोष

वृहत् संगठन 107
नवयुवकों को फँसाया गया और सी. आई. डी. वालों ने अपनी डायरी दिखलाकर
फैसला लिखाया। काकोरी षड्यंत्र में भी अंत में ऐसा ही हुआ। सरकार की सब
चालों को जानते हुए भी मैंने सब कार्य उसकी लंबी-लंबी बातों की पोल खोलने
के लिए ही किए। काकोरी के मृत्युदंड पाए हुओं की दया-प्रार्थना न स्वीकार करने
का कोई विशेष कारण सरकार के पास नहीं। सरकार ने बंगाल आर्डिनेंस के
कैदियों के संबंध में जो कुछ कहा था, सो काकोरी वालों ने किया। मृत्यु-दंड को
रद्द कर देने से देश में किसी प्रकार की शांतिभंग होने अथवा किसी विप्लव हो
जाने की संभावना नहीं थी। विशेषतया जब कि देश भर के सब प्रकार के
हिन्दू-मुसलमान असेंबली के सदस्यों ने इसकी सिफारिश की थी। षड्यंत्रकारियों
की इतनी बड़ी सिफारिश इससे पहले कभी नहीं हुई। किंतु सरकार तो अपना
सारा सीधा रखना चाहती है। उसे अपने बल पर विश्वास है। सर विलियम मेरिस
ने ही स्वयं शाहजहाँपुर तथा इलाहाबाद के हिन्दू-मुस्लिम दंगे के अभियुक्तों के
मृत्यु-दंड रद्द किए हैं, जिनको कि इलाहाबाद हाई कोर्ट से मृत्यु-दंड ही देना उचित
समझा गया था और उन लोगों पर दिन दहाड़े हत्या करने के सीधे सबूत मौजूद
थे। ये सज़ाएँ ऐसे समय माफ की गई थीं, जबकि नित्य नए हिन्दू-मुस्लिम दंगे
बढ़ते ही जाते थे। यदि काकोरी के कैदियों को मृत्यु-दंड माफ करके, दूसरी सज़ा
देने से दूसरों का उत्साह बढ़ता तो क्या इसी प्रकार मजहबी दंगों के संबंध में भी
नहीं हो सकता था? मगर वहाँ तो मामला कुछ और ही है, जो अब भारतवासियों
के नरम से नरम दल के नेताओं के भी शाही कमीशन के मुकर्रर होने तथा उनमें
एक भी भारतवासी के न चुने जाने, पार्लियामेंट में भारत सचिव लार्ड बर्कन हेड
के तथा अन्य मजदूर दल के नेताओं के भाषणों से भली-भाँति समझ में आया है
कि किस प्रकार भारत को गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहने की चालें चली जा
रही हैं।
मैं प्राण त्यागते समय निराश नहीं हूँ कि हम लोगों के बलिदान व्यर्थ गए।
मेरा तो विश्वास है कि हम लोगों की छिपी हुई आहों का ही यह नतीजा हुआ

Uploaded By Rajesh Tanti.

108 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा

कि लार्ड बर्कन हेड के दिमाग में परमात्मा ने एक विचार उपस्थित किया कि
हिन्दुस्तान के हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों का लाभ उठाओ और भारत की जंजीरें और
कस दो। गए थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई। भारत के प्रत्येक विख्यात
राजनैतिक दल ने और हिंदुओं के तो लगभग सभी तथा मुसलमानों के भी
अधिकतर नेताओं ने एक स्वर होकर रायल कमीशन (साइमन कमीशन) की
नियुक्ति तथा उसके सदस्यों के विरुद्ध घोर विरोध किया है, और कांग्रेस के मद्रास
में होने वाले अधिवेशन में सब राजनैतिक दल के नेता तथा हिन्दू-मुसलमान एक
होने जा रहे हैं। वाइसराय ने जब हम काकोरी के मृत्यु-दंड वालों की दया-प्रार्थना
अस्वीकार की थी, उसी समय मैंने श्री मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि
हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अगली कांग्रेस (अधिवेशन) पर
एकत्रित हो हम लोगों की याद मनानी चाहिए। सरकार ने अशफाकउल्ला को
रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया। अशफाकउल्ला कट्टर मुसलमान होकर
पक्के आर्यसमाजी रामप्रसाद का क्रांतिकारी दल के संबंध में यदि दाहिना हाथ बन
सकते हैं, तब क्या भारत की स्वतंत्रता के नाम पर हिन्दू-मुसलमान अपने निजी
छोटे-छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते?⁻⁴⁹
परमात्मा ने मेरी पुकार सुन ली और मेरी इच्छा पूरी होती दिखाई देती है।
मैं तो अपना कार्य कर चुका। मैंने मुसलमानों में से एक नवयुवक निकालकर
भारतवासियों को दिखला दिया, जो सब परीक्षाओं में पूर्णतया उत्तीर्ण हुआ। अब
किसी को यह कहने का साहस न होना चाहिए कि मुसलमानों पर विश्वास न
करना चाहिए। पहला तजुर्बा था, जो पूरी तौर से कामयाब हुआ। अब देशवासियों
से यही प्रार्थना है कि यदि वे हम लोगों के फाँसी पर चढ़ने से जरा भी दुखित
हुए हों, तो उन्हें यही शिक्षा लेनी चाहिए कि हिन्दू-मुसलमान तथा सब राजनैतिक
दल एक होकर कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानें। जो कांग्रेस तय करें, उसे सब
पूरी तौर से मानें और उस पर अमल करें। ऐसा करने के बाद वह दिन बहुत
दूर न होगा जबकि अंग्रेजी सरकार को भारतवासियों की माँग के सामने सिर