रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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एकाध की कमी भी हुई। अपील होने की तारीख से पहले मैंने संयुक्त प्रांत के
गवर्नर की सेवा में एक मेमोरियल (ज्ञापन) भेजा था, जिसमें प्रतिज्ञा की थी कि
अब भविष्य में क्रांतिकारी दल से कोई संबंध न रखूँगा। इस मेमोरियल का जिक्र
मैंने अपनी अंतिम दया-प्रार्थना पत्र में, जो मैंने चीफ कोर्ट के जजों को दिया था,
कर दिया था, किन्तु चीफ कोर्ट के जजों ने मेरी किसी प्रकार की प्रार्थना स्वीकार
न की। मैंने स्वयं ही जेल से अपने मुकदमे की बहस लिखकर भेजी जो छापी
गई। जब यह बहस चीफ कोर्ट के जजों ने सुनी उन्हें बड़ा संदेह हुआ कि बहस
मेरी लिखी हुई न थी। इन तमाम बातों का नतीजा यह निकला कि चीफ कोर्ट
अवध द्वारा मुझे महाभयंकर षड्यंत्रकारी की पदवी दी गई। मेरे पश्चाताप पर
जजों को विश्वास न हुआ और उन्होंने अपनी धारणा को इस प्रकार प्रकट किया
कि यदि यह (रामप्रसाद) छूट गया तो फिर वही कार्य करेगा। बुद्धि की प्रखरता
तथा समझ पर प्रकाश डालते हुए मुझे “निर्दयी हत्यारे” के नाम से विभूषित
किया गया। लेखनी उनके हाथ में थी, जो चाहे सो लिखते, किन्तु ‘काकोरी
षड्यंत्र का चीफ कोर्ट का आद्योपांत फैसला पढ़ने से भली-भाँति विदित होता है
कि मुझे मृत्यु-दंड किस ख्याल से दिया गया। यह निश्चय किया गया कि
रामप्रसाद ने सेशन जज के विरुद्ध अपशब्द कहे हैं, खुफिया विभाग के कार्यकर्त्ताओं
पर लांछन लगाए हैं अर्थात अभियोग के समय जो अन्याय होता था, उसके
विरुद्ध आवाज़ उठाई है, अतएव रामप्रसाद सब से बड़ा गुस्ताख मुलजिम है। अब
माफी चाहे वह किसी रूप में माँगे, नहीं दी जा सकती।
चीफ कोर्ट से अपील खारिज हो जाने के बाद यथानियम प्रांतीय गवर्नर
तथा फिर वाइसराय के पास दया-प्रार्थना की गई। रामप्रसाद “बिस्मिल”, राजेन्द्रनाथ
लाहिड़ी, रोशनसिंह तथा अशफाकउल्ला खाँ के मृत्यु-दंड को बदलकर अन्य दूसरी
सज़ा देने की सिफारिश करते हुए संयुक्त प्रांत की कौंसिल के लगभग सभी
निर्वाचित मेंबरों ने हस्ताक्षर करके निवेदन-पत्र दिया। मेरे पिता ने ढाई सौ रईस,
आनरेरी मजिस्ट्रेट तथा जमींदारों के हस्ताक्षर से एक अलग प्रार्थना-पत्र भेजा किन्तु