रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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मेरी समझ में सदैव यही आया कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान
है। शतरंज के खेलने वाले भली-भाँति जानते हैं कि आवश्यकता होने पर किस
प्रकार अपने मोहरे मरवा देने पड़ते हैं। बंगाल आर्डिनेंस के कैदियों के छोड़ने या
उन पर खुली अदालत में मुकदमा चलाने के प्रस्ताव जब असेम्बली में पेश किए
गए, तो सरकार की ओर से बड़े जोरदार शब्दों में कहा गया कि, सरकार के पास
पूरा सबूत है। खुली अदालत में अभियोग चलाने से गवाहों पर आपत्ति आ
सकती है। यदि आर्डिनेंस के कैदी लेखबद्ध प्रतिज्ञा-पत्र दें कि वे भविष्य में
क्रांतिकारी आंदोलन से कोई संबंध न रखेंगे, तो सरकार उन्हें रिहाई देने के विषय
' में विचार कर सकती है। बंगाल में दक्षिणेश्वर तथा शोभा बाजार बम केस
आर्डिनेंस के बाद चले खुफिया विभाग के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट के कत्ल का मुकदमा
भी खुली अदालत में हुआ। और भी कुछ हथियारों के मुकदमे खुली अदालत में
चलाए गए, किन्तु कोई एक भी दुर्घटना या हत्या की सूचना पुलिस न दे सकी।
काकोरी षड्यंत्र केस पूरे डेढ़ साल तक खुली अदालतों में चलता रहा। सबूत की
ओर से लगभग तीन सौ गवाह पेश किए गए। कई मुखबिर तथा इकबाली
(पुलिस को सूचना देने वाले और अपना अपराध स्वीकार करने वाले) खुले तौर
से घूमते रहे, पर कहीं कोई दुर्घटना या किसी को धमकी देने की कोई सूचना
पुलिस ने न दी। सरकार की इन बातों की पोल खोलने की गरज से मैंने
लेखबद्ध प्रतिज्ञा सरकार को दी। सरकार के कथनानुसार जिस प्रकार बंगाल
आर्डिनेंस के कैदियों के संबंध में सरकार के पास पूरा सबूत था और सरकार
उनमें से अनेक को भयंकर षड्यंत्रकारी दल का सदस्य तथा हत्याओं का
जिम्मेदार समझती तथा कहती थी, तो इसी प्रकार काकोरी के षड्यंत्रकारियों के
लेखबद्ध-प्रतिज्ञा करने पर कोई गौर क्यों नहीं किया गया? बात यह है कि जबरा
मारे रोने न देय। मुझे तो भली-भाँति मालूम था कि संयुक्त प्रांत में जितने
राजनैतिक अभियोग चलाए जाते हैं, उनके फैसले खुफिया पुलिस की इच्छानुसार
लिखे जाते हैं। बरेली पुलिस कांस्टेबिलों की हत्या के अभियोग में नितांत निर्दोष