रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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सदस्य होने के अधिकार प्राप्त होते हैं, वह एक्टिव (कार्यशील) मेम्बर बनता है,
उसे संस्था का कुछ असली भेद मालूम होता है, तब समझ में आता है कि कैसे
भीषण कार्य में उसने हाथ डाला है। फिर तो वही दशा हो जाती है, जो "नकटा
पंथ" के सदस्यों की थी।•
जब चारों ओर से असफलता तथा अविश्वास की घटाएँ दिखाई देती हैं,
तब यही विचार होता है कि ऐसे दुर्गम पथ में ये परिणाम तो होते ही हैं। दूसरे
देश के क्रांतिकारियों के मार्ग में भी ऐसी ही बाधाएँ उपस्थित हुई होंगी। वीर
वही कहलाता है जो अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ता, इसी प्रकार की बातों से मन
को शांत किया जाता है। भारत के जनसाधारण की तो कोई बात ही नहीं।
अधिकांश शिक्षित समुदाय भी यह नहीं जानता कि क्रांतिकारी दल क्या चीज है,
फिर उनसे सहानुभूति कौन रखे ? बिना देशवासियों की सहानुभूति के अथवा
बिना जनता की आवाज के सरकार भी किसी बात की कुछ चिंता नहीं करती।
दो-चार पढ़े-लिखे एक-दो अँग्रेजी अखबार में दबे हुए शब्दों में यदि दो-एक लेख
लिख दें, तो वे अरण्यरोदन के समान निष्फल सिद्ध होते हैं। उनकी ध्वनि व्यर्थ
में ही आकाश में विलीन हो जाती है। तमाम बातों को देखकर अब तो मैं इस
निर्णय पर पहुँचा हूँ कि अच्छा हुआ जो मैं गिरफ्तार हो गया और भोग नहीं
भोगने की मुझे सुविधाएं थीं। गिरफ्तारी से पहले ही मुझे अपनी गिरफ्तारी का
पूरा पता चल गया था। गिरफ्तारी के पूर्व भी यदि इच्छा करती तो पुलिस वालों
को मेरी हवा भी न मिलती, किन्तु मुझे तो अपनी शक्ति की परीक्षा करनी थी।
गिरफ्तारी के बाद सड़क पर आधे घंटे तक बिना किसी बंधन के घूमता रहा।
पुलिस वाले शांतिपूर्वक बैठे हुए थे। जब पुलिस कोतवाली में पहुँचा, दोपहर के
समय पुलिस कोतवाली के दफ्तर में बिना किसी बंधन के खुला बैठा हुआ था।
केवल एक सिपाही निगरानी के लिए पास बैठा हुआ था, जो रातभर का जागा
था। सब पुलिस अफसर भी रातभर के जगे हुए थे, क्योंकि गिरफ्तारियों में लगे
रहे थे। सब आराम करने चले गए थे। निगरानी वाला सिपाही भी घोर निद्रा में