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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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वृहत संगठन [Page 97]

मजदूरी करने या हल चलाने की नौकरी पर गाँव में आज से बीस वर्ष पूर्व दो
आने रोज या चार रूपये मासिक मिलते थे, तो आज भी वही वेतन बँधा चला
आ रहा है। बीस वर्ष पूर्व वह अकेला था, अब उसकी स्त्री तथा चार संतान भी
हैं। पर उसी वेतन में उसे निर्वाह करना पड़ता है। उसे उसी पर संतोष करना
पड़ता है। सारे दिन जेठ की लू तथा धूप में गन्ने के खेत में पानी देते-देते
उसको रतौंधी आने लगती है। अँधेरा होते ही आँख से दिखाई नहीं देता, पर
उसके बदले में आधा सेर सड़े हुए शीरे का शरबत या आधा सेर चना तथा छः पैसे रोज
मजदूरी मिलती है, जिसमें ही उसे अपने परिवार का पेट पालना पड़ता है।
जिसके हृदय में भारत की सेवा के भाव हों, या जो भारतभूमि को स्वतंत्र
देखने या स्वाधीन बनाने की इच्छा रखता हो, उसे उचित है कि ग्रामीण संगठन
करके कृषकों की दशा सुधारकर, उनके हृदय से भाग्य-निर्भरता को हटाकर उद्योगी
बनने की शिक्षा दें। कल-कारखाने, रेलवे, जहाज तथा खानों में जहाँ कहीं
श्रमजीवी हों, उनकी दशा को सुधारने के लिए श्रमजीवियों के संघ की स्थापना
की जाए, ताकि उनको अपनी अवस्था का ज्ञान हो सके और कारखानों के
मालिक मनमाने अत्याचार न कर सकें और अछूतों को, जिनकी संख्या इस देश
में लगभग छः करोड़ है, पर्याप्त शिक्षा प्राप्त कराने का प्रबंध हो तथा उनको
सामाजिक अधिकारों में समानता मिले। जिस देश में छः करोड़ मनुष्य अछूत
समझे जाते हों, उस देश के वासियों को स्वाधीन बनने का अधिकार ही क्या है?
इसी के साथ ही साथ स्त्रियों की दशा भी सुधारी जाए कि वे अपने आपको
मनुष्य जाति का अंग समझने लगें। वे पैर की जूती तथा घर की गुड़िया न
समझी जाएँ। इतने कार्य हो जाने के बाद जब भारत की जनता का अधिकांश
शिक्षित हो जाएगा, वे अपनी भलाई-बुराई समझने के योग्य हो जाएँगे, उस समय
प्रत्येक आंदोलन जिसका शिक्षित जनता समर्थन करेगी, अवश्य सफल होगा।
संसार की बड़ी-से-बड़ी शक्ति भी उसको दबाने में समर्थ न हो सकेगी। रूस में
जब तक किसान संगठन नहीं हुआ, रूस सरकार की ओर से देश-सेवकों पर