रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ें92 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
व्यक्तियों में भी हार्दिक सहानुभूति रखने वाले, अपनी जान पर खेल जाने वाले,
कितने थे, उसका कहना ही क्या है। कैसी बड़ी-बड़ी आशाएँ बँधाकर इन
व्यक्तियों को क्रांतिकारी समिति का सदस्य बनाया गया था, और इस अवस्था में,
जबकि असहयोगियों ने सरकार की ओर से घृणा उत्पन्न कराने में कोई कसर न
छोड़ी थी, खुले रूप में राज्यद्रोही बातों का पूर्ण प्रचार किया था। इस पर भी
बोल्शेविक सहायता की आशाएँ बँधा-बँधा कर तथा क्रांतिकारियों के ऊँचे-ऊँचे
आदर्शों तथा बलिदानों का उदाहरण दे-देकर प्रोत्साहन दिया जाता था। नवयुवकों
के हृदय में क्रांतिकारियों के प्रति बड़ा प्रेम तथा श्रद्धा होती है। उनकी अस्त्र-शस्त्र
रखने की स्वाभाविक इच्छा तथा रिवाल्वर या पिस्तौल से प्राकृतिक प्रेम उन्हें
क्रांतिकारी दल से सहानुभूति उत्पन्न कर देता है।
मैंने अपने क्रांतिकारी जीवन में एक भी युवक ऐसा न देखा, जो एक
रिवाल्वर या पिस्तौल अपने पास रखने की इच्छा न रखता हो। जिस समय उन्हें
रिवाल्वर के दर्शन होते हैं, वे समझते हैं कि इष्ट देव के दर्शन प्राप्त हुए, आधा
जीवन सफल हो गया। उसी समय से वे समझते हैं कि क्रांतिकारी दल के पास
इस प्रकार के सहस्रों अस्त्र होंगे, तभी तो इतनी बड़ी सरकार से युद्ध करने का
प्रयत्न कर रहे हैं। सोचते हैं कि धन की भी कोई कमी न होगी। अब क्या, अब
समिति के व्यय से देश-भ्रमण का अवसर भी प्राप्त होगा, बड़े-बड़े त्यागी महात्माओं
के दर्शन होंगे; सरकारी गुप्तचर विभाग का भी हाल मालूम हो सकेगा, सरकार
द्वारा जब्त किताबें कुछ तो पहले ही पढ़ा दी जाती हैं, रही-सही की भी आशा
रहती है कि बड़ा उच्च साहित्य देखने को मिलेगा, जो यों कभी प्राप्त नहीं हो
सकता। साथ-ही-साथ ख्याल होता है कि क्रांतिकारियों ने देश के राजा-महाराजाओं
को तो अपने पक्ष में कर ही लिया होगा। अब क्या, थोड़े दिन की ही कसर है,
लौट दिया सरकार का राज्य। बम बनाना सीख ही जाएँगे। अमर बूटी प्राप्त हो
जाएगी, आदि। परंतु जैसे ही एक युवक क्रांतिकारी दल का सदस्य बनकर
हार्दिक प्रेम से समिति के कार्यों में योग देता है, थोड़े दिनों में ही उसे विशेष