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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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बृहत् संगठन 99
ही सुधार नहीं हो पाता। फिर वे गाँववासियों का सुधार क्या खाक कर सकेंगे?
असहयोग आंदोलन में कार्यकर्ताओं की इतनी अधिक संख्या होने पर भी
सबके सब शहर के प्लेटफार्मों पर लेक्चरवाजी करना ही अपना कर्त्तव्य समझते
थे। ऐसे बहुत थोड़े कार्यकर्त्ता थे, जिन्होंने गाँवों में कुछ कार्य किया। उनमें भी
अधिकतर ऐसे थे, जो केवल हुल्लड़ कराने में ही देशोद्धार समझते थे। परिणाम
यह हुआ कि आंदोलन में थोड़ी-सी शिथिलता आते ही सब कार्य अस्त-व्यस्त हो
गया। इसी कारण महामना देशबंधु चितरंजनदास ने अंतिम समय में गाँव-संगठन
को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया था। मेरे विचार से गाँव संगठन की सबसे
सुगम रीति यही हो सकती है कि युवकों में शहरी जीवन छोड़कर ग्रामीण-जीवन
के प्रति प्रीति उत्पन्न हो। जो युवक मिडिल, एंट्रेंस, एम. ए., बी. ए. पास करने
में हजारों रुपये नष्ट करके दस, पंद्रह, बीस या तीस रुपये की नौकरी के लिए
ठोकरें खाते फिरते हैं उन्हें नौकरी का आसरा छोड़कर कोई उद्योग जैसे-
बढ़ईगीरी, लुहारगीरी, दर्जी का काम, धोबी का काम, जूते बनाना, कपड़ा बुनना,
मकान बनाना, राजगीरी आदि सीख लेना चाहिए। यदि जरा साफ सुथरे रहना हो
तो वैद्यक सीखें। किसी बड़े गाँव या कस्बे में जाकर काम शुरू करें। उपरोक्त
कामों में से कोई काम भी ऐसा नहीं है, जिसमें चार या पाँच घंटा मेहनत करके
तीस रुपये मासिक की आय न हो जाए। गाँव में तीस रुपये मासिक शहर के
साठ रुपये से अधिक हैं, क्योंकि गाँव में लकड़ी या कपड़ों का मूल्य बहुत कम
होता है और यदि किसी जमींदार की कृपा हो गई और एक सूखा हुआ वृक्ष
कटवा दिया तो छः महीने के लिए ईंधन की छुट्टी हो गई। शुद्ध घी, दूध सस्ते
दामों में मिल जाता है और स्वयं एक या दो गाय या भैंस पाल ली, तब तो
आम के आम गुठलियों के दाम ही मिल गए। चारा सस्ता मिलता है। घी-दूध
बाल-बच्चे खाते हैं। कंडों का ईंधन होता है और यदि किसी की कृपा हो गई तो
फसल पर एक या दो भुस की गाड़ी बिना मूल्य ही मिल जाती है। अधिकतर
काम-काजियों को गाँव में चारा, लकड़ी के लिए पैसा खर्च नहीं करना पड़ता।