सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 107

वृहत् संगठन 95
यह अच्छा होगा? उसके बाल-बच्चे क्या कहेंगे? इस भाव ने हृदय पर एक ठोकर
लगाई। एक ठंडी साँस भरी, दीवार से उतर कर बाहर आया, सिपाही महोदय को
साथ लेकर कोतवाली की हवालात में आकर बंद हो गया।
लखनऊ जेल में काकोरी के अभियुक्तों को बड़ी आज़ादी थी। राय
साहब पं. चंपालाल जेलर की कृपा से हम कभी न समझ सके कि जेल में हैं या
किसी रिश्तेदार के यहाँ मेहमानी कर रहे हैं। जैसे माता-पिता से छोटे-छोटे लड़के
बात-बात पर ऐंठ जाते। पं. चंपालालजी का ऐसा हृदय था कि वे हम लोगों से
अपनी संतान से भी अधिक प्रेम करते थे। हममें से किसी को ज़रा-सा कष्ट होता
था, तो उन्हें बड़ा दुःख होता था। हमारे तनिक-से कष्ट को भी वह स्वयं न देख
सकते थे। और हम लोग ही क्यों, उनके जेल में किसी कैदी या सिपाही, जमादार
या मुंशी—किसी को भी कोई कष्ट नहीं। सब बड़े प्रसन्न रहते थे। इसके
अतिरिक्त मेरी दिनचर्या तथा नियमों का पालन देखकर पहरे के सिपाही अपने
गुरू से भी अधिक मेरा सम्मान करते थे। मैं यथानियम जाड़े, गर्मी तथा बरसात
में प्रातः काल तीन बजे से उठकर संध्यादि से निवृत्त हो नित्य हवन भी करता
था। यदि किसी के बाल-बच्चे को कष्ट होता था, तो वह हवन की भभूत ले
जाता था। कोई जंत्र माँगता था। उनके विश्वास के कारण उन्हें आराम भी होता
था तथा उनकी श्रद्धा और भी बढ़ जाती थी। परिणामस्वरूप जेल से निकल जाने
का पूरा प्रबंध कर लिया। जिस समय चाहता चुपचाप निकल जाता। एक रात्रि
को तैयार होकर उठ खड़ा हुआ। बैरक के नंबरदार तो मेरे सहारे पहरा देते थे
जब जी में आता सोते, जब इच्छा होती बैठ जाते, क्योंकि वे जानते थे कि यदि
सिपाही या जमादार सुपरिंटेंडेंट जेल के सामने पेश करना चाहेंगे, तो मैं बचा
लूँगा। सिपाही तो कोई चिंता ही न करते थे। चारों ओर शांति थी। केवल इतना
प्रयत्न करना था कि लोहे की कटी हुई सलाखों को उठाकर बाहर हो जाऊँ। चार
महीने पहले से लोहे की सलाखें काट ली थीं। काटकर वे ऐसे ढंग से जमा दी
थीं कि सलाखें धोई गईं, रंगत लगवाई गई, तीसरे दिन झाड़ी जातीं, आठवें दिन