रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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श्रीमान सर विलियम मेरिस की सरकार ने एक न सुनी। उसी समय लेजिस्लेटिव
असेंबली तथा कौंसिल ऑफ स्टेट के 78 सदस्यों ने हस्ताक्षर करके वाइसराय के
पास प्रार्थना-पत्र भेजा कि “काकोरी षड्यंत्र के मृत्यु-दंड पाए हुए लोगों को
मृत्यु-दंड की सज़ा बदलकर दूसरी सज़ा कर दी जाए, क्योंकि दौरा जज ने
सिफारिश की है कि यदि ये लोग पश्चाताप करें तो सरकार दंड कम कर दे।
चारों अभियुक्तों ने पश्चाताप प्रकट कर दिया है।” किन्तु वाइसराय महोदय ने भी
एक न सुनी।
इस विषय में माननीय पं. मदनमोहन मालवीय जी ने तथा असेंबली के कुछ
अन्य सदस्यों ने वाइसराय से मिलकर भी प्रयत्न किया था कि मृत्यु-दंड न दिया
जाए। इतना होने पर सबको आशा थी कि वाइसराय महोदय अवश्यमेव मृत्यु-दंड की
आज्ञा रद्द कर देंगे। इसी हालत में चुपचाप विजयादशमी से दो दिन पहले जेलों को
तार भेज दिए गए कि दया नहीं होगी। सबकी फांसी की तारीख मुकर्रर हो गई। जब
मुझे सुपरिंटेंडेंट जेल ने तार सुनाया, तो मैंने भी कह दिया कि आप अपना काम
कीजिए। किंतु सुपरिंटेंडेंट जेल के अधिक कहने पर कि एक तार दया-प्रार्थना का
सम्राट के पास भेज दो, क्योंकि यह उन्होंने एक नियम-सा बना रखा है कि प्रत्येक
फाँसी के कैदी की ओर से जिसकी दया-भिक्षा की अर्जी वाइसराय के यहाँ से खारिज
हो जाती है, वह एक तार सम्राट के नाम से प्रांतीय सरकार के पास अवश्य भेजते
हैं। कोई दूसरा जेल सुपरिंटेंडेंट ऐसा नहीं करता। उपरोक्त तार लिखते समय मेरा
कुछ विचार हुआ कि प्रिवी-कौंसिल (सर्वोच्च न्यायालय) इंग्लैंड में अपील की जाए।
मैंने श्री मोहनलाल सक्सेना वकील लखनऊ को सूचना दी। बाहर किसी को वाइसराय
द्वारा अपील खारिज करने की बात पर विश्वास भी न हुआ। जैसे तैसे करके श्री
मोहनलाल द्वारा प्रिवी-कौंसिल में अपील कराई गई। नतीजा जो पहले से मालूम था।
वहाँ से भी अपील खारिज हुई। यह जानते हुए कि अंग्रेज सरकार कुछ भी न सुनेगी
मैंने सरकार को प्रतिज्ञा-पत्र क्यों लिखा? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया-प्रार्थनाएँ
कीं? इस प्रकार से प्रश्न उठ सकते हैं।